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Home विशेष उल्लेख आदिवासी दिवस आज : जानें कुछ खास लोगों के बारे में जो समाज के साथ देश को भी कर रहे गौरवांवित

आदिवासी दिवस आज : जानें कुछ खास लोगों के बारे में जो समाज के साथ देश को भी कर रहे गौरवांवित

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आदिवासी दिवस आज : जानें कुछ खास लोगों के बारे में जो समाज के साथ देश को भी कर रहे गौरवांवित
आदिवासी समाज के लोग आज हर क्षेत्र में सफलता का परचम लहरा रहे हैं. वह तकनीक से लेकर विज्ञान के क्षेत्र में देश और राज्य का नाम रोशन कर रहे हैं. कोई खेती-बाड़ी में ही उन्नत तकनीक का प्रयोग कर मिसाल कायम कर रहा है, तो कोई कारोबार के क्षेत्र में अव्वल है.
कला-संस्कृति, साहित्य, खेल, मनोरंजन समेत अन्य क्षेत्रों में भी आदिवासी युवा नित नये सफलता के आयाम गढ़ रहे हैं. इनके आगे बढ़ने से समाज की तस्वीर व तकदीर बदल रही है. आज आदिवासी दिवस पर समाज के ऐसे ही कुछ सफल लोगों से आपको रू-ब-रू करा रहे हैं.
डॉ धुनी सोरेन
माटी की खुशबू इंग्लैंड से खींच लाती है झारखंड
दुमका : डॉ धुनी सोरेन संताल जनजातीय समाज में जाना हुआ नाम है. देश से बाहर रहते हुए भी उन्होंने अपनी माटी से लगाव नहीं छोड़ा है. वे फिलवक्त इंग्लैंड के लिवरपुल में रहते हैं. वहां संताल आदिवासी डॉक्टर के रूप में अपनी ख्याति अर्जित करनेवाले और बसनेवाले वे पहले शख्स हैं.
मूल रूप से गोड्डा के बोआरीजोर में पले-बढ़े डॉ धुनी अक्सर दुमका-गोड्डा आते रहते हैं और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हमेशा ही उनकी भागीदारी दिखती है.
लंदन में रहकर भी वे संताल परगना की हर गतिविधि पर जानकारी रखते हैं. सोशल मीडिया के जरिये लोगों से संपर्क बनाये रखते हैं. संताल परगना से जनजातीय संताल समाज में वे एक उदाहरण हैं, जिन्होंने समाज को हमेशा नयी दिशा देने का काम किया है.
वे लंदन में भी भारतीयों के लिए बहुत सी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं, दुमका-गोड्डा में भी सामाजिक कार्यों को बढ़ावा देने में अपनी भूमिका निभाते हैं. गरीब बच्चों को शिक्षा दिलाने की बात हो या कोचिंग की, वे ऐसे कार्य कराते रहे हैं. इस इलाके में वे हर साल मोतियाबिंद ऑपरेशन का भी विशाल कैंप लगवाते हैं.
संघर्ष से बने डॉक्टर
डॉ धुनी सोरेन के डॉक्टर बनने का संघर्ष काफी प्रेरक है. उनका जन्म आजादी के 12 साल पहले हुआ था. उस वक्त इतने मिडिल व हाई स्कूल भी नहीं थे. पांच मील दूर ठाकुरगंगटी-राजाभिठा में उन्हें मिडिल तक की पढ़ाई के लिए आना पड़ता था. जब देश आजाद हुआ, तब वे सातवीं पास कर चुके थे.
बाद में पथरगामा से हाई स्कूल गये. यहां हॉस्टल में रहे. रात को जिस कमरे में सोते थे, उसी में फिर अपने सारे सामान समेट कक्षा करनी होती थी. यहीं नाैवीं की परीक्षा के दौरान एक बार उन्हें कालाजार हुआ, इससे उनकी परीक्षा छूट गयी. इसी बीमारी ने उन्हें डॉक्टर बनने के लिए प्रेरित किया. बाद में उन्हें उनके कक्षा में प्रदर्शन के आधार पर प्रमोट कर किया गया. उन्होंने जिला स्कूल में भी पढ़ाई की.
फिर पटना साइंस कॉलेज में जब आवेदन किया, तो बायलॉजी में उनका एडमिशन ही नहीं हो सका. पर उन्हाेंने डॉक्टर बनने की ठान रखी थी, इसलिए बायलॉजी ही पढ़ना था. अब उनके पास साल भर इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. ऐसे में उन्होंने साल भर के समय का भरपूर उपयोग करने की ठानी. गांव में कोई डाकघर नहीं था. सरकार को भी किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश थी, जो घर पर एक छोटी सी जगह दे सके और पोस्ट मास्टर के रूप में काम कर सके.
उनके पिता ने घर में एक छोटा सा कमरा दिया और वे 20 रुपये प्रतिमाह के रियायती वेतन पर पोस्ट मास्टर बन गये. साल भर गांव में रहकर जम कर खेती भी की और पहली बार अपने क्षेत्र में मूंगफली की पैदावार की. दूसरे साल आवेदन किया, तो बायलॉजी में दाखिला हो गया. इंटरमीडिएट करने के बाद वे तत्कालीन प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज, पटना (जिसे पीएमसीएच कहा जाता है) में गये और मेडिकल की पढ़ाई की.
