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Home World क्या खामेनेई को मार के ट्रंप ने बड़ी भूल कर दी? आ सकता है जलजला; 8 पॉइंट्स

क्या खामेनेई को मार के ट्रंप ने बड़ी भूल कर दी? आ सकता है जलजला; 8 पॉइंट्स

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क्या खामेनेई को मार के ट्रंप ने बड़ी भूल कर दी? आ सकता है जलजला; 8 पॉइंट्स
अयातोल्लाह अली खामेनेई. फोटो- एक्स.

Ali Khamenei Death Fallout: अमेरिका भले ही अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या को अपनी बड़ी रणनीतिक कामयाबी के तौर पर पेश कर रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि इस घटना ने मिडिल ईस्ट में उसकी मुश्किलें और ज्यादा बढ़ा दी हैं. 86 वर्षीय खामेनेई की मौत से अमेरिका के लिए वे लक्ष्य हासिल करना और कठिन हो गया है, जिन्हें वह बातचीत और दबाव की राजनीति के जरिए पाना चाहता था. इसके साथ ही ईरान में सत्ता परिवर्तन या तख्तापलट की संभावनाएं भी पहले से कहीं ज्यादा उलझ गई हैं. वहीं ईरान पर हमला करके अमेरिका ने ग्लोबल समस्या भी खड़ी कर दी है. 8 पॉइंट्स में समझें दुनिया को आने वाले समय में किन समस्याओं से जूझना पड़ सकता है. 

1. उत्तराधिकारी का पता नहीं

ईरान को अंदेशा था कि इस बार के हमले में उसके सुप्रीम लीडर को निशाना बनाया जा सकता है. इसी वजह से उसने पहले ही “4-प्लस फॉर्मूला” तैयार कर लिया था. इसके तहत हर अहम पद के लिए चार संभावित उत्तराधिकारी तय किए गए थे. यानी खामेनेई के भी चार उत्तराधिकारी पहले से चिन्हित थे. हालांकि, पहले यह साफ था कि सत्ता किसके हाथ में है, लेकिन अब हालात धुंधले हो गए हैं. फिलहाल यह तय नहीं है कि फैसले कौन ले रहा है. ईरान ने अभी तक नए सुप्रीम लीडर का ऐलान नहीं किया है, जिससे पर्दे के पीछे रणनीति तैयार की जा रही है. यह स्थिति अमेरिका के हित में नहीं है. क्योंकि जिन नेताओं को खामेनेई के बाद संभावित उत्तराधिकारी माना जा रहा है, वे उनसे भी ज्यादा कट्टर विचारधारा वाले हैं और उन्हें दबाव में लाना अमेरिका के लिए आसान नहीं होगा.

2. तख्तापलट की राह अब धूमिल दिख रही

ईरान में सत्ता बदलना अमेरिका के लिए पहले भी आसान नहीं था और अब यह और मुश्किल हो गया है. सिर्फ हवाई हमलों से सरकार बदलना संभव नहीं है. अगर अमेरिका वास्तव में ईरान पर नियंत्रण चाहता है, तो उसे अपने सैनिक जमीन पर उतारने होंगे. रिपोर्ट्स के मुताबिक सत्ता पर पकड़ बनाने के लिए अमेरिका को कम से कम 10 लाख सैनिक ईरान भेजने पड़ सकते हैं. यह फैसला न सिर्फ सैन्य बल्कि राजनीतिक तौर पर भी बेहद जोखिम भरा है. अमेरिकी जनता इस तरह के युद्ध के लिए तैयार नहीं है. सर्वे बताते हैं कि आधे से ज्यादा अमेरिकी नागरिक 10 से ज्यादा सैनिकों की मौत तक को स्वीकार नहीं कर पाएंगे.

3. अमेरिका के खिलाफ ‘लॉन्ग वॉर’ की शुरुआत

खामेनेई की हत्या को ईरान सिर्फ एक सैन्य हमला नहीं, बल्कि इस्लामिक क्रांति पर सीधा हमला मान रहा है. यही वजह है कि अब ईरान की रणनीति “तुरंत जवाब” से आगे बढ़कर लॉन्ग वॉर (दीर्घकालिक युद्ध) की तरफ जाती दिख रही है. रणनीतिक मामलों के जानकारों के मुताबिक, ईरान जानता है कि वह अमेरिका से सीधे युद्ध में नहीं जीत सकता, लेकिन वह अमेरिका को धीरे-धीरे थकाने की नीति पर काम करेगा, जैसा रूस यूक्रेन युद्ध में हुआ था. अमेरिका को ईरान के आस-पास हैवी मिलिट्री प्रेजेंस बनाए रखनी पड़ सकती है. इसका मतलब यह है कि आने वाले महीनों और सालों में- मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों पर छिटपुट हमले हो सकते हैं. 

4. प्रॉक्सी वॉर में तेजी

ईरान अब तक इजराइल के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर लड़ता आया है. ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी प्रॉक्सी आर्मी है, जिसमें हिज़्बुल्लाह, हूती, इराक और सीरिया के मिलिशिया शामिल हैं. खामेनेई की मौत के बाद इन सभी संगठनों को अब एक धार्मिक मिशन मिल गया है- “शहीद लीडर का बदला”. ऐसे में आने वाले समय में इजरायल पर खतरा और बढ़ेगा. हालांकि, इजरायल ने समय रहते हमास और हिज्बुल्लाह की लीडरशिप को काफी हद तक कमजोर कर दिया है, लेकिन खत्म नहीं कर पाया है.  

