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किसान पॉली हाउस में करें सब्जी व फूलों की खेती, होगा अधिक लाभ

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किसान पॉली हाउस में करें सब्जी व फूलों की खेती, होगा अधिक लाभ
पॉली हाउस में खेती किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है. यह एक ऐसी प्रणाली है जिसका उपयोग कर किसान बेमौसम सब्जी लगा कर अधिक लाभ कमा सकते हैं. इस प्रणाली के तहत पहले वातावरण को अनुकूल बनाया जाता है, इसके बाद सब्जी व फूल की फसल उगायी जाती है.
डाॅ अनिल कुमार सिंह, वरिष्ठ वैज्ञानिक, उद्यान विभाग, डाॅ राजेंद्र प्रसाद कृषि विश्वविद्यालय पूसा
पॉली हाउस में खेती एक ऐसी प्रणाली है जिसमें सब्जी व फूल उत्पादन के लिए उपयुक्त एवं नियंत्रित वातावरण बनाया जाता है. इसमें किसान बेमौसम सब्जी व फूल का उत्पादन कर सकते हैं. जबकि खुले खेतों में मौसम के अनुसार ही किसान खेती कर पाते हैं. बेमौसम सब्जी उत्पादन होने से जहां किसान को अधिक लाभ होता है वहीं लोगों को बेमौसम हरी सब्जी खाने को मिल जाती है. पाॅली हाउस एक संरक्षित व फ्रेम युक्त संरचना होती है, जो कि यूभी स्टेबलाइज्ड कम सघनता वाले पॉलीथीन अथवा पारदर्शी प्लास्टिक फिल्म और कीटरोधी नेट से ढके होते हैं. इसके अंदर फसलों को नियंत्रित वातावरण में उगाया जा सकता है. गर्मी के मौसम में पाॅली हाउस को ठंडा करने के लिए दोनों तरफ से पर्दे को उठा दिया जाता है.
फौगर व ड्रिप सिंचाई का उपयोग कर उसे मौसम के अनुकूल बना दिया जाता है. जबकि ठंड के दिनों में पर्दा को गिरा दिया जाता है, जिससे पाॅली हाउस के अंदर तापमान बढ़ जाता है. इससे किसान बेमौसम सब्जी व फूल की खेती कर सकते हैं. इसके साथ ही तापमान नियंत्रण आद्रता के साथ-साथ कार्बन डाइऑक्साइड, मृदा तापमान, पादप पोषक तत्व आदि को नियंत्रित किया जाता है. ताकि वांछित सब्जी फसलों का वर्ष भर उत्पादन लिया जा सके. नियंत्रित जलवायु और मृदा परिस्थितियों से पाॅली हाउस में उगायी गयी सब्जी एवं फूलों की उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है.
पाॅली हाउस में उत्पादन चार गुना अधिक
खुले खेतों के मुकाबले पाॅली हाउस ( ग्रीन हाउस) में उत्पादकता तीन से चार गुनी अधिक बढ़ जाती है.
पाॅली हाउस का उपयोग नर्सरी तैयार करने के लिए भी किया जाता है. इसमें बेमौसम फूलगोभी, बंधागोभी,
भिंडी, खीरा, टमाटर, परवल आदि सब्जियों की खेती की जा सकती है. इसके अलावा फूलों की भी बेमौसम खेती
की जाती है. पाॅली हाउस बनाने में किसानों को खर्च अधिक पड़ जाता है, लेकिन बेमौसम सब्जी उत्पादन होने से कीमत तीन से चार गुना अधिक मिल जाती है.
कीटों तथा खरपतवार का प्रबंधन आसान
छोटे जोत वाले किसानों के लिए पाॅली हाउस अधिक फायदेमंद है. पाॅली हाउस में कीमती फूलों जैसे जरबेरा, लीलीयम व गुलाब की खेती की जाती है. पाॅलीहाउस ( ग्रीन हाउस) मुख्यत: दो तरह के होते हैं. हाइ-टेक पॉली हाउस ( ग्रीन हाउस) – यह पूर्ण रूप से फैन -पैड लगा होता है, साथ ही तापमान नियंत्रण के लिए यंत्र भी लगे होते हैं जिससे किसान खुद से फसल के अनुसार तापमान घटा- बढ़ा सकते हैं. यह ज्यादा कीमती होता है.
नेचुरल पाॅली हाउस ( ग्रीन हाउस) : इसका उपयोग मौसम के अनुसार समान्य ढांचा यानी फगर चलाकर और पर्दे को बंद एवं खोलकर तापमान को नियंत्रित किया जाता है. इसमें खर्च कम आता है.
पाॅली टनेल ( वाक – इन टनल) : इसका उपयोग कम कीमत में एक से दो फसल को ठंड के दिनों में समय से पहले उगाने के लिए किया जाता है. इसकी बनावट बांस और लोहा के छड़ के द्वारा तैयार की जाती है .इसमें खिरावरगीय फसलों के बेमौसम उत्पादन और सीजन से पूर्व उत्पादन को सफलतापूर्वक किया जाता है. इससे कम समय में गुणवत्तायुक्त सब्जी व फूल तैयार हो जाते हैं.
