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Home विशेष उल्लेख हिंदी साहित्य के अमूल्य निधि थे प्रो मनमोहन मिश्र

हिंदी साहित्य के अमूल्य निधि थे प्रो मनमोहन मिश्र

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हिंदी साहित्य के अमूल्य निधि थे प्रो मनमोहन मिश्र

आनंद जायसवाल

दुमका : संस्कृत में कालिदास और भवभूति, अंग्रेजी में शेक्सपियर और इलियट तथा हिंदी में सूर, प्रसाद व निराला की सौन्दर्य चेतना को आत्मसात करने वाले कवि-समीक्षक मनमोहन मिश्र के लेखन में शब्द अपने अर्थ-सामर्थ्य के साथ उतरते थे.

उन्होंने कविताओं के अतिरिक्त अनेक शब्द चित्र और समीक्षाएं लिखी. मनमोहन बाबू की संपूर्ण रचनाओं का विश्लेषण करने वाले उनके बारे में कला की बारिकी, दर्शन की प्रशांति और संवेदना के घनत्व को समान रूप से जीने वाले कवि तथा हिंदी साहित्य के लिए अमूल्य निधि बताया करते थे. मनमोहन मिश्र के निधन से अंग प्रदेश-संताल पगरना के साहित्यकारों-कवियों एवं शिक्षाविदों में शोक व्याप्त है. मनमोहन बाबू का दुमका से लगभग ढाई-तीन दशक का नाता रहा.

90 के दशक में पहली बार वे तब दुमका आये थे, जब दुमका की साहित्यिक संस्था ‘संताल परगना साहित्य मंच संगोष्ठी’ ने यहां के नगरपालिका चौक से डीसी चौक के पथ का नामकरण साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय के नाम पर किया था. उस 1993 का साल था और देशभर में शिवपूजन सहाय जन्मशताब्दी मनायी जा रही थी. वहीं से वे सतीश चौरा (कवि सतीश चंद्र झा की वह कुटिया, जहां साहित्यकारों का जुटान होता था) से जुड़े.

उसके बाद तो उस दौर के तमाम साहित्यकारों के साथ मिलकर उन्होंने इसी कुटिया से साहित्य को विस्तार देने का काम किया. नये लेखकों-कवियों को प्रेरित-प्रोत्साहित किया. सतीश चंद्र झा के जाने के बाद इसी सतीश चौरा में सतीश स्मृति मंच के बैनर तले हर वर्ष साहित्यिक कार्यक्रम-गोष्ठियां आयोजित किया जाता रहा, तो वे उसमें बतौर अध्यक्ष अपनी सक्रियता सुनिश्चित करते रहे.

उनकी पांच कविताएं

आदमी

विधाता की असंख्य सृष्टि छवियों में

निश्चय ही

सर्वोत्तम है आदमी.

शिला पर फेनिल हंसी छोड़ते झरने ने कहा.

इस आदमी में

चांदनी की कोमलता है, उषा का स्वास्थ्य है

हवा की पारदर्शक रेशाओं से बुना इसका अंतस‍् है.

आधी रात की तरिका के गुन-गुन से रची

अंत:स्त्रावी इसकी दृष्टि!

हिरणों की धारीदार कुलांचो तके इसकी गति है,

ओस धुली नन्ही दूबों की हरियाली में

डुबोई इसकी खुशहाली!

अपनी नीलिमा को समेट

सुई की नोंक पर एकाग्र हो जाता आकाश-

जब यह गाता है!!

इसी के हाथ पड़

उद्दंड बांस बांसुरी बन गया.

लेकिन…..

झरने ने नि:श्वास लिया

न जाने क्या हो जाता इसे कभी-कभी

कि अपने द्वारा तय की हुई सारी दूरी

यह स्वयं निगल जाता है!

इसके प्रत्येक युग का आरंभ

एक ही बिंदु से होता!!

तब भी?

हर शिशिर की मखमली सांझ

और वसंत की रेशमी सुबह

तेरी याद की कटी चिट‍्ठी

मेरे पायताने रख जाती

अब भी!

तेरे हाथ का गुनगुना अक्षर

और

तेरी मुद्रा का अनमना भाव

मेरे नाम लिखे पते पर आते रहें

तब भी?

जब मैं वह न रह गया!!

रास्ते

तेरे हल्दी लगे हाथों की सलोनी खनक

मेरे छोटे से आंगन में

जो दुधिया चौंक पूर गयी

उसमें मुझे ग्रीष्मकालीन नर्मदा की

शोख कविता भी मिली;

बरसाती नदी की दार्शनिकता भी!

मैं सच ही नहीं कह पाऊंगा

कुछ भी-

इसके मध्य बिंदु के बारे में;

कि तमाम दिशाओं में रास्ते यहीं से फूटते

कि तमाम दिशाओं से रास्ते यहीं आकर

समाप्त होते!!

स्वस्थ हो तुम?

कब से तुम्हारी आशा में कि तुम्हारी चिट‍्ठी मिले कि स्वस्थ हो तुम-

आंखे बिछाये द्वार पर बैठा हूं!

तुमने लिखा कब घर बनाये तुमने, द्वार सजाये तुमने

बड़ी-बड़ी उड़ानें भरी तुमने

समुद्र की गहराई में उतरे तुम!

मैंने जाना कि मरुभूमि में

नयी-नयी फसलों की बहारें पैदा कीं तुमने

कि दस-दस कोस माथे पर पानी ढोने वाली

अब अपने आंगन में पानी बहाती है.

ऊंटों के काफिले को अब

बालू के तूफान में खो जाने का कोई अंदेशा नहीं!!

लोग कहा करते कि ज्यादा से बहुत ज्यादा तरक्की की तुमने

कि तारों के फोटो भी तुमने उतरवा डाले!

यह नहीं कि इन बातों से खुश हूं मैं

किंतु,

सच्ची खुशी तो तब होगी जब विश्वास करोगे

कि स्वस्थ तो तुम!!

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