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Home Badi Khabar Tata Steel Jharkhand Literary Meet : ममता कालिया ने कहा, लोगों को फेसबुक से बुक की ओर ले जा रहा साहित्य उत्सव

Tata Steel Jharkhand Literary Meet : ममता कालिया ने कहा, लोगों को फेसबुक से बुक की ओर ले जा रहा साहित्य उत्सव

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Tata Steel Jharkhand Literary Meet : ममता कालिया ने कहा, लोगों को फेसबुक से बुक की ओर ले जा रहा साहित्य उत्सव

क्या आप पहले रांची आईं हैं या यह पहली बार है?

मैं रांची पहली बार आई हूं और यह शहर मुझे बहुत पसंद आया है. इससे पहले मैंने रांची के बारे में भूगोल की किताबों में पढ़ा था कि चेरापूंजी और रांची में बहुत बारिश होती है. यहां शायद कल भी बारिश हो रही थी, लेकिन अभी अच्छी धूप निकली हुई है. रांची वासियों को जोहार और धन्यवाद.

आपने लेखन की शुरुआत 16-17 वर्ष की उम्र में कर दी थी, यह कैसे संभव हो पाया था?

मेरे जीवन में जबतक मेरे पति रविंद्र कालिया नहीं आए थे, मेरे हीरो मेरे पिता थे. मेरे पापा हिंदी और अंग्रेजी के विद्वान थे और वे रेडियो में काम करते थे. उनकी वजह से मैंने कई बड़े-बड़े कवियों और लेखकों को लाइव सुना था, क्योंकि उस वक्त कार्यक्रम की रिकाॅर्डिंग नहीं होती थी. मैंने हरिवंश राय बच्चन, भगवती चरण वर्मा और बेगम अख्तर को लाइव सुना था और मैं उनसे बहुत प्रभावित होती थी. जब लोग उनसे मिलने आते थे तो मुझे बहुत अच्छा लगता था और अगर मैं यह कहूं कि मैं रेडियो सुनते, किताब पढ़ते और लेखकों-कवियों को सुनते लिखने लगी तो गलत नहीं होगा.

हमने यह सुना है कि आपको शादी से पहले रविंद्र कालिया जी ने चुनौती दी थी जिसके बाद आपने कहानियां लिखना शुरू किया?

जी, मेरी मुलाकात रवि जी से पंजाब यूर्निवर्सिटी के एक गोष्ठी में हुई थी. वहां मैंने कहानियों पर पर्चा पढ़ा था. जब मैं दिल्ली वापस आ रही थी, तो इत्तेफाक से हमारी बस एक ही थी और हम अगल-बगल की सीट पर बैठे थे. हमारी बात हुई और उन्होंने मुझसे यह कह दिया कि आप सिर्फ कविता-वविता ही लिखती हैं या कुछ और भी लिखती हैं? आप कहानियां नहीं पढ़ती हैं क्या? किसी दूसरे कहानीकार को नहीं पढ़ती हैं क्या? उनकी यह बात मुझे अच्छी नहीं लगी और हमारी बहस हो गई. तब मैंने कहानी लेखन को चुनौती के रूप में लिया और कहानियां लिखना शुरू किया. हालांकि सिर्फ यही वजह नहीं है, मैंने कविताओं से खुद को इसलिए भी अलग किया क्योंकि कविता का युग खत्म हो रहा था और कविताएं देहवादी होती जा रही थीं. हमारी उस मुलाकाता में मुअर्नेस्ट हेमिंग्वे ट्‌विस्ट लेकर आए. हेमिंग्वे से हमदोनों प्रभावित थे और उनके डाॅयलाॅग हमें याद थे, बस इसी वजह से हमारी दोस्ती हो गई और फिर हमने शादी कर ली.

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Tata steel jharkhand literary meet : ममता कालिया ने कहा, लोगों को फेसबुक से बुक की ओर ले जा रहा साहित्य उत्सव 3

आज के दौर में सोशल मीडिया का प्रभाव है आप इसे कैसे देखती हैं?

हम दो शताब्दियों के बीच के लोग हैं. हमने काफी बदलाव देखा है. आज के समय टेक्नोलाॅजी का काफी विकास हुआ है. मैंने कहानियों को काफी बदलते हुए देखा है. आज के समय में जितना विकास हुआ है उतना ही विनाश भी हुआ है.

आपको लेखन में तीन दशक से अधिक का अनुभव है, लेखन में रुचि रखने वाले युवाओं को क्या सलाह और सुझाव देंगी.

युवाओं को मैं यह कहना चाहती हूं कि आज दुनिया पल-पल बदल रही है. इस परिवर्तनकामी समय में लिखने के लिए कई विषय हैं, जिनका आप चुनाव कर सकते हैं. आपके आसपास आपके घर में कई पात्र हैं, बस जरूरत है उन्हें समझकर लिखने की. मैं यह भी कहना चाहती हूं कि अगर आप व्यथा में हैं, तो उसे भी लिखें. आपके जैसे कई लोग होंगे, जिनकी व्यथा आपके जैसी होगी. आपके जीवन में कई सवाल और परिस्थितियां ऐसी होती हैं, जिनकी चर्चा आप अपने मां-बाप, भाई-बहन और दोस्तों से नहीं कर सकते हैं, लेकिन आप उन्हें लिख सकते हैं, तो उन्हें लिखिए. मेरी एक सलाह है कि निराशावादी ना लिखें, लेकिन ऐसा लिखें जो लोगों को प्रेरित करे.

आप कहानी लिखते समय निष्कर्ष पर पहले पहुंच जाती हैं या पहले पात्र तय होते हैं, उसके बाद परिस्थितियां और फिर निष्कर्ष?

आपका सवाल बढ़िया है, लेकिन यह दोनों छोर से खुला है. कई बार कहानियां निष्कर्ष पर पहुंचती ही नहीं परिस्थितियों में ही उलझकर रह जाती हैं. कहानी लिखने के लिए पात्रों को समझना जरूरी है.

अब साहित्य उत्सव का आयोजन लगभग हर बड़े शहर में हो रहा है? इसका कितना फायदा साहित्य को होगा?

साहित्य उत्सव का आयोजन निश्चित तौर पर साहित्य के लिए अच्छा है. यह साहित्य उत्सव लोगों को किताबों की ओर लेकर जाता है. ऐसे उत्सवों का हिस्सा बनकर जब लोग लेखकों को देखते हैं तो उनसे प्रभावित होते हैं और किताबें खरीदते हैं. अगर यह कहा जाए कि साहित्य उत्सव लोगों को फेसबुक से बुक की ओर लेकर जाता है तो गलत नहीं होगा. आप हमारी बिरादरी के हैं, क्योंकि आप पत्रकार हैं. एक साहित्यकार और पत्रकार एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं, क्योंकि दोनों लिखने-पढ़ने का काम करते हैं.

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आपकी आने वाली रचना कौन सी है और उसका नाम क्या है?

मैं अभी कोरोना काल की मोहब्बतें नाम से किताब लिख रही हूं. मैंने इस किताब में कोरोना की विभीषिका नहीं लिखी बल्कि मैंने उस दौरान के सर्वाइवर पर किताब लिखी है, उनके दुख-सुख. कई लोगों की शादियां कोरोना काल में हुई, उनके बच्चे हुए, तो इन बातों को कहने वाला भी कोई होना चाहिए.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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