संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को ग्राम पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया है. संविधान के लागू होने के बाद विभिन्न राज्यों द्वारा ग्राम पंचायतों की स्थापना के प्रयास शुरू किये गये. इसके बाद 1952 में गांवों के सर्वांगीण विकास के लिए सामुदायिक विकास कार्यक्रम तथा 1953 में राष्ट्रीय विस्तार सेवा योजना शुरू की गयी. इन कार्यक्रमों की सफलता सुनिश्चित करने और जन सहयोग जुटाने के लिए बलवंत राय समिति का गठन किया गया.
इस समिति ने नवंबर, 1957 में अपने प्रतिवेदन के जरिये त्रिस्तरीय पंचायती राज योजना का प्रारूप पेश किया. इस प्रारूप में ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खंड यानी ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद के गठन का सुझाव दिया गया था. इस सुझाव के तहत 2 अक्बतूर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में पहली बार पंचायती राज व्यवस्था लागू की गयी और इस व्यवस्था को लागू करने वाला राजस्थान स्वतंत्र भारत का पहला राज्य बना.
इसके बाद इस प्रणाली को सुदृढ़ बनाने के लिए दिसंबर 1977 में अशोक मेहता समिति, 1985 में जीवीके राव समिति एवं 1986 में एलएम सिंघवी समिति का गठन किया गया. इन समितियों ने पंचायती राज को मजबूत बनाने के लिए अनेक सिफारिशों के साथ अपनी रिपोर्टें पेश कीं, लेकिन वे लागू नहीं हो सकीं. इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने सितंबर 1991 में पंचायती राज को लेकर एक नया विधेयक संसद में पेश किया.
वर्ष 1992 में 73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के रूप में यह विधेयक लोकसभा में पारित हो गया. इसके बाद थोड़े-बहुत बदलाव के बाद 24 अप्रैल, 1993 को पंचायती राज कानून बनाया गया और देशभर में इसे लागू किया गया. इस संशोधन के तहत ग्राम स्तर पर ग्राम सभा की स्थापना, त्रिस्तरीय पंचायती राज संरचना की स्थापना, प्रत्येक पांच वर्ष पर पंचायत में नियमित चुनाव, एससी-एसटी के लिए जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण, महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों का आरक्षण आदि प्रावधान शामिल किये गये.
