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Home विशेष उल्लेख जॉर्ज फर्नांडिस स्मृति-शेष : क्रांतिकारी और विचारों का पक्का नेता

जॉर्ज फर्नांडिस स्मृति-शेष : क्रांतिकारी और विचारों का पक्का नेता

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जॉर्ज फर्नांडिस स्मृति-शेष : क्रांतिकारी और विचारों का पक्का नेता
राम बहादुर राय
वरिष्ठ पत्रकार
साल 2007 तक जॉर्ज फर्नांडिस अत्यंत सक्रिय और स्वस्थ थे. साल 2002 में एक बार मैंने उनको फोन करके मिलने की इच्छा जाहिर की, तो उन्होंने सुबह बुलाया. मैं उनके घर (3 कृष्ण मेनन मार्ग) गया, तो वह अपनी गाड़ी में बैठ गये थे और रक्षा मंत्रालय जा रहे थे.
उन्होंने मुझे पीछे की सीट पर बिठाया और बात करने लगे. उस समय वह 73-74 की उम्र के थे, लेकिन बहुत तेजी से दौड़ते हुए वह सीढ़ियां चढ़ कर अपने दफ्तर पहुंचे. यह बहुत ही कम लोगों को मालूम है कि केंद्रीय मंत्री और बड़े नेता रहे जॉर्ज फर्नांडिस की आदत यह रही कि जब वह नहाते थे, तो अपना एक सेट कपड़ा खुद धोते थे. साल 1995 में कपड़ा धोते समय ही वह बाथरूम में फिसले थे, जिससे उनके सिर में चोट आयी. एम्स में ऑपरेशन हुआ, जिसके बाद कई वर्ष तक वह स्वस्थ रहे, लेकिन, साल 2005-06 के बाद धीरे-धीरे उनकी स्मृति लुप्त होने लगी.
साल 1995 में एक दिन जब मैं उनका हाल पूछने उनके पास गया था, तब उन्होंने मुझे बताया- ‘नीतीश कुमार और जया जेटली को मैंने भाजपा के मुंबई अधिवेशन में भेजा है. वे समता पार्टी की ओर से पर्यवेक्षक के रूप में गये हैं और ऐसा करने के लिए भाजपा अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने आग्रह किया था. अगर हमारी पार्टी सहमत होगी, तो हम भविष्य में एक कांग्रेस के विकल्प के रूप में गठबंधन बनायेंगे.’
हम सभी जानते हैं कि साल 1996 में जॉर्ज फर्नांडिस के कन्वीनरशिप में एनडीए बना. उनके जीवन में जो एक सारतत्व की निरंतरता थी, वह थी गैर-कांग्रेस की विचारधारा. इसलिए 1999 में जब सोनिया गांधी ने वाजपेयी की सरकार गिरने के बाद सरकार बनाने का दावा किया, तब जॉर्ज फर्नांडिस ने ही मुलायम सिंह से कहा कि सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री बनना देश पर कलंक होगा. इस बात से मुलायम सिंह सहमत हुए.
जॉर्ज फर्नांडिस ने नीतीश कुमार को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया था. उनके मन में नीतीश के प्रति बहुत स्नेह था, लेकिन उनसे भी संवादहीनता के कारण कुछ मतभेद हुए. लेकिन, फर्नांडिस का जीवन एक शानदार जीवन है और क्रांतिकारी का जीवन है.
उनके जीवन में तमाम साथी कुछ अंतर्विरोध भी देखते हैं, लेकिन मैं यह पाता हूं कि उनमें जो विश्वास और विचार की आस्था थी, उस पर वह हमेशा अडिग रहे. वह मानते थे कि नेहरू वंश इस देश की दुर्गति का बड़ा कारण है. इसलिए, 1962-63 में जब समाजवादी पार्टी के कलकत्ता अधिवेशन में डॉ लोहिया ने पहली बार गैर-कांग्रेस का नारा दिया, तो उसका जिन कुछ लोगों ने विरोध किया, उसमें फर्नांडिस भी थे, लेकिन थोड़े दिनों बाद ही फर्नांडिस को समझ में आ गया कि कांग्रेस का विकल्प ढंूढने के लिए गैर-कांग्रेस ही माध्यम बनेगा और जीवन के अंत तक गैर-कांग्रेसवाद के वह सबसे बड़े प्रवक्ता रहे.
जॉर्ज फर्नांडिस जब रक्षा मंत्री थे, तब कांग्रेस ने साजिश करके तहलका कांड करवाया, जिसमें प्रियरंजन दास मुंशी और कांग्रेस के अन्य नेता शामिल थे. एक फर्जी रक्षा सौदे में फर्नांडिस को फंसाने की कोशिश हुई, लेकिन जब जांच हुई, तब रिपोर्ट में सब स्पष्ट हो गया. जॉर्ज फर्नांडिस को भ्रष्टाचार में घेरने की कोशिश में कांग्रेस सफल नहीं हुई. इसमें फर्नांडिस को कुछ दिनों के लिए रक्षा मंत्री पद से इस्तीफा भी देना पड़ा था.
मैं उन्हें साल 1974 से ही नजदीक से देखता आ रहा था और हमारा अक्सर मिलना-जुलना बना रहा. साल 1974 में उन्होंने रेलवे के तमाम ट्रेड यूनियनों को एक मंच पर इकट्ठा किया. भारतीय रेलवे के इतिहास में वह सबसे बड़ी हड़ताल थी, जिससे जेपी आंदोलन को एक नया आधार मिला था. उसी तरह से जब इमरजेंसी लगी, तब फर्नांडिस भूमिगत हो गये और उन्होंने वहीं से बड़ौदा को अपना केंद्र बनाया था.
अंतत: कलकत्ता में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और पुलिस ने उन्हें बेड़ियों में बांधकर ऐसे सताया, जैसे आजादी आंदोलन के क्रांतिकारियों को ब्रिटिश पुलिस सताती थी. बेड़ी पहने हुए ही उनका चित्र 1977 के चुनाव में फैलाया गया और मुजफ्फरपुर में रिकॉर्ड वोटों से वह जेल में रह कर ही चुनाव जीते. यानी रेलवे हड़ताल और आपातकाल, इन दोनों समय के जॉर्ज फर्नांडिस हीरो थे. जॉर्ज फर्नांडिस एक ऐसे नेता के रूप में याद किये जायेंगे, जो अपने जीवन में ईमानदार है, क्रांतिकारी है और विचारों का पक्का है.
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
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