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संतोषजनक हो न्यूनतम समर्थन मूल्य

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संतोषजनक हो न्यूनतम समर्थन मूल्य

भारतीय कृषि व्यवस्था में न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी सबसे महत्वपूर्ण घटकों में से एक है. उसकी वजह यह है कि यह एक हकीकत है कि ज्यादातर मामलों में किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिलता. न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था 60 के दशक में की गयी थी जब भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं था और अनाज आयात करना पड़ता था. तब किसानों को प्रोत्साहन देने के लिये कुछ कदम उठाये गये थे. पहला, नोबेल पुरस्कार विजेता कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग के संस्थान में विकसित अधिक उत्पादकता वाली किस्मों को, जिन्हें ड्वार्फ वेरायटी कहा जाता था, भारत के अनुकूल बनाकर इस्तेमाल किया गया जिससे हरित क्रांति का सूत्रपात हुआ.

साथ ही, गेहूं के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय किया गया. इसके साथ ही, भारतीय खाद्य निगम और सरकारी खरीद की व्यवस्था की गयी. उसी का नतीजा है कि आजादी के वक्त भारत का जो खाद्यान्न उत्पादन पांच करोड़ टन था, वह अब बढ़कर तीस करोड़ टन को पार कर गया है. आज भारत खाद्यान्नों का निर्यात कर रहा है. पिछले वित्त वर्ष में कुछ पाबंदियां लगी थीं, मगर उसके पहले भारत दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक हो गया था. बाजार का लगभग 42 प्रतिशत चावल भारत ने निर्यात किया था. गेहूं का भी निर्यात किया गया था.

इसमें बहुत बड़ी भूमिका किसानों को उनकी फसल का एक निश्चित दाम मिलने की गारंटी देना है, यानी वह कीमत जो उन्हें पहले से पता होती है. धीरे-धीरे यह व्यवस्था 23 फसलों के लिये लागू की गयी. इनमें धान और गेहूं जैसे खाद्यान्न, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी जैसे मोटे अनाज, तिलहन तथा अरहर, उड़द, मूंंग, मसूर, चना जैसी दलहन फसलें शामिल हैं. इनके अलावा कपास, गन्ना, कोपरा और जूट जैसी फसलों का भी एमएसपी तय होता है. लेकिन, खाद्यान्नों की ही खरीद ज्यादा होती रही. अब यह एक आम बात हो गयी है कि किसान हर बार अपनी फसल के बेहतर दाम की मांग करते हैं और इसे लेकर आंदोलन भी हुए हैं. यूपीए सरकार के दौर में डॉक्टर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग ने अपनी रिपोर्ट दी थी कि किसानों को एमएसपी के तहत उनकी लागत से 50 फीसदी ज्यादा कीमत दी जाए.

केंद्र सरकार कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिश के आधार पर एमएसपी की घोषणा करती है. आयोग इसके लिए राज्यों से लागत के आंकड़े मांगता है और फिर अपने फॉर्मूले के आधार पर एक कीमत सुझाता है. हालांकि, कई बार उनके सुझाव से ज्यादा या कम कीमत की भी घोषणा की जाती है. लेकिन, किसान इस घोषणा के बाद असंतुष्ट रहता है. पिछले दस सालों से उनकी मांग है कि एमएसपी उनकी लागत से 50 फीसदी ज्यादा दी जाए.

यह एक राजनीतिक मुद्दा भी हो गया है क्योंकि 2014 के चुनाव में जीत कर आयी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने स्वामीनाथन कमिटी की सिफारिश लागू करने का वादा किया था, मगर वह पूरा नहीं हो पाया. वर्ष 2019 में सरकार ने चुनाव से पहले इस दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश की मगर मतभेद चलता रहा. अभी जो एमएसपी मिलती है वह मुख्यतः गेहूं और धान जैसे खाद्यान्नों के लिये मिलती है. गन्ना, कपास के लिए अलग व्यवस्था है. केंद्र सरकार और एफसीआई राज्य सरकारों से मिल कर खाद्यान्न खरीदती हैं, मगर अन्य फसलों के साथ समस्या है. गन्ना, चीनी मिलें खरीद लेती हैं. कपास की खरीद, भारतीय कपास निगम करता है. फिर, सहकारी क्षेत्र की नैफेड को सरकार ने दलहन और तिलहन की खरीद के लिए अधिकृत किया है.

