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Home World ग्रीनलैंड की चाहत में किसी भी हद तक जा सकते हैं ट्रंप? इन 5 ऑप्शंस से उड़ी है डेनमार्क की नींद 

ग्रीनलैंड की चाहत में किसी भी हद तक जा सकते हैं ट्रंप? इन 5 ऑप्शंस से उड़ी है डेनमार्क की नींद 

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ग्रीनलैंड की चाहत में किसी भी हद तक जा सकते हैं ट्रंप? इन 5 ऑप्शंस से उड़ी है डेनमार्क की नींद 
अमेरिका के पास ग्रीनलैंड लेने के लिए कौन-कौन से ऑप्शंस हैं?

How US could seek to gain control over Greenland: वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई करने वाले अमेरिका ने अब ग्रीनलैंड को लेने के लिए अपने इरादे पूरी तरह साफ कर दिए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर “कब्जा” करने को लेकर कई तरह के बयान दे चुके हैं. उनके साथ उनका प्रशासनिक तंत्र भी उसी भाषा में जवाब दे रहा है. इन टिप्पणियों के बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड के वॉशिंगटन स्थित प्रतिनिधियों ने अमेरिकी सत्ता तंत्र के साथ संपर्क तेज कर दिया है. ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है. यह भौगोलिक रूप से आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है और इसी वजह से अमेरिका की नजर में इसका विशेष महत्व रहा है. वह इसे सुरक्षा के लिहाज से जरूरी बता रहा है. ऐसे में अगर ट्रंप इसे लेना चाहें, तो उनके पास कौन-कौन से विकल्प हैं?

बातचीत से नहीं सुलझा मामला

आर्कटिक सर्कल के ऊपर स्थित विशाल ग्रीनलैंड का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा बर्फ से ढका है. इसकी आबादी करीब 57,000 मानी जाती है, इनमें अधिकांश लोग इनुइट समुदाय से आते हैं. इस 21 लाख 66 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले देश को लेने के लिए अमेरिका ने पहले बातचीत का विकल्प दिया. लेकिन इसे कहीं से भी खास तवज्जो नहीं दी गई. ऐसे में इस विकल्प पर बात नहीं बनी. ट्रंप ने सबसे पहले 2019 में इस द्वीप को खरीदने की योजना बनाई थी, लेकिन डेनमार्क ने इसे बकवास करार दिया. ट्रंप ने गुस्से में आकर डेनमार्क की यात्रा ही रद्द कर दी. अब 2026 में एकबार फिर उन्होंने ग्रीनलैंड लेने वाला कार्ड चल दिया है. 

सैन्य कार्रवाई का डर दिखाया

ट्रंप प्रशासन की ओर से फिर सैन्य कार्रवाई का शिगूफा छोड़ा गया. ग्रीनलैंड में डेनमार्क की सेना तैनात है. आर्कटिक जॉइंट फोर्स में कुल सैनिकों की संख्या मात्र 300 है, ऐसे में अमेरिका की एक बटालियन (800-900) ही काफी होंगे. यानी वेनेजुएला में किया गया ऑपरेशन, अगर ग्रीनलैंड में दोहरा दिया जाए, तो इस बार पूरे देश को कब्जाने के लिए काफी होगा. हालांकि ट्रंप प्रशासन की इस टिप्पणी और एडवेंचर पर डेनमार्क ने तो तीखी प्रतिक्रिया दी ही, यूरोप ने भी अपने पड़ोसी देश का ही साथ दिया. डेनमार्क ने 1952 के कानून की याद दिलाई कि अगर कोई भी आक्रामक शक्ति यहां दिखी तो तैनात सैनिक पहले गोली मारेंग और प्रश्न बाद में पूछेंगे. इससे पहले डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने हमले की स्थिति में NATO के अंत वाली चेतावनी भी दी थी. 

कैश लो और देश दो

डोनाल्ड ट्रंप आसानी से हार मानने वाले इंसान तो बिल्कुल नहीं लगते. इन दोनों पर बात नहीं बनी, तो प्रशासन की ओर से पैसे का लालच दिया गया. रॉयटर्स की एक खबर के मुताबिक व्हाइट हाउस ग्रीनलैंड के प्रत्येक नागिरक को 1 लाख डॉलर देने की योजना बना रहा है. इसके बदले ग्रीनलैंड में अमेरिका का कब्जा हो जाए. गुरुवार को प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि वह उस पुराने समझौते तक सीमित नहीं रहना चाहते, जिसके तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति मिलती है, बल्कि पूरे द्वीप का स्वामित्व चाहते हैं. उन्होंने तर्क दिया कि मालिकाना हक़ से वह फायदे मिलते हैं, जो किसी पट्टे या संधि से संभव नहीं हैं. गौरतलब है कि अमेरिका 1951 की एक संधि का हिस्सा है, जिसके तहत डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सहमति से उसे वहां सैन्य अड्डे स्थापित करने के व्यापक अधिकार प्राप्त हैं.

