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Home विशेष उल्लेख ‘राज्य’ से आगे निकलता ‘राष्ट्रीय’

‘राज्य’ से आगे निकलता ‘राष्ट्रीय’

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‘राज्य’ से आगे निकलता ‘राष्ट्रीय’

झारखंड के चुनाव नतीजे आ चुके हैं. राज्य गठन के बाद पहली बार किसी एक गंठबंधन को बहुमत मिला है. इस बार चुनाव में पूरे राज्य में क्या मुद्दे वोटरों के दिमाग में छाये रहे, केंद्र की मोदी सरकार के कामकाज का कितना असर रहा. प्रभात खबर के लिए इसका गंभीर विश्‍लेषण किया है सीएसडीएस ने. आप भी पढ़ें..

चौदह वर्ष पूर्व गठित राज्य झारखंड के विधानसभा चुनावों में लगभग पूरी तरह से स्थानीय मुद्दे और राज्य-स्तरीय कारक निर्णायक भूमिका निभाते रहे थे, लेकिन पहली बार इस चुनाव में ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रीय स्तर के कारकों ने भी प्रभाव डाला है. दरअसल, इन कारकों ने राज्य-स्तरीय कारकों को परे धकेल दिया है और यह तथ्य भाजपा की सीटों में दोगुनी बढ़ोतरी को समझने में काफी हद तक सहायक है. सीएसडीएस की लोकनीति द्वारा मतदान के बाद 19 सीटों के 1,597 वोटरों में कराये गये सर्वे से भी विधानसभा चुनाव में ‘राष्ट्रीय’ की यह भूमिका रेखांकित हुई थी.

सर्वेक्षण में पाया गया था कि भारतीय जनता पार्टी को इस बात से स्पष्ट लाभ हुआ था कि उसकी केंद्र में अभी-अभी सरकार बनी है और उसका हनीमून पीरियड अभी भी चल रहा है.

तीन में से दो यानी 65 फीसदी लोगों का मानना था कि झारखंड के विकास के लिए यहां भी उसी दल की सरकार होनी चाहिए, जो केंद्र में भी सत्ता में है (तालिका संख्या 1 देखें). भाजपा को वोट देनेवाले लोगों में यह भावना और भी अधिक थी. ऐसे लोगों की संख्या 73 फीसदी थी, यानी हर चार में से तीन मतदाता ऐसा मानते थे.

तालिका संख्या 2 : राज्य सरकार, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और केंद्र सरकार के प्रदर्शन से लोगों की संतुष्टि

प्रदर्शन पूरी तरह संतुष्ट एक हद तक संतुष्ट एक हद तक असंतुष्ट पूरी तरह असंतुष्ट कोई राय नहीं

झामुमोनीत राज्य सरकार 11 51 14 20 04

बतौर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन 12 51 16 16 05

भाजपानीत केंद्र सरकार 31 50 11 06 02

झारखंड के राज्य-स्तरीय चुनाव पर ‘राष्ट्रीय’ प्रभाव का एक सूचक यह भी है कि जब लोगों से मुख्यमंत्री पद के लिए पसंदीदा नाम बताने के लिए कहा गया, तो छह फीसदी लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिया (तालिका संख्या 3 देखें). यह भी दिलचस्प है कि राज्य के कई बड़े नेता चुनाव हार गये हैं. सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि बहुप्रचारित जन धन योजना, जो प्रधानमंत्री की विशेष योजना है, झारखंड में बहुत लोकप्रिय है. सर्वेक्षण में शामिल लोगों में से 67 फीसदी को इस योजना के बारे में जानकारी थी. लगभग 50 फीसदी लोगों ने बताया कि उन्होंने या उनके परिवार के किसी सदस्य ने सरकारी योजना के अंतर्गत पिछले दो-तीन महीने में बैंक में खाता खोला है (तालिका संख्या 4 देखें).

तालिका संख्या 3 : मुख्यमंत्री पद के लिए पसंद

नाम फीसदी

अर्जुन मुंडा 19

हेमंत सोरेन 16

बाबूलाल मरांडी 13

शिबू सोरेन 06

नरेंद्र मोदी 06

सुबोधकांत सहाय 03

सुदेश महतो 02

भाजपा से कोई अन्य 08

कांग्रेस से कोई अन्य 04

अन्य 07

कोई राय नहीं 16

तालिका संख्या 4 : जन धन योजना को लेकर जबरदस्त जागरूकता

हां नहीं

जन धन योजना के बारे में जानते हैं 67 33

पिछले दो महीने में खाता खुलवाया 50 50

झारखंड के चुनाव और सीएसडीएस के सर्वेक्षण के नतीजे मोदी सरकार और भाजपा के लिए निश्चित रूप से संतोषजनक हैं, लेकिन सावधानी बरतने के कुछ कारण भी मौजूद हैं. गैर-भाजपा दलों का आपसी गंठबंधन कर पाने में विफलता ने भाजपा की जीत की राह आसान बना दी. अगर ये दल एकजुट होकर चुनाव लड़ते, तो वे मोदी की लोकप्रियता के प्रभाव को रोक सकते थे और उस स्थिति में मुकाबला तगड़ा हो सकता था. यह भी महत्वपूर्ण है कि बड़ी संख्या में मतदाता मोदी द्वारा किये गये ‘अच्छे दिन’ के चुनावी वादे के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं. इस सर्वेक्षण में पाया गया कि 47 फीसदी लोगों की राय है कि मोदी ‘अच्छे दिन’ लाने में असफल रहे हैं. इससे कुछ ही अधिक यानी 49 फीसदी मतदाता मानते हैं कि मोदी ने वादा पूरा किया है (तालिका संख्या 5 देखें). ‘अच्छे दिन’ लाने में मोदी को असफल माननेवाले राज्य के शहरी मतदाताओं की संख्या 56 फीसदी है. यहां तक कि भाजपा को वोट देनेवाले एक-तिहाई लोग भी इस बात से सहमत हैं कि मोदी अपना वादा पूरा करने में असफल रहे हैं. स्पष्ट है कि इतने अधिक वादे कर दिये गये हैं कि मोदी सरकार से लोगों को बहुत उम्मीदें हैं. चुनावी वादों को पूरा करने में देरी से भाजपा को आगामी चुनावों में नुकसान उठाना पड़ सकता है.

तालिका संख्या 5 : मोदी के ‘अच्छे दिन’ के वादे पर लोगों की राय

‘नरेंद्र मोदी अच्छे दिन लाने में असफल रहे हैं’

सहमत असहमत कोई राय नहीं

सभी मतदाता 47 49 03

भाजपा के मतदाता 33 65 02

शहरी मतदाता 56 42 02

संजय कुमार : सीएसडीएस, दिल्ली के डायरेक्टर हैं; श्रेयस सरदेसाई : लोकनीति, सीएसडीएस में रिसर्च एसोसिएट हैं.

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