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Home World बांग्लादेश चुनाव से पहले जमात पर अमेरिका की नजर, भारत की बढ़ी चिंता; चीन भी हुआ एक्टिव

बांग्लादेश चुनाव से पहले जमात पर अमेरिका की नजर, भारत की बढ़ी चिंता; चीन भी हुआ एक्टिव

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बांग्लादेश चुनाव से पहले जमात पर अमेरिका की नजर, भारत की बढ़ी चिंता; चीन भी हुआ एक्टिव
ढाका में जमात-ए-इस्लामी पार्टी की ओर से चुनावी रैली आयोजित करते हुए, यह तस्वीर @BJI_Official के एक्स से ली गई है.

बांग्लादेश में इस्लामी राजनीति के बढ़ते असर को अमेरिका अब नजरअंदाज नहीं कर पा रहा है. बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी आने वाले चुनाव में अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन कर सकती है. इसी को देखते हुए अमेरिकी अधिकारी जमात से बातचीत के रास्ते तलाश रहे हैं. यह खुलासा द वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में हुआ है.

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम भारत के लिए चिंता का कारण बन सकता है, क्योंकि जमात का झुकाव पाकिस्तान की ओर माना जाता रहा है.

अमेरिकी डिप्लोमैट का बयान- बांग्लादेश अब ज्यादा इस्लामिक हो चुका है

द वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, ढाका में तैनात एक अमेरिकी डिप्लोमैट ने 1 दिसंबर 2025 को बांग्लादेशी पत्रकारों से बंद कमरे में बातचीत की. इस बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग अखबार के पास है.

इस दौरान अमेरिकी डिप्लोमैट ने कहा कि अमेरिका को उम्मीद है कि 12 फरवरी 2026 को होने वाले चुनाव में जमात-ए-इस्लामी पहले से कहीं बेहतर प्रदर्शन करेगी. उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेश में एक तरह का इस्लामिक शिफ्ट देखा जा रहा है.

डिप्लोमैट ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका चाहता है कि जमात के नेता उसके दोस्त बनें. उन्होंने पत्रकारों से यहां तक कहा कि जमात की छात्र इकाई इस्लामी छात्र शिबिर के नेताओं को टीवी डिबेट्स में जगह दी जानी चाहिए.

BNP के बाद सबसे मजबूत जमात?

बांग्लादेश में इस समय अंतरिम सरकार है, जिसकी लीडरशिप नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस कर रहे हैं. इसी सरकार ने फरवरी 2026 में चुनाव कराने का वादा किया है. कई सर्वे बताते हैं कि चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) सबसे आगे है, लेकिन जमात-ए-इस्लामी उसके काफी करीब पहुंच चुकी है. इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट (IRI) की दिसंबर 2025 की एक रायशुमारी के मुताबिक, जमात को करीब 53% लोगों की पसंद बताया गया है. IRI एक अमेरिकी थिंक टैंक है.

1971 के विरोध से मेनस्ट्रीम राजनीति तक जमात का सफर

जमात-ए-इस्लामी का नाम लंबे समय तक बांग्लादेश में विवादों से जुड़ा रहा है. 1971 के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का साथ देने के कारण पार्टी को हमेशा शक की नजर से देखा गया.

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में जमात पर लंबे समय तक पाबंदी भी रही. लेकिन अगस्त 2024 में हसीना सरकार के हटने के बाद हालात बदले.

अब जमात ने अपनी छवि बदलने की कोशिश की है. पार्टी अब भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई, सामाजिक मदद और आम लोगों से जुड़े मुद्दों को सामने रख रही है.

ऑस्ट्रेलिया की वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी के बांग्लादेश राजनीति विशेषज्ञ मुबाश्शर हसन ने द वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक से कहा कि जमात अब मेनस्ट्रीम में आ चुकी है.

छात्र राजनीति से जमीन मजबूत कर रही जमात

जमात की छात्र इकाई इस्लामी छात्र शिबिर ने पिछले साल ढाका समेत कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव जीतकर सबको चौंका दिया.

इससे साफ संकेत मिला कि पार्टी की पकड़ अब सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं रही, बल्कि युवा वर्ग में भी उसका असर बढ़ रहा है. यही वजह है कि अमेरिका भी अब जमात को नजरअंदाज नहीं कर पा रहा.

इस्लामिक गठबंधन में भी खींचतान

हालांकि, जमात की बढ़ती ताकत से सभी इस्लामी दल खुश नहीं हैं. हाल ही में इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश ने जमात के लीडरशिप वाले गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला किया. इससे यह भी साफ होता है कि इस्लामिक राजनीति के भीतर मतभेद और रणनीतिक टकराव मौजूद हैं.

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अमेरिका की साफ चेतावनी- शरिया कानून पर सख्त कार्रवाई

अमेरिकी डिप्लोमैट ने यह भी साफ किया कि अगर जमात सरकार में आती है और शरिया कानून या महिलाओं के अधिकारों पर रोक जैसे कदम उठाती है, तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा. उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास मजबूत इकोनॉमिक हथियार हैं. खास तौर पर गारमेंट इंडस्ट्री, जो अमेरिका को बांग्लादेश के करीब 20% एक्सपोर्ट करती है.

डिपलोमैट के मुताबिक, अगर महिलाओं को काम से रोका गया या शरिया लागू हुई, तो अमेरिका 100% टैरिफ लगा सकता है. इससे बांग्लादेश की इकॉनमी को भारी झटका लगेगा.

हालांकि, ढाका स्थित अमेरिकी एम्बेसडर की प्रवक्ता मोनिका शी ने कहा कि यह बातचीत सामान्य और ऑफ-द-रिकॉर्ड थी और अमेरिका किसी एक पार्टी का समर्थन नहीं करता.

भारत की चिंता: जमात, पाकिस्तान और सुरक्षा का सवाल

भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम चिंता बढ़ाने वाला है. नई दिल्ली लंबे समय से जमात-ए-इस्लामी को शक की नजर से देखती आई है. भारत को डर है कि जमात का पाकिस्तान के साथ वैचारिक जुड़ाव और 1971 के इतिहास को लेकर उसका रुख क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है.

अटलांटिक काउंसिल के साउथ एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगलमैन ने द वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, से कहा कि अमेरिका-जमात नजदीकी भारत-अमेरिका रिश्तों में नई परेशानी खड़ी कर सकती है.

माइनॉरिटी पर बढ़ती चिंता

शेख हसीना सरकार के हटने के बाद बांग्लादेश में माइनॉरिटी की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं. पूर्व विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने आरोप लगाया कि यूनुस सरकार के दौर में अवामी लीग समर्थकों और हिंदू समुदाय के खिलाफ डर का माहौल बना है. उनका कहना है कि हिंसा, भीड़ की कार्रवाई और मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन सरकार की तरफ से सख्ती नहीं दिखी.

चीन भी एक्टिव, जमात से सीधी मुलाकात

इस पूरे घटनाक्रम के बीच चीन भी सक्रिय हो गया है. बांग्लादेश में चीनी एम्बेसडर याओ वेन ने हाल ही में जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान से ढाका में मुलाकात की. जमात ने कहा कि चीन-बांग्लादेश संबंधों से दोनों देशों को फायदा हुआ है और आगे भी यह रिश्ता मजबूत होगा. यह मुलाकात इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि जमात इस बार NCP गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रही है, जो पिछले साल के छात्र आंदोलन के बाद उभरा है.

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