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Home Technology iPhone vs Android: प्रॉडक्ट और सर्विसेज के रेट्स में इतना अंतर क्यों?

iPhone vs Android: प्रॉडक्ट और सर्विसेज के रेट्स में इतना अंतर क्यों?

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iPhone vs Android: प्रॉडक्ट और सर्विसेज के रेट्स में इतना अंतर क्यों?
Android vs iPhone

iPhone vs Android: एंड्रॉयड फोन और आईफोन के बीच कीमत के अंतर से तो हम सभी वाकिफ हैं. इसके साथ ही, दो तरह के ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलनेवाले डिवाइसेज पर ई-कॉमर्स या ऑनलाइन सर्च किये गए प्रॉडक्ट्स और सर्विसेज की कीमत में भी अंतर देखने को मिलता है. यह अंतर आपने भी कभी न कभी अमेजन, फ्लिपकार्ट, ओला, उबर, जेप्टो, ब्लिंकिट सहित कई ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स पर जरूर महसूस किया होगा. जहां एक ही तरह के प्रॉडक्ट या सर्विस की प्राइस में अंतर होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है?

ऐपल इकोसिस्टम का प्रीमियम प्राइस स्ट्रक्चर

जब हम एक ही ऐप या सेवाओं की तुलना करते हैं, तो अक्सर आईफोन और एंड्रॉयड डिवाइस पर उनकी कीमतों में अंतर दिखाई देता है. यह अंतर मुख्य रूप से ऐपल के इकोसिस्टम के प्रीमियम प्राइस स्ट्रक्चर की वजह से होता है. वहीं, प्रोडक्ट या सेवा आईफोन पर महंगे और एंड्रॉयड पर सस्ते दिख सकते हैं. दरअसल, ई-कॉमर्स या ऑनलाइन सर्च किये गए प्रॉडक्ट्स और सर्विसेज में एंड्रॉयड फोन और आईफोन के बीच अंतर होने की कई वजहें हैं.

ऐप सब्सक्रिप्शन मायने रखता है

कुछ प्रमुख सेवाएं जैसे YouTube Premium, Google One और सोशल मीडिया सब्सक्रिप्शन, एंड्रॉयड पर आईफोन के मुकाबले सस्ते होते हैं. इसका कारण यह है कि गूगल एंड्रॉयड प्लैटफॉर्म के साथ गहरे तरीके से जुड़ा हुआ है और इसलिए ये सेवाएं एंड्रