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Home World ना ना करते ट्रंप वही कर बैठे… 60 दिन की मोहलत, फिर ईरान होर्मुज में करेगा टोल वसूली; डील हुई सील

ना ना करते ट्रंप वही कर बैठे… 60 दिन की मोहलत, फिर ईरान होर्मुज में करेगा टोल वसूली; डील हुई सील

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ना ना करते ट्रंप वही कर बैठे… 60 दिन की मोहलत, फिर ईरान होर्मुज में करेगा टोल वसूली; डील हुई सील
डोनाल्ड ट्रंप और मसूद पेजेश्कियान.

Iran Hormuz Strait Toll: अमेरिका और ईरान के बीच हुए नए समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर एक अहम तस्वीर सामने आई है. जहां एक तरफ समझौते के तहत अगले 60 दिनों तक व्यापारिक जहाजों को बिना किसी शुल्क के इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से गुजरने की अनुमति दी जाएगी, वहीं ईरान ने साफ कर दिया है कि यह व्यवस्था स्थायी नहीं होगी. तेहरान का कहना है कि दो महीने बाद होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से फिर शुल्क लिया जाएगा.

यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर हो चुके हैं. दोनों देशों ने इसके लागू होने की पुष्टि भी कर दी है. डोनाल्ड ट्रंप और मसूद पेजेश्कियान ने इस पर डिजिटली साइन किए हैं. 

ईरान बोला- युद्ध से पहले जैसी स्थिति अब नहीं लौटेगी

ईरानी संसद के स्पीकर और अमेरिका के साथ बातचीत में प्रमुख भूमिका निभाने वाले मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने सरकारी टेलीविजन को दिए इंटरव्यू में कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य अब पहले जैसा नहीं रहेगा. उन्होंने कहा, ‘अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य की संभावना को हमारे लिए वास्तविकता में बदल दिया है. होर्मुज पर ईरान का संप्रभु अधिकार है और जाहिर तौर पर हम वहां दी जाने वाली सेवाओं के बदले शुल्क लेंगे.’ गालिबाफ के इस बयान को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका के साथ हुए समझौते के बाद ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य से राजस्व कमाने का औपचारिक रास्ता मिल सकता है.

समझौते में 60 दिन तक मुफ्त आवाजाही का प्रावधान

अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14 बिंदुओं वाले एमओयू के पांचवें अनुच्छेद में होर्मुज जलडमरूमध्य का विशेष उल्लेख किया गया है. इसके अनुसार, ईरान फारस की खाड़ी और ओमान सागर के बीच व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करेगा. समझौते के तहत शुरुआती 60 दिनों तक जहाजों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा.

साथ ही ईरान ने यह भी स्वीकार किया है कि युद्ध के दौरान पैदा हुई तकनीकी और सैन्य बाधाओं को हटाने, समुद्री बारूदी सुरंगों की सफाई करने और जहाजों की आवाजाही को युद्ध-पूर्व स्तर तक बहाल करने के लिए 30 दिनों के भीतर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे. हालांकि, समझौते में 60 दिनों के बाद शुल्क व्यवस्था को लेकर कोई स्थायी रोक नहीं लगाई गई है. यही वजह है कि ईरान अब इस अवधि के बाद टोल वसूली की संभावना को खुलकर सामने रख रहा है.

तेल टैंकरों से अरबों डॉलर की कमाई की उम्मीद

गालिबाफ के बयान से यह संकेत मिला है कि ईरान भविष्य में होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों और अन्य व्यावसायिक जहाजों से सेवाओं के बदले शुल्क वसूल सकता है. अगर होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर प्रति बैरल तेल पर लगभग एक डॉलर के बराबर शुल्क लगाया जाता है तो ईरान को भारी राजस्व मिल सकता है. युद्ध के दौरान भी तेहरान ने कथित तौर पर इस रूट से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूल किया था, जिससे उसको लगभग 20 लाख डॉलर की कथित कमाई भी हुई थी.

ईरान लगातार कह रहा था कि वह इस रूट से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूल करेगा. उसने ओमान के साथ मिलकर इस प्लान को आगे बढ़ाने की योजना बनाने की भी बात कही. लेकिन अमेरिका, विशेषकर ट्रंप लगातार इससे इनकार करते रहे. ईरान को तो वह धमकाते ही रहे, उन्होंने इस पर ओमान को भी चेतावनी दे दी. लेकिन, अब ट्रंप ने उसी डील पर साइन कर दिए हैं, जिस पर 60 दिनों बाद ईरान को इस टोल वसूलने वाली पावर का इस्तेमाल करने की मंजूरी मिल रही है.

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है. यहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 1/5 वां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे बड़े ऊर्जा उत्पादक देशों का अधिकांश तेल और गैस निर्यात इसी मार्ग पर निर्भर करता है. ऐसे में यहां शुल्क व्यवस्था लागू होने का असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है.

अमेरिका पर भरोसा नहीं, गालिबाफ ने जताया संदेह

गालिबाफ ने समझौते को लेकर अमेरिका पर अविश्वास भी व्यक्त किया. ईरान की अर्ध-सरकारी तस्नीम न्यूज एजेंसी के अनुसार उन्होंने कहा, ‘अमेरिका को लेकर मेरा अविश्वास सबसे अधिक है. अगर समझौता अंतिम रूप ले ले और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव से उसे मंजूरी भी मिल जाए, तब भी उस पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता.’ उनके इस बयान से संकेत मिलता है कि समझौते पर हस्ताक्षर होने के बावजूद तेहरान वाशिंगटन की मंशा को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है.

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अमेरिका और ईरान ने समझौते के लागू होने की पुष्टि की

अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों ने पुष्टि की है कि दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने समझौते पर डिजिटल हस्ताक्षर कर दिए हैं और यह तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है. डोनाल्ड ट्रंप ने चिल्लाकर बताया कि उन्होंने फ्रांस में आयोजित जी-7 समिट के दौरान इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए. समझौते के तहत पहले चरण में ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बहाल करेगा, जबकि अमेरिका ईरान के खिलाफ लागू अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा. 

बढ़ेंगी तेल कीमतें

फिलहाल समझौते के कारण अगले दो महीनों तक जहाजों को बिना किसी शुल्क के होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की सुविधा मिलेगी. लेकिन 60 दिन बाद अगर तेहरान बाद में औपचारिक शुल्क व्यवस्था लागू करता है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की लागत पर भी उसका सीधा असर पड़ सकता है. यानी दुनिया भर में महंगाई बढ़ेगी और भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा.

भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है. इनमें से अधिकांश तेल और गैस होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते ही भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचते हैं.

अगर भविष्य में ईरान टोल या सेवा शुल्क लागू करता है तो शिपिंग लागत बढ़ सकती है। इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है, जिससे भारत जैसे आयातक देशों की ऊर्जा लागत बढ़ने की आशंका रहेगी.

तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन, बिजली उत्पादन, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक उत्पादन की लागत बढ़ने से महंगाई पर भी दबाव पड़ सकता है.

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अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में उनका मुख्य फोकस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर है. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं. अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में उनकी गहरी रुचि रही है, जिसने उन्हें वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. यही वजह है कि उनके लेखों में विषय की गहराई, एक्सपर्ट्स की राय के साथ उनके कमेंट्स, तथ्यों की सटीकता और व्यापक संदर्भ देखने को मिलता है. बदलते वैश्विक परिदृश्य पर उनकी पैनी नजर रहती है, जिससे वे पाठकों तक समय पर विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक जानकारी पहुंचाते हैं. अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है. इसके साथ ही वह कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं. उत्तर प्रदेश की कालीन नगरी- भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं. तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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