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Home विशेष उल्लेख मैनो बहिन की आवाज का जादू

मैनो बहिन की आवाज का जादू

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मैनो बहिन की आवाज का जादू

कोरनेलियुस मिंज

आज से ठीक 60 वर्ष पहले किशोर शर्मा की आवाज ‘दिस इज ऑल इंडिया रेडियो रांची’ के साथ छोटानागपुर के वन-प्रांतर क्षेत्र रांची में आकाशवाणी की शुरूआत की गयी. इसी के साथ किशोर शर्मा आकाशवाणी रांची के पहले उद्घोषक बने. यह इस क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक घटना थी. शाम के ठीक पांच बजे जब यह ध्वनि रेडियो के माध्यम से जैसे ही लोगों तक पहुंची उनमें खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

यह छोटानागपुर में एक नये अध्याय का श्रीगणेश था. आकाशवाणी रांची की स्थापना 27 जुलाई 1957 को बेहद रोचक कार्यक्रम के साथ की गयी. रांची के वेलफेयर सेंटर हॉल में तत्कालीन बिहार के राज्यपाल डॉ जाकिर हुसैन,तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह, सूचना और प्रसारण मंत्री बाल कृष्ण विश्वनाथ केसकर और आकाशवाणी के महानिदेशक प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ जगदीश चंद्र माथुर की उपस्थिति में स्थापना समारोह संपन्न हुआ था.

समारोह में झारखंड के तीन भाषाओं के लोक कलाकारों ने गीत-नृत्य प्रस्तुत किया था. इनमें नागपुरी के पांडेय वीरेंद्र नाथ राय, कुड़ुख के जतरू उरांव और कुरमाली के अंगद महतो शामिल थे. आकाशवाणी रांची की सबसे ज्यादा लोकप्रिय कार्यक्रम ‘देहाती दुनिया’ भी स्थापना समारोह के दिन ही प्रारंभ हुआ. देहाती दुनिया कार्यक्रम की शुरूआत जुलियस तिग्गा, किशोर सिंह, नवीन मुंडू और एसेंसिया खेस्स की आवाज के साथ हुई. यह जीवंत प्रसारण था. इनमें जुलियस तिग्गा पहोन भाई, किशोर सिंह भगत भाई, नवीन मुंडू झमन भाई और एसेंसिया खेस्स मैनो बहिन के नाम से देहाती दुनिया कार्यक्रम की शुरूआत की. कंपीयरों की जादूभरी आवाज के कारण थोड़े ही दिनों बाद यह आकाशवाणी रांची का सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम बन गया.

देहाती दुनिया कार्यक्रम को लोगों की पहली पसंद बनाने में एसेंसिया खेस्स का सबसे बड़ा योगदान था. मैनो बहिन के नाम से वह श्रोताओं के बीच अल्प समय में चर्चित हो गयीं. मैनो बहिन की आवाज का जादू श्रोताओं में इस कदर छाया कि लोग शाम में अपने रेडियो सेट पर चिपक जाते थे. उनकी आवाज ने लोगों को आकर्षित कर रखा था.