पायलट भी बने
बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे डॉ धुनी सोरेन ने पायलट की ट्रेनिंग भी ली थी. छोटे विमान वे चलाया भी करते थे. वे बताते हैं कि बचपन में गांव की पगडंडियों और खेतों के उपर उनका बाल मन ऊपर उड़ने का और हवा में गोते लगाने का सपना देखता था. यह सपना भी उनका पूरा हुआ, जब सरकार ने युवाओं को ऐसी ट्रेनिंग दिलाने की योजना बनायी, ताकि सेना की ओर उनका झुकाव बढ़े. टाइगरमोथ जैसे टू सीटर विमान से नीले आसमान में उड़ान भरना उन्हें काफी पसंद था. इसके लिए वे अक्सर पटना फ्लाइंग क्लब भी जाते रहते थे.
सुमी मुंडा
चीन में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया
जमशेदपुर : परसुडीह प्रमथनगर की रहनेवाली सुमी मुंडा को संस्थागत प्रसव को बढ़ाने व स्वास्थ्य जनजागरण के क्षेत्र में बेहतर काम करने के लिए वर्ष 2012 में दिल्ली में सम्मानित किया जा चुका है. इस क्षेत्र में पूरे देश में छह महिलाओं को सम्मानित किया गया था.
नेहरू युवा केंद्र ने भी उन्हें महिला एसएचजी बनाने, सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी देने व स्वरोजगार से जोड़ने के लिए जिला युवा पुरस्कार से नवाजा था. बेहतर सामाजिक कार्यों को देखते हुए उन्हें आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए चीन भेजा
गया था. वर्तमान समय में पीएचइडी की जमशेदपुर प्रखंड समन्वयक के रूप में कार्य कर रही है. जलापूर्ति एवं शौचालय निर्माण समेत अन्य कार्यों का मॉनिटरिंग कर रही है. इससे पूर्व यूनिसेफ में सपोर्टी सुपरवाइजर रह चुकी है.
नीतिशा बेसरा
पहली ट्राइबल गर्ल, जो पढ़ रही केनेडी स्कूल में
जमशेदपुर : जमशेदपुर की पहली ट्राइबल गर्ल ने शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. जमशेदपुर के पूर्व विधायक अौर झारखंड आंदोलकारी सूर्य सिंह बेसरा की पुत्री नीतिशा बेसरा अभी हॉवर्ड के केनेडी स्कूल में अध्ययनरत है.
हिलटॉप स्कूल की छात्रा नीतिशा बेसरा को जॉन एफ केनेडी फेलोशिप मिला. नीतिशा ने कानपुर से आइआइटी की है. बाद में मुंबई के टाटा इंस्टीच्यूट अॉफ सोशल साइंस से मास्टर डिग्री हासिल की. एक वर्ष से वह स्कल्मबेरगर एशिया सर्विस लिमिटेड ड्रीलिंग एंड मेजरमेंट सेगमेंट में ट्रेनी फील्ड इंजीनियर के रूप में कार्यरत है.
नीतिशा बताती है कि वह एकमात्र ट्राइबल लड़की है, जिनका चयन नौ भारतीयों में से हुआ है. क्लास में कुल 70 स्टूडेंस है, जो 39 देशाें से है. इन सारे लोगों के साथ पढ़ने अौर उनके कल्चर को जानने का सुनहरा अवसर मिला है. 2016 में प्रधानमंत्री रूरल फेलो के लिए नीतिशा का चयन हुआ. नीतिशा बताती है कि उसके आगे बढ़ने में परिजनों के साथ-साथ पिता का मार्गदर्शन मिला है.
रणदीपभूषण सिंह मुंडा
ग्रीन बिल्डिंग कॉन्सेप्ट में अग्रणी है मुंडा की कंपनी
रांची के रणदीपभूषण सिंह मुंडा की कंपनी ‘इडन ग्रीन टेक्नोलॉजी’ झारखंड, बिहार, बंगाल व अन्य राज्यों में ग्रीन बिल्डिंग, लैंडस्केप इंजीनियरिंग, वाटर एस्थेटिक्स व सिविल इंजीनियरिंग से संबंधित कॉन्सेप्ट, डिजाइन, सप्लाइ, एप्लीकेशन व मेंटेनेंस की सुविधा मुहैया करा रही है़
इसकी शुरुआत रणदीप ने 2012 में की थी़ इंजीनियरिंग की पढ़ायी पूरी करने के बाद उन्होंने स्वरोजगार के क्षेत्र में कदम रखने का निर्णय लिया़ आज उनकी कंपनी झारखंड व बिहार में लैंडस्केप इंजीनियरिंग व ग्रीन बिल्डिंग कॉन्सेप्ट पर काम करनेवाली कंपनियों में अग्रणी है़
उन्होंने 20-22 युवाओं को प्रत्यक्ष और लगभग 50 लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दिया है़ वह कहते हैं कि युवाओं को सरकारी व निजी नौकरी के दायरे से हट कर कुछ अलग करने की सोचने की भी जरूरत है़
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