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विकास की किरणों से कोसों दूर है तुलबुला

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विकास की किरणों से कोसों दूर है तुलबुला

पीयूष तिवारी, गढ़वा

गढ़वा प्रखंड का आदिवासी बहुल इलाका तुलबुला विकास की किरणों से वंचित रह गया है. जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर ऊंची-नीची पहाड़ियों के बीच इस गांव में वोट मांगने के अलावा कोई कभी नहीं जाता. प्रशासन की पहुंच से दूर तुलबुला शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पीने के पानी, सड़क, बिजली जैसी सभी सुविधाओं से वंचित है.

एक हजार की आबादीवाला यह गांव पत्थरगड़वा, बर टोला, स्कूल टोला, अखरा टोला, कटइटांड़ एवं कोरहाटी टोला में बंटा हुआ है. गांव के लोग जंगल से दातून तोड़ कर एवं पत्तों का दोना बना कर गुजारा करते हैं.

जीविकोपाजर्न के लिये ग्रामीणों की दिनचर्या बहुत मुश्किल है. रोजगार का विकल्प नहीं है. गांव के लोग सुबह पांच बजे ही सखुआ की पत्ती लेने के लिये जंगल निकल जाते हैं. वहां से पत्ती चुन कर लाने के बाद उसका पत्तल बनाते हैं. गढ़वा और आस-पास के इलाकों में इस्तेमाल किये जानेवाले पत्तल और दोने तुलबुला में ही बनते हैं. गर्मी के मौसम में महुआ, तेन व पिआर आदि चुन कर ग्रामीण पैसा कमाने की कोशिश करते हैं.

पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है. आदिवासियों को पहाड़ी के बीच से गुजरे नाले का पानी ला कर पीना पड़ता है. गांव में जाने के लिये सड़क नहीं है. अस्पताल नहीं है. मनरेगा की योजनाएं तक नहीं चलतीं. गांव के युवा रोजगार की तलाश में बाहर चले जाते हैं.

नाला ही है पानी का इकलौता स्त्रोत

तुलबुला के लोग पीने के पानी के लिये तरसते हैं. इस गांव के सभी छह टोलों को मिला कर स्कूल टोला पर इकलौता चापाकल है. ऊंची-नीची जमीन होने के कारण एक किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर स्कूल टोला तक आना सभी टोलों के लिये संभव नहीं है. ग्रामीण गांव के बीच से गुजरते जलपुरा नाला का पानी पीने को विवश हैं.

जंगल के रक्षक रहते हैं गांव में

तुलबुला गांव में जंगल के रक्षक रहते हैं. गांव के लोगों के जीविकोपाजर्न का आधार एक मात्र जंगल ही है, इसलिए वह जंगल को काटने से लोगों को रोकते हैं. ग्रामीणों के प्रयास से काफी दूर तक जंगल को आबाद किया गया है. इसके लिये उनको जंगल काटनेवालों से कई बार भिड़ना भी पड़ता है.

फेल है सर्व शिक्षा अभियान

तुलबुला गांव के आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने का सर्वशिक्षा अभियान का कार्यक्रम भी पूरी तरह फेल है. शिक्षा विभाग ने गांव में उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय का भवन बना दिया है, पर वहां हमेशा ताला लगा रहता है. ग्रामीण बताते हैं कि स्कूल में पढ़ाई नहीं होती. हां, बच्चों को स्कूल से खिचड़ी जरूर बांटी जाती है. खिचड़ी खिलाने के लिये स्कूल नियम से रोज आधे घंटे खोला जाता है. स्कूल में कुल 65 बच्चे नामांकित हैं, लेकिन पढ़ने कोई नहीं जाता. रोज कुछ बच्चे दोपहर में खिचड़ी खाने स्कूल जरूरत पहुंचते हैं.

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