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Home विशेष उल्लेख सामाजिक उत्सव का पर्व छठ

सामाजिक उत्सव का पर्व छठ

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सामाजिक उत्सव का पर्व छठ
।। आलोक धन्वा ।।
जाने-माने कवि और बिहार संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष
कल नहाय-खाय के साथ शुरू होगा चार दिवसीय लोक पर्व
सूर्य उपासना का पर्व छठ एक सांस्कृतिक और सामाजिक उत्सव भी है. सूर्य, नदी, तालाब, पेड़ और फल से जुड़ा यह प्रकृति पर्व सफाई, सामूहिकता और बराबरी का बोध कराता है. 27 अक्तूबर को नहाय-खाय के साथ चार दिवसीय लोक पर्व की शुरुआत होगी. पहला अर्घ 29 अक्तूबर को होगा. छठ के मौके पर आज से विशेष श्रृंखला की शुरुआत, जिसमें जाने-माने लोग छठ के अलग-अलग पक्ष पर रोशनी डालेंगे. आज पढ़िए, प्रसिद्ध कवि आलोक धन्वा को.
गहरी लोक आस्था का पर्व छठ मूलत: सूर्य की उपासना का पर्व है. यह बिहार और इसकी सीमाओं तक सीमित नहीं है. जहां-जहां बिहार के लोग गये, वहां-वहां छठ पर्व की शुरुआत हो गयी. आज मुंबई, दिल्ली, बनारस आदि जगहों पर भी छठ पूजा धूम-धाम से की जाती है.
मैं बहुत छोटी उम्र से ही छठ पूजा के समय घाटों पर जाता रहा हूं. मुंगेर, जहां मैं पैदा हुआ, वहां तीनों ओर गंगा के घाट हैं. दूर-दराज से हजारों छठव्रती वहां आते हैं. लाल दरवाजा घाट, कष्ट हरणी घाट और बबुआ घाट पर भारी भीड़ होती थी. मैं दोनों समय (अस्ताचलगामी और उदयाचलगामी) के अर्घ में घाट पर जाता था. सुबह के समय घर में मां-बहनें मुङो जगा देतीं थीं.
मेरी स्मृति इस पर्व से बहुत ज्यादा जुड़ी हैं. इस पर्व की स्वच्छता और कठिन अनुशासन किसी को भी प्रभावित करेगा. सहज भाव से मैं यह मानता हूं कि यह पर्व नवान्य जैसा है. जब हमारी फसलें पकने को होती हैं, उस समय दो महत्वपूर्ण पर्व होते हैं. छठ और नवान्य. किसानों के लोक जीवन से जुड़ा यह पर्व अब बाहरी इलाकों में भी उतना ही लोकप्रिय हो गया है. जब मैं पटना में पटना कॉलेज के छात्र के रूप में आया, उस समय भी नियमित रूप से छठ के दिन गंगा के घाट पर जाता था. इस पर्व में बिना किसी के कहे जनता जिस तरह सड़कों को साफ करती है, अपनी नैतिक जिम्मेदारी मान कर, वह किसी को भी प्रभावित कर सकता है.
इस पर्व में कठिन उपवास होता है. जो पकवान पकाये जाते हैं, वह छठ के ही पकवान होते हैं. ठेकुआ सिर्फ छठ में ही पकाया जाता है. सूप पर रखी सामग्री नैसर्गिक लगती है. जामा नींबू इसी पर्व में दिखता है. यह प्रकृति से जुड़ा पर्व है, क्योंकि इसमें लोग नदियों के किनारे जाते हैं. दशहरा और दीपावली के तुरंत बाद इस पर्व को मनाया जाना एक बड़े सामाजिक उत्सव जैसा है.
यह पर्व कब से शुरू हुआ, यह शोध का विषय है, लेकिन यह जिस निष्ठा से मनाया जाता है, वह किसी को भी प्रभावित करेगा. इस पर्व पर गाये जानेवाले गीत मधुर और लोकधुनों से गहरे जुड़े हैं. बिहार की महान लोकगायिकाओं विंध्यवासिनी देवी और शारदा सिन्हा की आवाज में इन गीतों को सुनना मेरे लिए असाधारण अनुभव रहा है.
मैं इस पर्व के लिए व्रतियों को अपनी शुभकामनाएं देता हूं और चाहता हूं कि सामाजिक सौहार्द के साथ इस व्रत का स्वागत किया जाये.
(कौशलेंद्र रमण से बातचीत पर आधारित)
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