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Home विशेष उल्लेख समकालीन समाज में संताली भाषा की भूमिका

समकालीन समाज में संताली भाषा की भूमिका

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समकालीन समाज में संताली भाषा की भूमिका
II डॉ अनिमा हांसदा II
सहायक प्रोफेसर, संताली विभाग
गोस्सनर कॉलेज, रांची
हर समाज युग के साथ बदलता है. समाज का स्तर स्वरूप बदलता है. समाज की भाषा बदलती है और उसका साहित्य भी अलग स्वरूप के साथ लेता है. भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय भाषाओं का साहित्य एक महासमुद्र की तरह है, जिसमें अनेक भाषा साहित्य समाहित है और जिसमेें भारतवर्ष का ऐतिहासिक भौगोलिक सामाजिक एवं आर्थिक जीवन की समग्रता का समावेश है. यहां आर्य भाषा समूहों का व्यापक शिष्ट साहित्य है तो दूसरी ओर आर्येतर भाषाओं के साहित्य का विशाल समूह भी है.
संताली संताल जनजाति की भाषा है जो झारखंड के संताल परगना के दुमका, देवघर, जामताड़ा, गोड्डा, साहेबगंज, पाकुड़, गिरिडीह, हजारीबाग जिला तथा बिहार के बांका मुंगेर, जमुई पूर्णियां, कटिहार जिलों तथा बंगाल के मिदनापुर, वीरभूम, बोल्लपुर, मालदा, बाकुड़ा, पुरूलिया, मुर्शिदाबाद, बर्द्धमान, दार्जिलिंग जिलों में, उड़ीसा के क्योंझर, मयूरभंज, सुंंदरगढ़ आदि जिलों के साथ असम के कोकराझार आदि जिलों के साथ नेपाल, बांग्लादेश जैसे देशों में बोली जाती है.
आजीविका के लिए संताल जहां भी गये हैं. संताली भाषा ही बोलते हैं. संताली भाषा क्षेत्र विभिन्न भाषाभाषी क्षेत्रों से घिरा है. संतालों की विशेषता है कि वे द्विभाषी-त्रिभाषी अवश्य होते हैं. वे अपनी भाषा संताली तो बालते हैं साथ ही हिंदी, बंगला, ओड़िया, असमी भी धड़ल्ले से बोलते हैं.
संताली भाषा का विकास भी अंग्रेजो के आगमन के बाद, छापाखानों की स्थापना काल में द्रुत गति से होने लगा फिर भी संताली भाषा समृद्ध होकर भी शिष्ट साहित्य का पूर्ण रूप नहीं ले पाया है, क्योंकि इसकी अधिकांश रचनाएं अलिखित ही रही हैं.
संताली लोकगीत और संताली लोक कथाओं का अथाह समूह जो अलिखित ही है जिसको स्क्रफ्सरूड, बोंपास, पीओ बोडिंग, एंड्र कैम्वेल, मैकफेल जैसे लेखकों ने रोमन लिपि में लिपिबद्ध किया और संताली भाषा को समृद्ध किया. ये लोकगीत एवं लोककथाएं संताल जनजीवन, उनकी सामाजिक संरचना विविध संस्कारों के संवाहक के साथ संवर्द्धक भी है और उत्प्रेरक भी. संताली लोक साहित्य अत्यंत समृद्ध है, लेकिन उनका शिष्ट साहित्य शैशवास्था में है. संताल जनजाति का इतिहास देखें तो अंग्रेजों ने रेललाइन बिछाने एवं जंगलों को काटने के लिए संताल परगना मेंं बसाना शुरू किया.
संताल जनजाति के इतिहास मेंं 1855 का संताल विद्रोह एक ऐसी सीमारेखा है जिसने समस्त संसार में संतालों को एक लड़ाकू जाति, एक साहसी योद्धा जनजाति के रूप में स्थापित किया. भारतीय सभ्यता के बदलते दौर में भी संतालों नेे दूसरे सभ्य कही जाने वाली जातियों के साथ मिलकर अपनी विलक्षण अनमोल अक्षुण्ण संस्कृति का निर्माण करते हुए इसे समृद्ध ही किया. संताली भाषा ने संताल जाति को जीवंत बनाया है, जीवित रखा है. अगर संताली भाषा न होती जो संलात जनजाति का अस्तित्व न होता. संतालों ने हजारों वर्षों से अपने को जीवित रखते हुए अपनी भाषा संताली को भी जीवित रखा है. दोनोंं की पहचान एक दूसरे के पूरक के रूप में हैं.
संतालों के जनजीवन में भी कुछ विशेषताएं हैं, उनका सामान्य जीवन अनेक स्तरीय व्यवस्थाओं से घिरा है. कुछ कार्यक्रम पारिवारिक होते हैं, कुछ ग्राम्य स्तर पर भी संचालित होते हैं और ग्राम्य सामाजिक अथवा हाट मेलों में आदिवासियों के सहभाग से जो चित्र साहित्यकारों के समक्ष उमड़ता है. हिंदी में सबसे अधिक रचनाएं आदिवासी पर्व त्योहारों को लेकर की गयी है. संतालों के जीवन में उनके लोकगीत और लोक कथा आदि के बारे में भक्तिपूर्ण धारणा तो है ही अपना परंपरागत जीवन की संघर्षमय गाथाओं के प्रति भी उनकी वैसी ही भक्ति रहती है
संताली भाषा साहित्य ने भारतीय समाज के साथ संताली जनजाति को जीवंत बनाते हुए हिंदी, बंगला और ओड़िया साहित्य को भी प्रभावित किया है. इसने एक राजनीतिक चेतना दी है. संताली भाषा अब जंगलों में बोली जाने वाली भाषा नहीं रह गयी है, बल्कि अब शहरों तक पहुंच चुकी है.
संताली भाषा में देवनागरी लिपि, ओलचिकि लिपि में अनेक लेख, कहानियां, कविताएं, उपन्यास, नाटक आदि विधाओं की रचना की जा रही है. पश्चिम बंगाल के बर्द्धमान, शांतिनिकेतन जैसे विश्वविद्यालय, झारखंड में रांची विश्वविद्यालय, कोल्हान एवं विनोबा भावे विश्वविद्यालय में पठन-पाठन शुरू किया गया है.
संताली संतालों के हूल की भाषा है, क्रांति की भाषा है, झारखंड निर्माण की भाषा है. संताली साहित्यकारों को लेखनी शिष्ट साहित्य के निर्माण की और अग्रसर हो चुकी है. वही जाति जीवित होती है, जिसकी भाषा, संस्कृति, सभ्यता जीवित होती है. संताली भाषा जब तक जीवित है तब तक संतालों का सामाजिक राजनैतिक विकास होता रहेगा. ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है.
संताली भाषा में फिल्में भी बनने लगी है. रेडियो स्टेशन और दूरदर्शन से प्रसारण होने लगे है.आधुनिक भारतीय समाज संताली भाषा के प्रभाव से अछूता नहीं रहेगा, बल्कि समकालीन भारतीय समाज संताली भाषा एवं संस्कृति को अपने मेंं ग्रहण करते हुए व्यापक रूप लेगा जिससे संताली समाज एवं भाषा और अधिक विकसित होगा.
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