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Home Religion नववर्ष 2020 : जानें क्‍या कुछ बदल देगा शनि का गोचर, भय के पर्याय नहीं कर्मफल दाता हैं शनि

नववर्ष 2020 : जानें क्‍या कुछ बदल देगा शनि का गोचर, भय के पर्याय नहीं कर्मफल दाता हैं शनि

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नववर्ष 2020 : जानें क्‍या कुछ बदल देगा शनि का गोचर, भय के पर्याय नहीं कर्मफल दाता हैं शनि

नये वर्ष 2020 में 24 जनवरी की दोपहर 12:04 मिनट पर शनि का गोचर यानी गृह परिवर्तन होने जा रहा है, जो ज्योतिष के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण घटना होगी. इसके बाद धरती पर बहुत कुछ बदल जायेगा. इसके फलस्वरूप कुंभ राशि के लोग शनि के साढ़ेसाती के असर में आ जायेंगे, वहीं मिथुन और तुला राशि के लोग अढ़ैया के जाल में फंसकर फड़फड़ायेंगे. यह वर्ष राजनीतिक और वैचारिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण होने जा रहा है. मगर कौन है यह शनि और क्यों है इनका इतना आतंक? शनि के गोचर से आपके लिए क्या कुछ बदल जायेगा? इसकी गहन पड़ताल कर रहे हैं सदगुरुश्री के नाम से प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु सदगुरुश्री स्वामी आनंदजी.

शनि क्रूर हैं, मारक हैं, अशुभ हैं, भारी हैं, शनि चढ़ गये, शनिच्चर लग गया… शनि के लिए हम कमोबेश ऐसी ही उपमाओं और अलंकार का प्रयोग करते हैं. साधारण व्यक्ति के लिए ‘शनि’ दहशत का पर्यायवाची है. दरअसल, शनि यानी सौर मंडल का सबसे लुभावना ग्रह. अज्ञानता वश उन्हें कष्ट देने वाले ग्रह के रूप में देखा जाता है, अशुभ समझा जाता है. हैरानी की बात कि केवल भारत में ही नहीं, वरन पश्चिमी जगत में भी सैटर्न यानी शनि को कमोबेश ऐसी ही उपाधि प्राप्त है. उन्हें वहां भी टेढ़ी नजरों से ताका जाता है. लेकिन यह धारणा असत्य ही नहीं, शनि के मूल स्वभाव के बेहद विपरीत भी है.

दरअसल, शनि प्राकृतिक संतुलन और समता के मुख्य वाहक और कारक हैं. प्राचीन अभिलेख व पुराणों के सफ़हे पर उभरे उल्लेख शनिदेव को कर्म और न्याय का कर्ता मानते हैं. हां, शनि कष्ट देते हैं, पर सिर्फ उन्हें जिनके कर्मों की दिशा विपरीत है. सच तो यह है कि शनि से बड़ा दाता कोई नहीं. शुभ परिस्थितियों में जो ये कर सकते हैं, वो कोई नहीं कर सकता. जो यह दे सकते हैं, दूसरे ग्रहों के लिए असंभव है. शनि दयालु हैं, मित्र हैं, मोक्ष के कारक हैं, आध्यात्म के प्रवर्तक हैं, और न्याय के सूत्रधार हैं.

  • 2020 में शनि के गोचर से क्या बदल जायेगा
  • शनि का गोचर इससे पहले 26 नवंबर, 2017 को हुआ था, जब शनि वृश्चिक से धनु राशि में आये थे. तब मकर राशि के लोग शनि की साढ़ेसाती के प्रभाव में आये थे और वृष और कन्या राशि के लोग अढ़ैया के प्रभाव में आये थे. यानी शनि अभी धनु राशि में हैं. लिहाजा वृश्चिक, धनु और मकर शनि की साढ़ेसाती के अधीन हैं. जबकि वृष और कन्या राशि शनि की अढ़ैया के प्रभाव में हैं.

