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Home विशेष उल्लेख गहरी उदासियों की छाया

गहरी उदासियों की छाया

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गहरी उदासियों की छाया
नैयर मसूद उर्दू अदब के बड़े अफसानानिगार रहे हैं. बीसवीं सदी की आखिर में, उर्दू अदब में उत्तर-आधुनिकता की अवधारणा ने अपने आयाम, कई अफसानानिगारों के जरिये खोजे, उनमें मसूद साहब भी शामिल थे. इसलिए नैयर मसूद को उत्तर-आधुनिक उर्दू तथा अदब के प्रवर्तकों में से एक माना जाता रहा है.
नैयर मसूद बतौर अफसानानिगार सरल, अनायास जबान में अपनी बात कहते हैं. लेकिन उनकी नजर इतनी पैनी है कि जमाने की बारीक परतों को भी उधेड़कर रख देते हैं.
उनके अफसानों में, अंतिम पायदान पर खड़े मुस्लिम समाज की गहरी उदासियों की छायाएं पसरी मिलती हैं. आप अफसाने पढ़ते हुए किसी तिलिस्म में नहीं डूबते, उसका हिस्सा हो जाते हैं, बल्कि उस दुख के हिस्सेदार, जो लंबे वक्फे तक आपके गले में अटका मालूम होता है.
नैयर मसूद का यह कहन ही उन्हें बड़ा बनाता है और शानी के करीब खड़ा करता है. किसी भी अफसाने में, अफसाने के सारे मेयारों का मौजूद होना जरूरी है, क्योंकि इसकी कमी अफसानों को गैरमौजू और सूखा कर सकती है. नैयर मसूद के अदब में ऐसी कोई कमी नहीं दिखायी देती है.
ये अफसाने आप पढ़ेंगे, तो पायेंगे कि उनके अफसानों के किरदार बहुत आम हैं, जैसा हर दूसरा इंसान होता है. उनके अफसानों के किरदार उतने ही सच्चे या झूठे जान पड़ते हैं, जितनी सच्ची या झूठी जिंदगी होती है. इस सच्ची-झूठी जिंदगी की जद्दोजहद का ही नाम है, ‘गंजीफा और अन्य कहानियां’. इसे छापने के लिए राजकमल प्रकाशन भी शुक्रिया का हकदार है, जिसने उर्दू में लिखे इन अफसानों को हिंदी में छापकर अदब के लिए अच्छा काम किया है.
पुस्तक गंजीफा और अन्य कहानियां
लेखक नैयर मसूद
प्रकाशक राजकमल प्रकाशन
मूल्य "399
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