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पानी की खेती का अब नया नारा जहां मिले पानी, वहां मछली रानी

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पानी की खेती का अब नया नारा जहां मिले पानी, वहां मछली रानी
सुनील मिंज
मछली पालन हमारे इलाके के लिए कोई नयी बात नहीं है, लेकिन वर्तमान में यह नयी बात बन गयी है. यहां के किसान इसे खेती की तरह नहीं करते. सूखा मुक्ति अभियान के तहत लातेहार, पलामू, और गढ़वा जिले में 90 के दशक के शुरू में 100 से अधिक आहर पोखर बनाये गये.
उस पानी से खेतों की प्यास तो बुझाये जाने लगे, क्योंकि खेती की परंपरा वहां के किसानों में थी, लेकिन पानी की खेती की शुरुआत यानी मछली की खेती की शुरुआत नहीं की जा सकी, क्योंकि यह उनकी खेती की संस्कृति में शामिल नहीं था. जो कुछ मछली का जीरा गांव के नजदीक के नदी-नालों में आ जाता था, उसे ही पकड़कर किसान अपने कुओं-तालाबों में डाला करते थे.
अब परिस्थितियों में बदलाव आ रहा है. लातेहार के सेलेस्टिन कुजूर और सिराजुद्दीन अंसारी ने साथ मिलकर एक मत्स्य पालन समिति का निर्माण कराया है.
उन्होंने समिति के 40 सदस्यों में से 15 सदस्य को रांची भेजकर मत्स्य पालन का प्रशिक्षण दिलाया है. प्रशिक्षण के दौरान इस समिति को कई लाभ दिये जाते हैं. प्रशिक्षित मछुआरों के लिए दो लाख रुपये का बीमा है. सदस्यों के लिए मछुआरा आवास का प्रावधान है. इस समिति के 15 सदस्यों को मछुआरा आवास मिल चुका है.
मछुआरों को 10 हजार रुपये से लेकर 30 हजार रुपये तक का जाल मिलता है. समिति को 30 हजार रुपये का जाल मिल चुका है. मत्स्य बीज उत्पादन हेतु 12 लाख रुपये की कीमत का हैचरी भी मिलता है. यहां के किसान मत्स्य बीज उत्पादन कर उसे अपने आहर पोखर में डालते है. शेष जीरे की बिक्री कर दी जाती है. समिति को पांच नाव मिले हैं. एक नाव की कीमत 50 हजार रुपये है. समिति के सदस्यों को 50 हजार रुपये की कीमत की गुमटी मिलती है, जिसमें वे मछली की बिक्री कर सकते हैं.
समिति को एक पिकअप वैन भी दिया गया है. समिति को डीप फ्रीजर दिया जाता है, जिसमें दो क्विंटल मछली रखी जा सकती है. घूम-घूम कर मछली बेची जा सके, इसके लिए टीवीएस लूना की व्यवस्था मत्स्य विभाग द्वारा की जाती है. विभाग के द्वारा समिति के अस्थायी कार्यालय के लिए ढाई लाख रुपये दिये गये हैं.
झारखंड में एक लाख से अधिक वाटर स्ट्रक्चर हैं. यहां भविष्य में मछली पालन की अधिक संभावनाएं हैं. लातेहार उपायुक्त राजीव कुमार, जो पूर्व में मत्स्य निदेशक थे, ने समिति के आय-वर्द्धन के लिए लातेहार शहर स्थित झरिया नाला में मत्स्य पालन शुरू किया है.
उन्होंने उसमें दस हजार फिंगर लिंग डाला है, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेवारी स्थानीय समिति – मत्स्य जीवी सहयोग समिति लिमिटेड, नवाडीह ललमटिया को सौंपी गयी है. मोटे अनुमान के तौर पर 10 क्विंटल मछली की खेती होगी, जिसे स्थानीय बाजार में बेचकर डेढ़ लाख रुपये की आमदनी होगी.
आज मछली पालन हमारे पड़ोसी राज्यों पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश आदि में काफी विकसित हो गया है, लेकिन झारखंड में अभी तक मत्स्य पालन की 95 फीसद संभावनाओं को तलाशा ही नहीं गया है.
पलामू, मनिका और लातेहार जिलों में तो सैकड़ों नये और पुराने वाटर स्ट्रक्चर अब भी मौजूद हैं, लेकिन इन इलाकों में अन्य राज्यों की तरह मत्स्य पालन की संस्कृति विकसित नहीं हो पायी है. यदि हम मत्स्य पालन करें, तो आमदनी तो बढ़ेगी ही, साथ ही प्रोटीन से भरपूर सुपाच्य भोजन भी किसानों को मिल पायेगा.
आज की परिस्थिति में, जब किसान की खेती योग्य भूमि कई कारणों से कम होती जा रही है, तो किसान अपने परिवार का भरण पोषण हेतु अन्यत्र पलायन कर रहे हैं.
ऐसी परिस्थिति में यह आवश्यक है कि किसान अपने सभी संसाधनों का समन्वित ढंग से इस्तेमाल करें. आजकल क्षेत्र विशेष में मत्स्य उत्पादन के प्रति उत्साह देखा जा रहा है. इस उत्साह को बरकरार रखने के लिए इसके आधुनिक तौर तरीके को उन गांवों तक पहुंचाया जाना चाहिए.
मछली पालन में यदि मिश्रित कल्चर को अपनाया जाये, तो किसानों के मुनाफे में दो-तीन गुने तक की वृद्धि होगी. मिश्रित कल्चर का मतलब है मछली के साथ-साथ मुर्गी, बतख और गाय का पालन करना. इनके गोबर मछली के लिए खाद्य पदार्थ बनाने में सहायक होती है, जिसे मछली पालन का खर्च कम हो जाता है. भला इतने लाभ वाला रोजगार शुरू करना कौन नहीं चाहेगा? आजकल पलामू में किसानों के बीच एक नारा गुंजायमान हो रहा है- जहां देखो पानी, वहां छोड़ो मछली रानी.
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