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Home विशेष उल्लेख अलविदा ओमपुरी

अलविदा ओमपुरी

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अलविदा ओमपुरी

मुंबई. अपनी नायाब अदाकारी व रौबदार आवाज के लिए पहचाने जानेवाले दिग्गज अभिनेता ओमपुरी (66) का शुक्रवार की सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. अभिनेता ने ‘अर्ध सत्य’, आक्रोश’, ‘सिटी ऑफ जाय’, में अपनी बेहतरीन अदाकारी से दुनिया भर में लोकप्रियता हासिल की. उनके परिवार में उनकी परित्यक्त पत्नी नंदिता और बेटा इशान है.

मोदी, नीतीश ने शोक जताया : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रंगमंच और फिल्मों में पुरी की लंबी यात्रा को याद किया तो सोनिया गांधी ने उन्हें बहुमुखी प्रतिभा का धनी बताया. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ओमपुरी के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि वह लोगों के बीच काफी लोकप्रिय थे.

उम्दा अभिनेता, जिंदादिल इनसान

कुंदन शाह, फिल्म निर्देशक

बहुत ही जिंदादिल इनसान थे ओम. शुरुआत में लोग उन्हें सीरियस अभिनेता के रूप में जानते थे, लेकिन उनकी कॉमिक कमाल की थी. उनकी कॉमिक टाइमिंग और सेंस ऑफ ह्यूमर से सेट पर हम सभी अक्सर लोटपोट हो जाते थे. गोविंद निहलानी की फिल्म आक्रोश करने के बाद उनकी छवि गंभीर कलाकार की बन गयी.

तंगहाली के बावजूद उन्होंने इस छवि को तोड़ने के लिए एक नाटक बिच्छू किया, जिसमें वह एक कंजूस के किरदार में थे. उम्दा अभिनय की वजह से वह नाटक काफी सफल रहा. उस नाटक से रंजीत राय भी जुड़े थे, जो फिल्म जाने भी दो यारों के डायलॉग राइटर भी थे. उनकी वजह से मैंने वह नाटक देखा और मैंने उन्हें जाने भी दो यारो ऑफर कर दी.

महाभारत सीन में काले रंग का चश्मा लगाने का आइडिया उनका ही था, लेकिन मैं मान नहीं रहा था. मेरे जेहन में था कि महाभारत के सीन में कोई गोगल्स कैसे पहन सकता है. मैं मना कर रहा था. मुझे ये लुक और सीन मिसमैच लग रहा था, लेकिन ओम बहुत मेहनत करके वहां तक पहुंचे थे. उन्हें सीन से लेकर सिचुएशन सभी की समझ थी. उन्होंने मुझे समझाया कि इस सीन में जो भी किरदार बैकस्टेज जा रहे हैं, हम उन्हें मारकर उनके कपड़े पहन रहे हैं. इसी जल्दीबाजी में मैं अपना गोगल्स निकालना भूल गया हूं, यह बात दर्शक समझेगा.

मुझे ओम की बात जंच गयी. वाकई महाभारत वाले सीन में उनका गोगल्स पहन कर आना सीन में और ज्यादा ह्यूमर ले आया था.

उनसे जुड़ी कई बातें जेहन में घूम रही हैं. जाने भी दो यारों एक कॉमेडी फिल्म थी और कॉमेडी एक्शन और रिएक्शन का दूसरा नाम है. इस फिल्म के सबसे मुश्किल दृश्य में एक ब्रिज पर सतीश शाह और ओम जी वाला दृश्य था. सतीश डेड बॉडी थे. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे वह सीन हो पायेगा, जब एक्शन का रिएक्शन ही नहीं होगा. तो ओम को मैंने मिलने को बुलाया. मैंने कहा कि सीन कैसे होगा. उसने मुझसे कहा, चलो सतीश के घर चलते हैं. आधी रात को हम सतीश के घर पहुंचे. ओम ने बातचीत की सतीश से और कहा कि मुझे परेशान होने की जरूरत नहीं है. वाकई अगले दिन ओम ने वह सीन बखूबी निभा दिया. कॉमेडी में बिना किसी एक्शन के रिएक्शन कैसे दिया जाता है, यह ओम ने साबित कर दिया.

फिल्म जाने भी दो यारों की शूटिंग के वक्त अक्सर ओम सहित दूसरे सारे कलाकार मेरी बहुत खिंचाई करते थे कि वे अपने कैरियर की सबसे तंगहाल प्रोडक्शन हाउस के साथ काम कर रहे हैं.

ओम का तो तकिया कलाम बन गया था कि मूंग की दाल और लौकी की सब्जी मैंने पूरी जिंदगी में जितना नहीं खाया था, उतना इस फिल्म की शूटिंग के दौरान खाया है. ये सही भी था, क्योंकि फिल्म का पूरा बजट नौ लाख रुपये था. इसलिए लंच और डिनर दोनों में ही चावल और रोटी के साथ मूंग की दाल और लौकी की सब्जी होती थी, लेकिन ओम सहित दूसरे सभी कलाकार बहुत मदद करते थे. अलीबाग में शूटिंग के दौरान गद्दे नहीं थे तो सब अपनी टॉवल ही बिछाकर सो जाते थे. यूनिट में सबको मिला कर 50 से 60 लोग थे. दाल सबको मिले, इसलिए ओम दाल में पानी मिला देते थे. यह उनकी सामाजिकता को दरशाता है.

एनएसडी के दिनों से नसीर और ओम की दोस्ती थी. उनकी दोस्ती खास रही है. ओम बताते थे कि नसीर की वजह से ही वह मांसाहारी हुए थे. नसीर के ना कहने पर उन्हें जो फिल्म मिलती थी, वह नसीर का उसके लिए भी शुक्रिया अदा करने से नहीं हिचकते थे. मैंने सुना कि अर्धसत्य के लिए गोविंद की पहली पसंद अमिताभ बच्चन थे, लेकिन अमिताभ ने उस फिल्म को इनकार कर दिया था. ओम ने अमिताभ का भी इस वजह से शुक्रिया अदा किया था.

ओमपुरी को अपने चेहरों के गड्ढे और मोटी नाक पर नाज था. कई लोगों ने उन्हें कहा था कि प्लास्टिक सर्जरी करवा लो, लेकिन वो कहते कि जैसे कुदरत ने मुझे बनाया है, मैंने स्वीकार कर लिया है. वह कहते थे कि लोग उन्हें उनके चेहरे से नहीं, बल्कि उनके अभिनय और काम से जानते हैं, जो उन्होंने गढ़ा है. वाकई उनका काम ही उनकी पहचान रही. एक दिलचस्प वाकया बताता हूं. महमूद साहब ने एक बार इंटरव्यू में कहा था कि यार एक वो एक्टर है… क्या नाम है उसका, जिसके चेहरे पर एक किलो कीमा भी भरो तो भी गड्ढे नहीं भरेंगे. लेकिन, क्या एक्टर है यार. प्रभावित कर जाता है. कमाल का अभिनेता है.

ओम को नाच-गाना खूब भाता था. उनको जब भी उनके दोस्तों का साथ मिलता, वह गाते-नाचते उस पल को एन्जॉय करते थे. किशोर कुमार का गाया गाना- आ चल के तुझे मैं लेके चलूं, फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया’, शहीद का गाना- जोगी हम तो लुट गये तेरे प्यार में… ये गीत उन्हें सुनना और गुनगुनाना बहुत पसंद था.

(उर्मिला कोरी से बातचीत पर आधारित)

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