5. तेल सप्लाई रूट्स पर दबाव

ईरान की लोकेशन ऐसी जगह है, जहां से दुनिया का 20 % तेल और गैस का परिवहन होता है. फारस की खाड़ी में स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का पूरा शासन माना जा सकता है. इस संकरे जलमार्ग पर कुछ इलाकों में समुद्र की चौड़ाई 3  किमी तक ही है. ऐसे में ईरान जैसी बड़ी सैन्य ताकत इसे बंद करेगी, तो तेल महंगा हो सकता है, जिसकी वजह से दुनिया भर में अन्य कमोडिटीज की कीमतों में भी तेजी आएगी.  

6. अमेरिका के सहयोगियों पर बढ़ता खतरा

खामेनेई की हत्या अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त कार्रवाई थी. इसका सीधा असर अब अमेरिका के उन सहयोगी देशों पर पड़ सकता है, जो मिडिल ईस्ट में ईरान की नजर में हैं. ईरान पहले ही यूएई, सऊदी अरब, बहरीन और जॉर्डन जैसे देशों को चेतावनी के दायरे में ले चुका है. ईरान की सुरक्षा सर्वोच्च परिषद के सचिव अली लारिजानी ने कहा कि अमेरिका ने “ईरान के दिल पर हमला किया है” और जवाब में ईरान भी “उसके दिल” पर वार करेगा. उनका इशारा सऊदी अरब की तरफ था, जिसे मिडिल ईस्ट में अमेरिकी रणनीति का केंद्र माना जाता है. इन हमलों की वजह से मिडिल ईस्ट के इन देशों ने अपने एयरपोर्ट बंद कर दिए हैं. भारतीय यात्रियों के साथ दुनिया भर के यात्रियों को इससे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.  

7. साइबर अटैक और ड्रोन स्ट्राइक

ईरान वेनेजुएला नहीं है. उसके पास एजुकेटेड लेकिन कट्टर धार्मिक जनता भी है. साइबर हमले भी ईरान की राडार पर होंगे. इसके साथ ही ईरान के पास शाहेद ड्रोन की अच्छी खासी संख्या है. इन्हें दुनिया के बेस्ट ड्रोन माना जाता है और ईरान के पास कुल 80,000 शाहेद ड्रोन हैं. ऐसे में ईरान की ओर से साइबर अटैक और ड्रोन स्ट्राइक्स की बाढ़ आ सकती है. 

8. सहानुभूति से मजबूत हुआ इस्लामिक गणराज्य

हालांकि ईरान में लोग सरकार से नाराज़ थे, लेकिन खामेनेई की व्यक्तिगत लोकप्रियता बहुत मजबूत थी. वे आखिरी समय तक आम लोगों से मिलते-जुलते रहे. उनकी मौत ने इस्लामिक गणराज्य को एक बड़ा “सिंपैथी फैक्टर” दे दिया है. रणनीतिक मामलों के जानकार एडम कोचनर के मुताबिक, अमेरिका ने खामेनेई को मारकर उन्हें धार्मिक रूप से ‘शहीद’ बना दिया है. अब ईरानी नेतृत्व इस भावना का इस्तेमाल पूरे देश में करेगा. खामेनेई के नाम पर उनके उत्तराधिकारी अपने कट्टर एजेंडे को और मजबूती से आगे बढ़ा सकेंगे.

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ईरान की सैन्य क्षमता कितनी है?

ईरान के पास भले ही परमाणु हथियार न हों, लेकिन उसकी मिसाइल और ड्रोन क्षमता उसे बेहद खतरनाक बनाती है. ईरान के पास करीब 3,000 मिसाइलें हैं, जिनमें लगभग 1,200 लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम हैं. इसके अलावा शाहेद ड्रोन को दुनिया के सबसे घातक ड्रोन सिस्टम्स में गिना जाता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान के पास करीब 80 हजार शाहेद ड्रोन हैं. जमीनी ताकत की बात करें तो ग्लोबल फायर पावर के अनुसार ईरान के पास लगभग 6 लाख सक्रिय सैनिक हैं. वहीं कुख्यात इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के पास करीब 1.5 लाख जवान हैं. इसके अलावा ‘बासिज फोर्स’ के तहत ईरान ने लगभग 1 करोड़ लोगों को सैन्य प्रशिक्षण दे रखा है, जो सीधे IRGC के नियंत्रण में रहते हैं.

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संघर्ष अब किसी एक ऑपरेशन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अमेरिका के लिए एक अंतहीन संकट बन सकता है. अमेरिका को हर जगह हाई अलर्ट पर रहना होगा—चाहे वह इराक हो, सीरिया हो, लाल सागर हो या खाड़ी क्षेत्र. यही वजह है कि कई अमेरिकी विश्लेषक कह रहे हैं कि खामेनेई की हत्या से अमेरिका ने भले एक व्यक्ति को खत्म किया हो, लेकिन उसने पूरे सिस्टम को और ज्यादा कट्टर, ज्यादा खतरनाक और ज्यादा संगठित बना दिया है.

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अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में उनका मुख्य फोकस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर है. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं. अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में उनकी गहरी रुचि रही है, जिसने उन्हें वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. यही वजह है कि उनके लेखों में विषय की गहराई, एक्सपर्ट्स की राय के साथ उनके कमेंट्स, तथ्यों की सटीकता और व्यापक संदर्भ देखने को मिलता है. बदलते वैश्विक परिदृश्य पर उनकी पैनी नजर रहती है, जिससे वे पाठकों तक समय पर विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक जानकारी पहुंचाते हैं. अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है. इसके साथ ही वह कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं. उत्तर प्रदेश की कालीन नगरी- भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं. तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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