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Home विशेष उल्लेख सभ्यता का पथ जो वन को जा रहा है

सभ्यता का पथ जो वन को जा रहा है

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सभ्यता का पथ जो वन को जा रहा है
उषा किरण खान
झाड़ में छुपे दोनों भाई देख रहे थे कि घोषा ने कड़क कर गोकर्ण को बुलाया- ‘कौन हो तुम और मेरे एकांत साधना स्थल पर क्या कर रहे हो?’- भयातुर गोकर्ण ने सबकुछ उगल दिया. घोषा घोर आश्चर्य और जुगुप्सा में आवृत्त हो गयी आकंठ.
क्या है यह छलनामय जीवन धन संपत्ति और गायें? बस, इसलिए ज्ञानार्जन किया, कि इसलिए ब्रह्मज्ञान की साधना की? वह अपना कमंडल उठाकर चल पड़ी और उस निकृष्ट ब्राह्मण से कहा कि- ‘जाओ मेरे विद्वान पिता के मूर्ख पुत्रों से कहो कि वे अपना सबकुछ जो स्थावर है संभाले, मैं पिता द्वारा प्रदत्त संचित ज्ञान लेकर वनगमन करती हूं. मुझे नहीं है कोई आकांक्षा.’
शिल्पी ने मन ही मन उस सतर शरीर का सौष्ठव आंका और आत्मसात किया बुद्धिमती स्त्री का दर्प. क्या अब यह समय आ गया कि स्त्री बलपूर्वक विवाह करेगी, उसकी स्वतंत्रता समाप्त हो रही है? आचार्य कुल का शिक्षक यदि अनाचार करने को उकसाता है, तब स्त्री की रक्षा कैसे होगी.
परिश्रमी, शिकारी श्रमजीवी स्त्रियों के हाथ में आयुध होते हैं, प्रस्तर के लौह के , उनका शरीर भी कठोर होता है. परंतु भोजपत्र और ताड़पत्र निर्माण करने वाली, कलम बनाने वाली मंत्रद्रष्टा स्त्री अपने कार्यानुसार शरीर से कोमल होती है.
स्त्री और पुरुष का बंटवारा हो रहा है, स्वतंत्रता का हनन हो रहा है. यह क्या, शिल्पी को क्या आवश्यकता यह सब सोचने की कि घोषा कमंडलु लेकर वन में प्रवेश कर गयी. चलती-चलती थक गयी. प्यास भी लग रही थी. शाल सागवान के घने जंगल में वह ठिठक गयी. सीधे तने वृख, चौड़े पत्तों से आच्छादित थे पर सूर्य का प्रकाश धरती तक आता था सो गझिन दूब फैली थी.
घोषा बैठ गयी एक तने से लग कर. तन ही तन को सहारा देता है. थोड़ी देर आंखें बंद कीं, पर प्यास की चिलक कंठ में उठी. कमंडलु में आधा भरा जल था, उसने ऊपर उठाया और एक धा जल पीया. तृप्त हुई आंखें खोल कर चारो ओर निहारा. लगा जैसे जिस पर चल कर आयी है वह पथ था.
कष्ट से घोषा मुस्कुराई. सभ्यता का पथ है जो वन को जा रहा है, संकरा होता हुआ. सुदूर कहीं से धुंआ उठ रहा था, गांव होने का अाभास हुआ. संध्या काल से पहले स्त्रियां लकड़ी का गट्ठर लिए जाती मिली. ब्रह्मचारिणी को देख ठिठक गयी. घोष का पर्णकुटी वहीं बन गया.
वनवासी शिक्षित होने लगे. उत्तर वैदिक काल में, पहली स्त्री ने संपत्ति के विवाद से मुंह मोड़ लिया. कारण स्पष्ट था पुरुष उस विवाद को येनकेन प्रकारेण सुलझाना चाहता था. स्त्री का शरीर मात्र एक विवर है यह विचार कर, विषण्ण घोषा ने कुल त्याग दिया. शिल्पी मन और शरीर से थक चुका था. जलपान से क्षुधा शांत हुई तो पलकें भारी होने लगी. अब वह प्रस्तरखंड के पार्श्व में लेट गया. लेटते ही सो गया. बिल्कुल नि:स्वप्न. मन में उथल-पुथल की आवृत्ति के स्वरूप की; अब इसने अपने को तैयार कर लिया था. छेनी उठाने को तत्पर था.
‘उठिए शिल्पी, भोजन का समय है.’- एक राजन्य खड़ा था. शिल्पी उठा देह झाड़ते देखा सूरज पश्चिमामिमुख हो रहा है.’ओह, कई दिनों पश्चात् नि:स्वप्न सोया, क्या स्नान कर लूं?’- शिल्पी बहुत दिनों बाद गला खोलकर बोल रहा था. ‘प्रभु, जैसी आपकी इच्छा, देर न करें. गरम-गरम भात तैयार है.’- राजन्य ने कहा. शिल्पी गमछा पहन गंगा स्नान कर आया. अंजलि की पश्चिम की ओर और झोपड़े में जाकर पटरे पर बैठ गया. देखा पवित्रता से झोपड़ा लीप दिया गया है. पीढ़ा लगा है, सुस्वादु भोजन है, चने की दाल-भात, आलू और परवल की तरकारी, झरबेरी की चटनी. शुद्ध घी की छौंक हींग की. शिल्पी ने पेट भर खाया. थाली उठाने को हुआ कि राजन्य ने बरजा.
‘सेवा हमारा धर्म है प्रभु.’ – उसे ताकीद की गयी थी शिल्पी को कोई असुविधा न हो पर उसने भोजनपात्र उठाया और बाहर जंगल की ओर फेंक आया.
‘अपनी थाली-भी मैं स्वयं धोया करता था, वो थी तब भी, आप अन्यथा न लें.’-शिल्पी ने सहास्य कहा.
‘परंतु अब ऐसा न होगा प्रभु. मौर्य साम्राज्य की परिपाटी के अनुरुप आप स्त्री के श्रम की महत्ता समझते हैं. यह मुझे मालूम है. आपने सदा ही ललिता देवी को सम्मान दिया, परंतु हम स्त्री नहीं हैं. हम आपकी सेवा कर सौभाग्यशाली हाेंगे. आप विश्राम करें प्रभु, हम पुन: रात्रि भोजन लेकर आयेंगे. संध्या होते ही मशाल जला दी जायेगी. नमस्कार.’
‘रात्रिभोजन नहीं राजन्य, अब और आज कुछ भी नहीं.’-शिल्पी ने कहा
क्रमश:
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