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Home विशेष उल्लेख अगर मांदर नहीं बचेगा तो अखरा नहीं बचेगा

अगर मांदर नहीं बचेगा तो अखरा नहीं बचेगा

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महादेव टोप्पो
झारखंड में रहनेवाले प्रायः सभी आदिवासी-सदान अधिकांशतः तीव्र ध्वनि के वाद्य प्रयोग करते देखे जाते हैं. ऐसा लगता है कि जंगली जानवरों से अपनी व पालतू पशुओं की सुरक्षा के लिए उन्होंने तीव्र वाद्यों का उपयोग करना हित में समझा होगा. नगाड़ों, ढोलों के अतिरिक्त फूंककर बजानेवाले भेंइर, नरसिंघा जैसे वाद्य भी तीव्र ध्वनि उत्पन्न करने वाले होते हैं. झारखंडी अखरा में नृत्य के लिए मांदर बजाकर लोगों को आमंत्रित किया जाता है जिसे अखरा जगाना कहा जाता है.
मांदर, ढोल या ढोलक की प्रजाति का वाद्य है. य़ह आकार में 26 इंच लगभग लंबा होता है. इसका एक छोर थोड़ा बड़ा और दूसरा उससे थोड़ा छोटा होता है.
बड़े वाले हिस्से को थापी या चाटी कहते हैं, जबकि इसके दूसरे हिस्से को तुंग कहते हैं. तुंग वाले हिस्से को दाहिनी ओर तथा थापी वाले हिस्से को बांयी ओर रखकर बजाया जाता है. मांदर के दोनों छोर पर टंगनी बंधे होते हैं, जिससे वादक गले में टांगकर बजाता है. कई नृत्यों में, नाचते-नाचते नर्तक दल मांदर-वादक को अखरा के किनारे पहुंचा देता है तो इसी तरह मांदर-वादक, नर्तक दल को मांदर बजाता हुआ अखरा के दूसरे छोर पर पहुंचा देता है.
इस तरह मांदर-वादक और नृत्य दल नाचने, गाने और बजाने का आनंद लेते हैं. चूंकि अलग- अलग नृत्यों में कदम बढ़ाने के तरीके अलग हैं, साथ ही गीतों के राग भी मौसम के अनुसार अलग-अलग होते हैं. अतः, वादक को इन रागों व नर्तकों को ध्यान में रखकर मांदर बजाने में प्रवीणता अर्जित करनी पड़ती है.
मांदर बनाने की विधि : कुम्हार मांदर का खोल दो हिस्सों में तैयार करता है जिसे जोड़कर मिट्टी के मांदर का खोल तैयार किया जाता है.
कुम्हार इसे पहले सुखाता है और फिर इसे आग में खास विधि व तकनीक की सहायता से पकाता है. उसके बाद इस पर जानवरों के ताजा चमड़ा से दोनों छोरों पर मढ़ा जाता है. सामान्यतः इस पर बकरी का चमड़ा चढ़ाया जाता है. लेकिन, विशेषज्ञ बताते हैं कि हुनुमान या बंदर के चमड़े से बने मांदर से, ज्यादा मधुर गूंजती आवाज निकलती है.
चमड़ा लगाने का काम प्रायः मोची करते हैं. लेकिन कई बार कुछ अन्य हुनरमंद भी यह काम करते देखे गए हैं. घांसी मांदर को छारने (तैयार करने) का काम करता है. खोल की पूरी गोलाई में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर चिरीबाधी मजबूती के लिए लपेटा जाता है.
इसके दोनों छोरों को, पहले पुआल की रस्सी से बांध दिया जाता है. इसे मेंढरी कहा जाता है. इस मेंढरी से लगभग एक-एक अंगुल की दूरी पर चमड़े के पतले लंबे फीते से दोनों छोरों को लंबाई में कसा जाता है. इसके बाद मांदर के दोनों छोरों यानी तुंग और थापी या चाटी पर बीच में कई परत में लेप लगाया जाता है. इस लेप को खरन कहा जाता है.
