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आठवें वेतन आयोग में न्यूनतम बेसिक सैलरी 51 हजार तक होने का अनुमान, 2.86 हो सकता है फिटमेंट फैक्टर

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आठवें वेतन आयोग में न्यूनतम बेसिक सैलरी 51 हजार तक होने का अनुमान, 2.86 हो सकता है फिटमेंट फैक्टर
केंद्र सरकार ने आठवें वेतन आयोग को मंजूरी दी

8th Pay Commission : आठवें वेतन आयोग के गठन को मोदी कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें 2016 में लागू हुई थीं और उसके 10 पूरे होने से पहले ही मोदी सरकार ने आठवें वेतन आयोग को मंजूरी दे दी है. आठवां वेतन आयोग किसकी अध्यक्षता में काम करेगा, अभी इसकी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन संभवत: अगले कुछ दिनों में इसके अध्यक्ष और सदस्यों की घोषणा कर दी जाएगी. वेतन आयोग के जरिए सरकार अपने कर्मचारियों के वेतन का मूल्यांकन करती है और उनकी जरूरतों और महंगाई को देखते हुए उसमें आवश्यक बदलाव करती है.सरकार ने अभी 8वें वेतन आयोग के तहत केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन वृद्धि के प्रतिशत पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी है. लेकिन मीडिया रिपोर्ट्‌स के अनुसार कर्मचारियों के वेतन में फिटमेंट फैक्टर 2.57 से 2.86 तक हो सकता है. यदि फिटमेंट फैक्टर 2.86 है, तो  मूल न्यूनतम वेतन 18,000 से बढ़कर 51,480 तक हो जाएगा. आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों का लाभ लगभग 50 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और 68 लाख पेंशनर को होगा.

आठवें वेतन आयोग में कितनी बढ़ सकती है सैलरी?

विभिन्न रिपोर्ट की मानें तो इस बार वेतन आयोग फिटमेंट फैक्टर को 2.57 से 2.86 तक कर सकता है. इसकी गणना इस प्रकार हो सकती है कि अगर किसी व्यक्ति का मूल वेतन यानी बेसिक सैलरी 18 हजार रुपए है और फिटमेंट फैक्टर 2.86 हो तो उसकी बेसिक सैलरी 51, 480 हो जाएगी. अगर फिटमेंट फैक्टर 2.57 हुआ तो उसकी बेसिक सैलरी 46,260 हो जाएगी. यानी केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी में बढ़ा बदलाव होने वाला है. आठवां वेतन आयोग 27 तक अपनी रिपोर्ट सौंप सकता है.

क्या है वेतन आयोग, कब हुआ था पहली बार गठन?

देश में पहला वेतन वेतन आयोग आजादी से पहले यानी जनवरी 1946 में गठित हुआ था. इस वेतन आयोग ने मई 1947 में अपनी रिपोर्ट भारत की अंतरिम सरकार को सौंपी थी.पहले वेतन आयोग के अध्यक्ष श्रीनिवास वरदाचारी थे. इस वेतन आयोग ने उस वक्त सरकारी कर्मचारियों के वेतन की संरचना की जांच की थी और सुधार के लिए अपनी सिफारिशें पेश की थीं. सेना के जवानों के वेतन की जांच करने और उसके अनुसार सिफारिशें पेश करने का काम उस वक्त एक युद्धोत्तर वेतन समिति को सौंपा गया था. 1 जुलाई 1947 से लागू नया वेतन कोड इसी समिति की सिफारिशों पर आधारित था. 

अबतक कितने वेतन आयोग का हो चुका है गठन

वेतनमानवेतन वृद्धि
दूसरा वेतन आयोग14.2 %
तीसरा वेतन आयोग-20.6%
चौथा वेतन आयोग27.6%
पांचवां वेतन आयोग31 %
छठा वेतन आयोग54%
सातवां वेतन आयोग14.3%

आजादी के बाद से अबतक कुल सात वेतन आयोग का गठन हो चुका है, जिनकी सिफारिशों को सरकार ने कमोबेश लागू किया है और अपने कर्मचारियों की वेतन संरचना में आवश्यक बदलाव भी किया है. पहला वेतन आयोग जहां आजादी से पहले गठित हुआ था, वही दूसरा वेतन आयोग आजादी के बाद अगस्त 1957 में गठित हुआ था. इसने अपनी रिपोर्ट दो वर्ष बाद सौंपी थी.इसके अध्यक्ष जगन्नाथ दास थे. तीसरा वेतन आयोग अप्रैल 1970 में गठित हुआ था और इसने अपनी रिपोर्ट 1973 में सौंपी थी.तीसरा वेतन आयोग इसलिए भी बहुत खास माना जाता है कि क्योंकि पहली बार सेना के लिए भी सिफारिशें वेतन आयोग के जरिए दी गईं. तीसरे वेतन आयोग ने सरकार को यह भी सिफारिश दी कि वह जीवन गुजर-बसर करने लायक सैलरी देने के सिद्धांत से बाहर निकले और कर्मचारियों को इतनी सैलरी दे कि वह एक सम्मानित जीवन जी सकें और उनका वेतन उन्हें कार्य करने के लिए प्रेरित करता रहे. इस वेतन आयोग के अध्यक्ष रघुबीर दयाल थे और इनकी सिफारिशों की वजह से सरकार पर 144 करोड़ का खर्चा आया था.

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चौथे वेतन आयोग ने चार साल में सौंपी थी रिपोर्ट

चौथा वेतन आयोग जून 1983 में गठित हुआ था और इसने चार साल बाद अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी थीं. इसकी सिफारिशों के आधार पर सरकार पर 1282 करोड़ रुपए का बोझ आया था. इस वेतन आयोग ने सेना के अधिकारियों के लिए रैंक वेतन की सिफारिश की थी. पांचवें वेतन आयोग का गठन 1994 में किया गया था और 1997 में इसकी सिफारिशों को लागू किया गया था. इस वेतन आयोग ने सरकारी कर्मचारियों के वेतन में 31 प्रतिशत वृद्धि की सिफारिश की थी. पांचवें वेतन आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एस रत्नवेल पांडियन थे. छठा वेतन आयोग जुलाई 2006 में गठित हुआ था और जस्टिस बी एन श्रीकृष्ण इसके अध्यक्ष थे. इस वेतन आयोग ने पे-स्केल में सुधार किया और वेतनमानों की संख्या को कम करके पे-बैंड पर फोकस किया था. सातवें वेतन आयोग का गठन 25 सितंबर 2013 में किया गया था और सिफारिशें 2016 से लागू की गई थीं. वेतन आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एके माथुर थे. इस वेतन आयोग के बाद वेतन में 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. 

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पहले वेतन आयोग का गठन कब हुआ था?

पहले वेतन आयोग का गठन जनवरी 1946 में हुआ था और इसने अपनी रिपोर्ट मई 1947 में सौंपी थी.

सातवां वेतन आयोग कब लागू हुआ था?

सातवां वेतन आयोग 2016 में लागू हुआ था.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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