पाॅली हाउस के लिए 50 प्रतिशत अनुदान देती है सरकार
पाॅली हाउस (ग्रीन हाउस ) बनाने के लिए सरकार किसानों को लागत का 50 प्रतिशत अनुदान देती है. पाॅली हाउस बनाने के लिए कम से कम 1000 वर्ग मीटर जमीन चाहिए. उससे
2000 वर्ग मीटर तक पाॅली हाउस बनाने के लिए जिला उद्यान विभाग के माध्यम से किसानों को कुल लागत का 50 प्रतिशत तक अनुदान सरकार देती है. वहीं नेट हाउस के लिए कम से
कम 500 वर्ग मीटर जमीन चाहिए और उससे आगे 2000 वर्ग मीटर तक नेट हाउस के
लिए भी 50 प्रतिशत तक अनुदान सरकार देती है. जो किसान पहले से पाॅली हाउस बनाकर
खेती कर रहे हैं और वह क्षतिग्रस्त हो गया है तो उसकी मरम्मत के लिए 75 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है.
पाॅली हाउस व नेट हाउस : सरकार द्वारा चयनित एजेंसी किसानों के खेतों में मानक के अनुसार उसे तैयार कर किसानों को उपलब्ध करा देता है.पाॅली हाउस बनाने पर 935 रुपये वर्ग मीटर काखर्च आता है.वहीं नेट हाउस के लिए 710 रुपयेवर्ग मीटर खर्च आता है.
नेट हाउस का प्रयोग
नेट हाउस जी आइपाइप, एंगल आयरन तथा बांस की मदद से विभिन्न डिजाइनों में तैयार किया जाता है. डिजाइन के ऊपर हरा या सफेद रंग के यू भी सटैबलाइजड नाइलोन की मदद ली जाती है जिसमें जाल के छिद्र का आकार का 40-50 छिद्र प्रति वर्ग इंच होता है. कीटरोधी नेट हाउस का इस्तेमाल वायरस मुक्त नर्सरी उत्पादन और टमाटर, शिमला मिर्च, खीरा, समर स्क्वैश, करेला, खरबूज, तरबूज, स्ट्रौबरी और पुष्पीय फसलों के उत्पादन के लिए किया जाता है. नेट हाउस का प्रयोग गर्मी के दिनों में फसल उत्पादन के लिए किया जाता है. इसके माध्यम से उत्पादन कर अच्छी उत्पादकता और कीमत किसान ले सकते हैं. ग्रीष्म काल के दौरान पराबैंगनी मिश्रित चमकदार सूर्य प्रकाश के विरुद्ध किया जाता है .
सब्जी उत्पादन कर पांच लाख तक कमाई
पॉली हाउस ( ग्रीन हाउस) में किसान खेती कर अच्छी आमदनी कर सकते हैं. बदलते मौसम और कम होते जोत के रकबे में किसानों के लिए पाॅली हाउस काफी लाभप्रद साबित हो रहा है. सरैया प्रखंड के भटौलिया गांव निवासी और युवा किसान अविनाश कुमार 1000 वर्ग मीटर में सरकार द्वारा अनुदानित दर पर पाॅली हाउस बनाकर उसमें शिमला मिर्च, खीरा और जरबेरा फुल की खेती कर सालाना पांच लाख तक की कमाई कर रहे हैं. अविनाश ने बताया कि सरकार भी इस खेती को बढ़ावा दे रही है, इसलिए पाॅली हाउस बनाने के लिए सरकार अनुदान भी दे रही है.
कैसे करें मिट्टी की तैयारी
अविनाश बताते हैं कि पाॅली हाउस में उगायी जाने वाली फसल के लिए सर्व प्रथम 1000 वर्ग मीटर में तीन टेलर गोबर की खाद डालनी चाहिए. उसके बाद खेत को अच्छे से कुदाल से तामकर मिट्टी को भुरभुरा कर देना है, फिर तीन फीट चौड़ा और 1.5 फीट ऊंचा बेड बनाना पड़ता है.
बेड पर ट्राइकोडर्मा कीटनाशक का उपयोग किया जाता है, इससे पौधे में बीमारी की संभावना कम रहती है. साथ ही वैज्ञानिक द्वारा बतायी गयी मात्रा के अनुसार उर्वरक और माइक्रो न्यूट्रीशन का भी प्रयोग करना चाहिए. समय समय पर मिट्टी जांच भी अत्यंत आवश्यक है. एक बेड पर दो ड्रीप सिंचाई की पाइप बिछाकर उसपर 60 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधा लगाया जाता है.
प्रभेद का चुनाव
किसानों को सब्जी व फूल की खेती के लिए प्रभेद का चुनाव भी बहुत जरूरी है. इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अनुशंसित किस्म का उपयोग ही करनी चाहिए, ताकि लागत के अनुसार उपज भी प्राप्त हो सके.
फसल की देख-रेख पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है. पॉली हाउस के अंदर जंगल नहीं उगे यह भी ध्यान देना होगा. ‌समयानुसार वैज्ञानिक से रोग की पहचान कर उसपर अनुसंशित दवा का प्रयोग करना चाहिए. पॉली हाउस में लगायी गयी फसल को सहारा देने की जरूरत पड़ती है.
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