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Home विशेष उल्लेख जब तक गरीबी रहेगी, मार्क्सवाद रहेगा

जब तक गरीबी रहेगी, मार्क्सवाद रहेगा

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जब तक गरीबी रहेगी, मार्क्सवाद रहेगा

II प्रो एस इरफान हबीब II

इतिहासकार

बीते सालों में कई जगहों पर सांस्थानिक रूप से मार्क्सवाद (पार्टी आधारित मार्क्सवाद- चाहे वह रूस का सोवियत यूनियन हो या भारत का सीपीआईएम हो) भले खत्म हो गया हो, लेकिन कार्ल मार्क्स का दर्शन हमेशा जिंदा रहेगा. मार्क्सवाद पर आधारित जितनी भी राजनीतिक संस्थाएं थीं या हैं, अनेक कारणों से उनका महत्व कम हुआ है या खत्म हुआ है, लेकिन मार्क्सवाद की अवधारणा का महत्व आज भी है.

आपनिवेश के खिलाफ जब भी किसी समाज में बात की जायेगी, तो मार्क्सवाद वहां प्रासंगिक नजर आयेगा. पूंजी के खिलाफ और गरीबों के संघर्ष में मार्क्सवाद की एक महत्वपूर्ण भूमिका है. देश और दुनिया में आज भी गरीबी, भुखमरी और सामाजिक संघर्ष है, फिर भी मार्क्सवाद की विचारधारा कहीं नजर नहीं आती है, तो इसका कारण यही है कि मार्क्सवाद से जुड़ी तमाम राजनीतिक संस्थाओं ने इस विचारधारा को आगे बढ़ाना बंद कर दिया.

रूस में यूएसएसआर का पतन इसलिए हुआ, क्योंकि वहां कम्युनिस्ट पार्टी ब्यूरोक्रेसी का शिकार हो गयी थी और उसमें तथा दूसरी राजनीतिक पार्टियों में कोई खास फर्क नहीं रह गया था. उसमें मार्क्सवाद की विचारधारा को पीछे धकेल दिया गया था. उसी तरह से चीन में भी सब कुछ बदल गया और अाज तो वहां ‘मार्केट मार्क्सिज्म’ की विचारधारा काम कर रही है.

मार्क्सवाद की अवधारणा अगर आज कहीं दिखायी नहीं दे रही है, तो इसका मतलब यह नहीं कि यह पूरी तरह से खत्म हो गया. इतिहास से इसको मिटाया नहीं जा सकता. और इतिहास खुद को दोहराता भी है और चीजें आती-जाती रहती हैं. मार्क्सवाद जब आया था, तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि इसका सांस्थानिक रूप से पतन हो जायेगा, लेकिन हो गया.

अब यह भी कहा जा सकता है कि जब पूंजीवाद अपने चरम तक पहुंचेगा और गरीबी, भुखमरी, पूंजीवाद, बेरोजगारी की समस्याएं खड़ी होंगी, तब फिर से मार्क्सवाद वापस जा जाये! बहरहाल, यह वक्त की बात है. नयी चीजों में कई बार बहुत पुरानी चीजें विकल्प के रूप में आती हैं. यहां पर मार्क्सवाद वही पुरानी चीज है, जो बेहतर भविष्य का विकल्प बन सकता है, जिसमें गरीबी, बेरोजगारी, गैरबराबरी न हो और हमारा समाज साम्यवादी हो जाये.

भारतीय लोकतंत्र को खरे रूप में स्थापित करने के लिए सिर्फ मार्क्सवाद ही काफी नहीं है, क्योंकि यहां धर्म गहरे तक लोगों के मानस में है.

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में बहुत सी चीजें मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांतों से टकराती हैं, इसलिए सिर्फ इस पर हम निर्भर नहीं रह सकते. रूढ़िवादिता के खिलाफ मार्क्स ने आवाज उठायी थी, यहां यह चीज अब भी है, इसलिए हमारे समाज के एक हिस्से ने मार्क्सवाद को नकारा है. हालांकि, मार्क्सवाद में रूढ़िवादिता के खिलाफ जो विचार है, वह उसका बहुत छोटा सा हिस्सा है और इसके अलावा बहुत कुछ है, जो भारतीय समाज के लिए जरूरी है.

मेरा अपना ख्याल यह है कि मार्क्सवाद से जुड़ी जो भावनाएं हैं, उनको हमें आगे बढ़ाना चाहिए. जिस तरह से भगत सिंह ने आगे बढ़ाया था, हालांकि वे कम्युनिस्ट पार्टी से नहीं जुड़े हुए थे और वे एक स्वतंत्र मार्क्सवादी थे, मार्क्सवाद से बेहद प्रभावित थे. क्योंकि जब तक इस दुनिया में गरीब का संघर्ष चलता रहेगा, तब तक मार्क्सवाद की प्रासंगिकता बरकरार रहेगी.

गरीबी, रोजी-रोटी, बेरोजगारी, पूंजीवाद जैसी चीजों से मार्क्सवाद गहरे तक जुड़ा है और इसी के रास्ते इन समस्याओं का हल भी दिखता है. चाहे वह फ्रांस हो, चाहे जर्मनी हो या भारत हो, या दुनिया का कोई भी देश हो, जहां पर अगर आगामी सैकड़ों सालों तक गरीबी, भुखमरी, पूंजीवाद, बेरोजगारी जैसी समस्याएं रहेंगी, वहां मार्क्सवाद की जरूरत महसूस की जाती रहेगी और एक स्तर पर इन समस्याओं का हल भी इसी में मुमकिन है.

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