संत जेवियर्स कॉलेज में स्थापित हिंदी के मनीषी, पद्मभूषण डॉ फादर कामिल बुल्के का समाधि स्थल न सिर्फ विद्यार्थियों को, बल्कि सभी को हिंदी व संस्कृत से प्रेम करने और इन भाषाओं के क्षेत्र में कुछ सकरात्मक करने की प्रेरणा देता है़ उनका पार्थिव अवशेष इसी साल 14 मार्च को संत जेवियर्स कॉलेज परिसर में स्थापित किया गया.
यह फादर बुल्के का विश्राम के लिए अपनी कर्मभूमि लौटने जैसा था़ कॉलेज में उनकी आवक्ष प्रतिमा (बस्ट) भी लगायी गयी और इन सबके साक्षी कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो, पद्मश्री सिमोन उरांव, रोम से आये सोसाइटी ऑफ जीसस के असिस्टेंट जनरल फादर वरनन डिकुन्हा, विश्वभारती शांतिनिकेतन के प्राध्यापक डॉ मुक्तेश्वर नाथ तिवारी, विनोबा भावे विवि में हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ शिवनंदन प्रसाद सिन्हा व रांची विवि में हिंदी के विभागध्यक्ष डॉ जंगबहादुर पांडेय समेत कई गणमान्य बने़ फादर बुल्के कुछ समय तक इस कॉलेज में हिंदी व संस्कृत के विभागध्यक्ष थे़ यहां उनके नाम पर शोध संस्थान व पुस्तकालय भी स्थापित किये गये है़ं उनका निधन 17 अगस्त 1982 को इलाज के क्रम में दिल्ली के एम्स में हो गया था़,
जिसके बाद उनका पार्थिव शरीर दिल्ली में ही कश्मीरी गेट स्थित संत निकोलसन कब्रिस्तान में दफनाया गया़ सोसाइटी ऑफ जीसस कांग्रीगेशन ने लगभग दो साल पहले उनका स्मृति शेष उनकी कर्मभूमि, रांची लाने का निर्णय लिया़ इसे रांची लाने में सोसाइटी आॅफ जीसस, रांची के प्रोविंशियल फादर जोसफ मरियानुस कुजूर, नयी दिल्ली के प्रोविंशियल फादर सेबेस्टियन जेरकास्सेरी व इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट दिल्ली के एचओडी फादर रंजीत तिग्ग्ग ने अहम भूमिका निभायी़.
साहित्यकारों ने कहा