ये विकल्प तो ऐसे हैं, जिन पर कुछ प्रगति हो चुकी है, इनके अलावा भी कुछ ऑप्शंस हैं, जिन पर अमेरिका काम कर सकता है. 

ग्रीनलैंड की स्वतंत्रता और फिर कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन

अमेरिका इस मुद्दे पर इतना आगे बढ़ गया है कि डेनमार्क-ग्रीनलैंड को अपने दूतों को बातचीत के लिए भेजना पड़ रहा है. खैर इसी चर्चा के बीच तहत एक विकल्प “कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन” का भी है. ऐसा समझौता अमेरिका ने कुछ प्रशांत द्वीपीय देशों के साथ किया हुआ है. ऐसे समझौतों में आमतौर पर अमेरिका सुरक्षा और सेवाएं प्रदान करता है, बदले में उसे रणनीतिक और सैन्य पहुंच मिलती है. हालांकि, ऐतिहासिक रूप से ऐसे समझौते केवल स्वतंत्र देशों के साथ ही हुए हैं, यानी ग्रीनलैंड को पहले डेनमार्क से अलग होना पड़ेगा.

अर्थव्यवस्था की बिगड़ती हालत और फिर जनमत

सैद्धांतिक रूप से वित्तीय प्रलोभनों का इस्तेमाल ग्रीनलैंड के लोगों को स्वतंत्रता के समर्थन में जनमत संग्रह के लिए प्रेरित करने या स्वतंत्रता के बाद ऐसे किसी समझौते के पक्ष में माहौल बनाने के लिए किया जा सकता है. सर्वेक्षण लगातार दिखाते हैं कि डेनमार्क से eventual (आखिरकार) स्वतंत्रता के पक्ष में समर्थन मजबूत है, लेकिन आर्थिक चिंताओं के चलते अब तक सांसद जनमत संग्रह कराने से बचते रहे हैं. सर्वे यह भी बताते हैं कि अधिकतर ग्रीनलैंडवासी अमेरिका का हिस्सा बनना नहीं चाहते, भले ही वे ज्यादा स्वायत्तता के पक्ष में हों.

देशों के बीच चल रही बातचीत

डेनमार्क के राजदूत जेस्पर मोलर सोरेन्सन और वॉशिंगटन में ग्रीनलैंड के शीर्ष प्रतिनिधि जैकब इस्बोसेथसेन ने गुरुवार को व्हाइट हाउस की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अधिकारियों से मुलाकात की. डेनिश सरकार के अधिकारियों ने गोपनीयता की शर्त पर बताया कि इस बैठक में ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को, संभवतः सैन्य ताकत के इस्तेमाल से, अपने नियंत्रण में लेने के नए संकेतों पर चर्चा हुई. हालांकि, व्हाइट हाउस ने इस मुलाकात को लेकर पूछे गए सवालों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी.

रुबियो ने होले से रखा हाथ, वेंस ने जोर से दबाया

इसके साथ ही, दोनों दूत इस सप्ताह अमेरिकी सांसदों से भी कई दौर की बातचीत कर चुके हैं. इन बैठकों का मकसद ट्रंप पर दबाव बनाने के लिए समर्थन जुटाना है, ताकि वह अपने रुख पर पुनर्विचार करें. इस बीच, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के अगले सप्ताह डेनमार्क के अधिकारियों से मुलाकात करने की संभावना जताई जा रही है. डेनमार्क के अधिकारी विदेश मंत्री रुबियो के साथ होने वाली बातचीत को सकारात्मक मान रहे हैं. डेनमार्क के रक्षा मंत्री ट्रोल्स लुंड पॉल्सन ने कहा कि यही वह संवाद है जिसकी जरूरत है और जिसे डेनिश सरकार ने ग्रीनलैंड सरकार के साथ मिलकर आगे बढ़ाया है.

वहीं इस मुद्दे पर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी यूरोपीय नेताओं को ट्रंप के बयानों को गंभीरता से लेने की सलाह दी. उन्होंने इसे सुरक्षा से जुड़ा मामला बताते हुए कहा कि अगर यूरोप ग्रीनलैंड की सुरक्षा को पर्याप्त महत्व नहीं देता, तो अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है.

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अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में उनका मुख्य फोकस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर है. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं. अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में उनकी गहरी रुचि रही है, जिसने उन्हें वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. यही वजह है कि उनके लेखों में विषय की गहराई, एक्सपर्ट्स की राय के साथ उनके कमेंट्स, तथ्यों की सटीकता और व्यापक संदर्भ देखने को मिलता है. बदलते वैश्विक परिदृश्य पर उनकी पैनी नजर रहती है, जिससे वे पाठकों तक समय पर विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक जानकारी पहुंचाते हैं. अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है. इसके साथ ही वह कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं. उत्तर प्रदेश की कालीन नगरी- भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं. तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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