आकाशवाणी रांची की पहली महिला कंपीयर एसेंसिया खेस्स का नागपुरी भाषा साहित्य के प्रति लोगों में रुचि पैदा करने में अविस्मरणीय योगदान रहा है. नागपुरी की कोकिला कंठ कही जाने वाली एसेंसिया खेस्स अपनी सुमधुर आवाज के कारण मैनो बहिन के नाम से लोकप्रिय हुईं. देहाती दुनिया कार्यक्रम की पहली महिला कंपीयर बनी एसेंसिया खेस्स की आवाज ने नागपुरी समाज में ऐसे जादू बिखेरा कि आकाशवाणी रांची से प्रसारित देहाती दुनिया कार्यक्रम श्रोताओं की पहली पसंद बन गयी. आकाशवाणी रांची से उनके जुड़ाव की कथा भी दिलचस्प है. मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए वीमेंस कॉलेज में नामांकन कराया. एसेंसिया खेस्स लूथरान स्टूडेंट यूनियन की सदस्य भी थीं. जब वह रांची महिला कॉलेज में बीए तृतीय वर्ष की छात्र थीं तब एलएसयू की ओर से आकाशवाणी रांची को देखने रातू रोड पहुंची. लूथरान स्टूडेंट यूनियन के सदस्यों ने आकाशवाणी रांची खुलने की बात सुन रखी थी, इसलिए उसे देखने के लिए गये थे. उस टीम में एसेंसिया खेस्स भी थीं. एसेंसिया खेस्स ने मुलाकात में बताया कि प्रारंभ में आकाशवाणी खुलने के समय टावर नहीं लगे थे. कुछ दो चार टेबल पड़े थे. आकाशवाणी के अधिकारी उनकी टीम को देखकर बोले कि घूमने आये हो तो आकाशवाणी में काम करने के लिए इंटरव्यू दे दो. उनके कहने पर एसेंसिया ने साक्षात्कार दिया. साक्षात्कार के समय नागपुरी में बातचीत करने को कहा गया था. नाटक और रूपक आलेख को पढ़ने दिया. तत्कालीन सहायक स्टेशन निदेशक कौशल ने उनका इंटरव्यू लिया था. उन्हें जरा भी डर नहीं लगा. अंतत: उनका चयन हो गया. उस समय बीए तृतीय वर्ष की छात्र होने के कारण वह आकाशवाणी में योगदान नहीं देना चाहती थी, इसलिए आकाशवाणी रांची के अधिकारियों ने वीमेंस कॉलेज की तत्कालीन प्राचार्या भानुमति प्रसाद से मुलाकात कर योगदान देने के लिए अनुमति देने का आग्रह किया. इस पर प्राचार्या ने एसेंसिया को खूब समझाया, फिर भी वह पढ़ाई छूट जाने के भय से योगदान नहीं देना चाहती थी, लेकिन अंतत: सबके समझाने और दबाव होने पर उन्होंने 10 जुलाई 1957 को आकाशवाणी रांची में योगदान दिया.

प्रारंभ में पार्ट टाइम के रूप में योगदान दिया. आकाशवाणी रांची की स्थापना समारोह के दिन 27 जुलाई 1957 को देहाती दुनिया कार्यक्रम की पहली महिला कंपीयर बनने का उन्हें गौरव प्राप्त हुआ. फिर बाद में देहाती दुनिया की मलिका-ए-आवाज बन गयी. पहले दिन देहाती दुनिया कार्यक्रम में कांके कृषि विश्वविद्यालय से डॉ एसएम आलम खेती-बारी के बारे में बताने आये थे.

रेबा बनर्जी ने भजन गाया था. साथ ही दो लोकगीत बजाया गया था. मैनो देहाती दुनिया कार्यक्रम की सबसे हिट आवाज बनकर उभरीं. वह गांव-घर की नागपुरी भाषा बोलती थीं. कुछ दुख-तकलीफ, काम-धंधे की बात ग्रामीणों के जेहन में समाकर किया करती थीं. मोंय, तोंय और रउरे शब्दों का खूबसूरत तरीके से प्रयोग करती थीं. इसी कुशलता के कारण रातू महाराजा भी मैनो बहिन के नागपुरी के कायल थे. वे उनकी नागपुरी से बेहद प्रभावित थे.

कार्यक्रम के बाद वे प्रतिक्रिया देने के लिए फोन भी करते थे. मैनो बहिन ने आकाशवाणी रांची में 10 जुलाई 1957 से 1964 तक काम किया. इसके बाद वह शादी करके दिल्ली में बस गयीं. अभी दिल्ली में रहती हैं. वह मूलत: रांची की रहने वाली हैं. उनके साथ देहाती दुनिया कार्यक्रम प्रारंभ करने वालों में जुलियस तिग्गा और किशोर सिंह इस दुनिया में नहीं हैं, जबकि नवीन मुंडू यानि झमन भाई कुछ सामाजिक कार्यों में जुटे हुए हैं.

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