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लंबी राजनीति के लिए भाजपा ने आजसू का साथ लिया

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आनंद मोहन
पिछले आठ वर्षो से शासन में सहभागी रहीं हैं दोनों पार्टियां
रांची. वर्तमान विधानसभा चुनाव में राजनीतिक फलक पर नये-नये समीकरण बने. राजनीतिक परिस्थितियों और मजबूरियों ने नये रिश्ते बनाये. भाजपा-आजसू का गंठबंधन हुआ. दोनों पार्टियां पिछले आठ वर्षो में शासन में सहभागी रहीं, दोनों पार्टियों के बीच साझा समझ पहले से ठीक-ठाक रही है. लेकिन इससे पहले दोनों ने कभी साथ चुनाव नहीं लड़ा.
मिशन मोदी में निकली भाजपा केंद्र के बाद राज्यों में अपनी सरकार बनाने का एजेंडा हाथ में लिया है. भाजपा इसमें कोई चूक नहीं करना चाहती है.
आजसू के साथ गंठबंधन कर भाजपा ने दूर की कौड़ी चली है. यह गंठबंधन सत्ता तक पहुंचने के लिए रास्ते बनाने की कवायद है. पिछले कुछ वर्षो में राजनीति की जातीय गोलबंदी का गणित बदलता रहा है. झारखंड भी इससे अछूता नहीं रहा. आदिवासी-अल्पसंख्यक वोट बैंक में जिस तरह कांग्रेस की पैठ थी, वह दरकती गयी. आदिवासियों का एक बड़ा वोट बैंक क्षेत्रीय दलों की ओर चला गया. कांग्रेस के इस वोट बैंक में झामुमो ने सेंध मारी.
वहीं झामुमो के महतो-मांझी समीकरण में भी घुसपैठ हुई. झारखंड के बड़े महतो वोट बैंक में आजसू जैसी पार्टियों ने पैठ बनायी. झारखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि से पले-बढ़े झामुमो-आजसू जैसी पार्टियों ने झारखंड में अपना-अपना जनाधार बढ़ाया. भाजपा राजनीति के इस समीकरण को समझ रही है. आजसू के सहारे भाजपा ने एक बड़े वोट बैंक की गोलबंदी अपने पक्ष में कराने की कवायद में गंठबंधन किया.
इस समाज से आये विनोद बिहारी महतो, निर्मल महतो जैसे कद्दावर नेताओं ने झारखंड की राजनीति की धार दी. अपनी धाक और संघर्ष से झामुमो के पक्ष में शिबू सोरेन के साथ मिल कर मजबूत समीकरण बनाया.
समय और परिस्थितियां बदलती गयी. वर्तमान समय में आजसू ने इस बड़े वोट बैंक में अपनी पकड़ बनायी. सुदेश महतो एक मजबूत नेता के रूप में उभर कर सामने आये. राज्य गठन के बाद बदले झारखंडी मानस में सुदेश महतो बड़े जमात में सर्वग्राह हुए. भाजपा ने सुदेश महतो के साथ गंठबंधन कर एक बड़े वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है. आदिवासी मतदाताओं (गैर-ईसाई) को भाजपा अपनी ओर करने में कुछ हद तक सफल रही है.
अब सुदेश के सहारे महतो वोट बैंक पर नजर है. भाजपा को उत्तरी, दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के महतो बाहुल्य क्षेत्रों में इसका फायदा भी मिल सकता है. महाराष्ट्र चुनाव में पसीना बहाने के बाद भी भाजपा सत्ता की सारी सढ़ियां नहीं चढ़ सकीं. भाजपा-आजसू गंठबंधन से राजनीति किस करवट बैठेगी, यह भविष्य के गर्त में है. लेकिन भाजपा ने गंठबधन कर फिलहाल विपक्षी खेमे की परेशानियां जरूर बढ़ा दी हैं.
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