मगर देखा गया है कि खाद्यान्नों के मामले में भी यह व्यवस्था पंजाब, हरियाणा, यूपी के कुछ हिस्सों, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में ही सीमित है. तो यह सवाल अक्सर उठता है कि किसानों को उन 23 फसलों का वाजिब मूल्य सही में मिल रहा है या नहीं. साथ ही, किसान यह भी कहते हैं कि ये मूल्य कम हैं. तो यदि पिछले कुछ सालों की बात की जाए, तो एमएसपी तय करने के फॉर्मूले को लेकर एक आंदोलन चल रहा है. किसान आंदोलन के बाद सरकार ने इस बारे में एक समिति बनायी, मगर करीब साल भर बाद भी उसका कोई निष्कर्ष नहीं निकला है. यानी, यह हमेशा से एक चुनावी और राजनीतिक मुद्दा रहा है, लेकिन यह किसानों की आर्थिक स्थिति और उनके आय के स्रोत से बेहद करीब से जुड़ा एक मसला है.

किसान की लागत को लेकर मतभेद एक बड़ा मुद्दा है. इसकी गणना के दो तरीके हैं. एक में सारे मदों के खर्च के साथ पारिवारिक श्रम को भी जोड़ा जाता है. सरकार कहती है कि वह इस लागत के 50 फीसदी ऊपर का मूल्य दे रही है. किसान कहते हैं कि स्वामीनाथन समिति ने अपनी सिफारिश में समग्र लागत के 50 फीसदी ऊपर का मूल्य देने की बात कही थी, जिसमें कुछ अन्य मदों की लागत को भी जोड़ा गया था. किसान संगठन अपनी गणना के हिसाब से बताते हैं कि उन्हें कितना घाटा हो रहा है. इस साल घोषित एमएसपी के बाद भी ऐसी ही प्रतिक्रिया सामने आयी. दूसरी एक और समस्या का अंदाजा हरियाणा में अभी हुए किसान आंदोलन से मिलता है जो सूरजमुखी की एमएसपी को लेकर हुआ.

किसानों की मांग थी कि सरकार ने पिछले साल जो एमएसपी घोषित की थी, पहले वो दी जाए. अब इस साल सरकार ने सूरजमुखी की एमएसपी बढ़ा दी है. मगर सवाल है कि जब उन्हें पिछले ही साल की घोषित कीमत नहीं मिल रही, तो नयी बढ़ी कीमत का क्या फायदा. ऐेसे में एमएसपी बढ़ाना बस एक कागजी बात रह जाती है. एमएसपी को लेकर एक बड़ी समस्या यह है कि सरकार फसलों की एमएसपी तो बढ़ा देती है, मगर खरीद केवल तीन-चार फसलों की होती है, बाकी फसलों के लिए किसान को बाजार पर निर्भर रहना पड़ता है. पिछले कुछ सालों में तेल, मजदूरी, सिंचाई, उर्वरकों और कीटनाशकों की कीमतें बढ़ने की वजह से किसानों की लागत बहुत बढ़ गयी है. ऐसे में किसान की शुद्ध कमाई घटी है. सरकारों को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए और इसे व्यावहारिक तरीके से लागू करना चाहिए. यदि सभी फसलों की ठीक से खरीद हो, तो हो सकता है कि किसान केवल दो-तीन मुख्य फसलों पर निर्भर ना रहे. एक और बात ध्यान रखनी जरूरी है कि यह खाद्य सुरक्षा से जुड़ा मसला भी है और उसे आप तभी हासिल कर सकते हैं जब आप किसानों को संतुष्ट रखेंगे.

(बातचीत पर आधारित)

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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