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जनजातीय विकास

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जनजातीय विकास

केंद्र सरकार ने देश के जनजाति वर्ग के कल्याण के लिए उठाये जा रहे प्रयासों का ब्यौरा देते हुये इस दिशा में होनेवाले भावी प्रयासों का ब्यौरा दिया है. सरकार ने इस समुदाय में भी विशेष रूप से कमजोर समूहों के बारे में घोषणाएं की हैं. भारत में 2011 की आखिरी जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, आबादी में जनजाति समुदाय का हिस्सा 8.6 प्रतिशत है. लेकिन, आजादी के 75 वर्षों के बाद भी विकास की सीढ़ी पर वे सबसे निचले पायदान पर हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पीने का पानी, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं को हासिल करने में जनजाति समुदाय सबसे पीछे है. अभी भी इस समुदाय तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने का लक्ष्य हासिल नहीं हो सका है.

किसी चुनौती का हल तलाश करने के लिये उस परिस्थिति को गहराई से समझना जरूरी है. ऐसे में केंद्र सरकार की जनजाति समुदाय में सबसे कमजोर तबके के बारे में शोध करवाने की कोशिश प्रभावकारी हो सकती है. केंद्र सरकार विशेष रूप से कमजोर तबकों या पीवीटीजी वर्ग के लगभग 28 लाख लोगों का मानव विकास सूचकांक पता करने के लिये सर्वे करवाने पर विचार कर रही है. इसके जरिये यह जानकारी एकत्र की जायेगी कि खास तौर पर आदिवासी लोगों की जिंदगी में कैसे बदलाव आया है और सरकारी नीतियों से उनके जीवन पर कितना फर्क पड़ रहा है. इस सर्वे से देश के 22 हजार गांवों में बसे आदिवासी समूहों के बारे में एक डेटाबेस तैयार हो सकेगा.

दरअसल, जनजातियों में भी विशेष रूप से कमजोर जनजातियों पर ध्यान देने की जरूरत आजादी के कुछ दशक बाद ही महसूस की गयी. इसकी वजह यह थी कि जनजातियों के विकास के लिए जो भी योजनाएं लायी जाती थीं, उनमें से बड़ा हिस्सा इन समुदायों के ज्यादा विकसित और प्रभावशाली समूह ले लिया करते थे. फिर 1973 में यूएन ढेबर आयोग ने जनजातियों में भी कम विकसित जनजातियों को अलग करने की सिफारिश की. इस समूह को बाद में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) का नाम दिया गया. आज 705 जनजातियों में 75 पीवीटीजी में, यानी विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह में आती हैं. इनकी सबसे ज्यादा संख्या ओडिशा में है. जनजाति समुदाय के विकास की चुनौती का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इनकी 90 फीसदी आबादी या तो जंगलों या पहाड़ियों या सूखे वाले इलाकों में रहती है. भारत के बढ़ते आर्थिक विकास का लाभ इन पीछे छूट गये इलाकों और देशवासियों को भी मिलना चाहिए.

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