यह लेप भात, गोंद, काली या गेरुआ, पत्थर कोयले के चूर्ण आदि द्वारा तैयार की हुई होती है. थापी या चाटी की ओर लगाया जानेवाला लेप थोड़ा रुखड़ा (दरदर) होता है. तुंग की ओर लगाया जाने वाला लेप चिकना होता है. खरन या लेप लगे हिस्से से बाहर, बिना लेप लगे हिस्से पर कई बार रंगरेज विभिन्न रंगों से गोलाकार रूप में रंग देते हैं या अन्य डिजाइन बना देते हैं. फलतः, ऐसे मांदर की कुछ अधिक कीमत भी मिल जाती है. दोनों हिस्सों को मोटे टंगनी से बांध दिया जाता है.
मांदर के खोल : पहले प्रकार के मांदर मिट्टी के पके खोलों के बने होते हैं. दूसरे प्रकार के मांदर काठ के खोलों से बने होते हैं जिसे कठमंदरा कहा जाता है.
गुलईची अथवा गम्हार के काठ से बने मांदर हलके होते हैं. तीसरे प्रकार के मांदर के खोल पतले बांस के खरका (पतली खपची) से कुमनी की तरह बने होते है और उस पर मजबूत लेप लगा दिया जाता है. मिट्टी आदि के मांदर टूट-फूट जाते हैं. इसे देखकर कुछ लोगों ने अल्यूमिनियम के चादरों से मांदर के खोल बनाना आरंभ कर दिए हैं.
मांदर का आकार-प्रकार : उरांव मांदर में तुंग वाले हिस्से की ओर खोल का कोर लगभग एक इंच बाहर निकला होता है, जबकि अन्य सभी प्रकार के मांदरों के खोल और तुंग का हिस्सा बराबर में होते हैं. जसपुरिया मांदर अन्य मांदरों की तुलना में थोड़ा लंबा होता है और थापी की ओर थोड़ा हटकर उभरा हुआ होता हैै. झाऱखंड के सदान प्रायः इसी मांदर का उपयोग करते हैं.
खड़िया समुदाय द्वारा प्रयुक्त मांदर, में उभरे हुए भाग पर बाधी सटी हुई नहीं होती है. पश्चिमी भाग के मुंडा मांदर का प्रयोग करते हैं. हो एवं संताल समुदाय द्वारा प्रयोग किए जानेवाले मांदर, मुंडा मांदर से आकार में थोड़े छोटे होते हैं.खोरठा, कुरमाली एवं पंचपरगनिया इलाके के मांदर की लंबाई में बहुत ही छोटे और गोलाई थोड़ा अधिक होता है. इसे बुची या थेचकी मांदर कहा जाता है.
पिछले कुछ दिनों से देखा जा रहा है महानगरों आदि में लोक कलाकारों के साथ कुछ प्रयोगधर्मी व महत्वाकांक्षी संगीतज्ञ कई तरह के नये प्रयोग कर फ्यूजन-सृजन कर रहे हैं. ऐसे में मांदर की पारंपरिक भूमिका खतरे में पड़ सकती है.
हालांकि इस तरह के प्रयोग से उन्हें एक नया मंच मिल जाता है लेकिन, उस मंच में एक झारखंडी मांदर वादक की कितनी अहमियत होगी, यह अभी देखा जाना शेष है. इसलिए अखरा के पारंपरिक स्वरूप को बचाते हुए, मांदर बजाते रहने की परंपरा को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास स्कूल से लेकर अखरा तक करना होगा.
क्योंकि अगर मांदर नहीं बचेगा तो अखरा नहीं बचेगा, अखरा नहीं बचेगा तो लोकगीत नहीं बचेंगे और लोकगीत नहीं बचेंगे तो भाषा नहीं बचेगी. भाषा नहीं बचेगी तो उनकी पहचान संकटग्रस्त तो होगी ही साथ ही झारखंडी समुदाय व संस्कृति की सहयोगिता, सामुदायिकता व सहजीविता भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेगी. अतः, झारखंडी समाज को इस संकट की ओर समय रहते ध्यान देना होगा.
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