2020 में 24 जनवरी की दोपहर जब घड़ी की सूई 12:04 मिनट पर होगी तब शनि का गोचर धनु से मकर में होगा. फलस्वरूप वृश्चिक राशि के लोग साढ़ेसाती और वृष व कन्या के लोग अढ़ैया से मुक्त होकर जश्न मनायेंगे. वहीं कुंभ राशि के लोग साढ़ेसाती की चपेट में आकर तड़फड़ायेंगे. जबकि मिथुन और तुला की अढ़ैया आगाज होगा.

अंक ज्योतिष के लिहाज से 2020 का योग 4 है, जो यूरेनस यानी हर्षल का अंक है. इसे राहु का भी अंक माना जाता है. अतएव नया साल 2, 4, 8, 11, 13, 17, 20, 22, 26 29, 31 तारीख़ को जन्मे लोगों के लिए मील का पत्थर होगा. यह वर्ष राजनीतिक और वैचारिक रूप से सनसनीख़ेज़ होगा. किसी के लिए मील का पत्थर होगा, तो किसी को जमींदोज कर देगा.

आंदोलन और मंदी का साक्षी रहा है शनि का गोचर

नागरिक संशोधन बिल के खिलाफ देश में अचानक बवाल शुरू हो गया है. आज के हालात 30 साल पहले की याद दिलाते हैं जब वीपी सिंह के राज में पूरे देश में मंडल कमीशन के कारण छात्र आंदोलन बारूद की तरह भभक उठा था. उस समय भी आज की मानिंद शनि धनु राशि के अंतिम पायदान पर थे.

इतिहास साक्षी है कि जहां धनु राशि के उत्तरार्ध का शनि आंदोलन, विरोध, हिंसा और आगजनी के लिए जाना जाता है. वहीं धनु के बाद मकर का शनि अर्थव्यवस्था में मंदी का गवाह रही है. पिछली बार धनु के शनि में सिर्फ मंडल कमीशन की ही नहीं, राम मंदिर की भी तपिश देश की जनता को स्पष्ट महसूस हुई थी.

रोचक है कि तब धनु के शनि में राम मंदिर आंदोलन परवान चढ़ा और अब 2019 में धनु के ही शनि में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर बनाने का फ़रमान सुनाया. पिछली बार जब अर्थव्यवस्था की गति मंद हुई थी और चंद्रशेखर सरकार को सोना गिरवी रखना पड़ा था तब भी शनि गोचर में मकर राशि में थे. 10 नवंबर, 1990 को जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे, शनि धनु राशि में था.

15 दिसंबर, 1990 को अलस्सुबह 03 बजकर 04 मिनट पर शनि का गोचर मकर में हुआ और इसी गोचर ने तब भारतीय अर्थव्यवस्था की चूलें हिला कर रख दी थीं. एक वक्त ऐसा आया था कि भारत में विदेशी मुद्रा का भंडार गिर कर सिर्फ़ 1.1 अरब डॉलर रह गया. तब के तीन हफ्ते के आयात के लिए भी पूरा नहीं था. तब भारत सरकार को 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था. इसके भी 30 साल पहले 1959-60 में पुलिस फ़ायरिंग में 105 लोगों की आहुति के पश्चात 1 मई, 1960 को जब बॉम्बे प्रांत के विभाजन के पश्चात महाराष्ट्र और गुजरात दो प्रदेश अस्तित्व में आये थे तब भी शनि धनु राशि में थे.

2 फरवरी, 1961 रात्रि 1:52 पर शनि का मकर में गोचर हुआ था. मकर के शनि में ही 20 अक्तूबर, 1962 को चीन ने भारत पर आक्रमण किया, जिसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा था. 28 फरवरी, 1963 को जब राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद का निधन हुआ था, तब शनि मकर राशि में चलायमान था. एक बार पुनः शनिदेव 24 जनवरी, 2020 को 12 बजकर 4 मिनट पर अपनी ही राशि मकर में जायेंगे, तब क्या इतिहास पुनः खुद को दोहरायेगा, यह देखने की बात होगी.

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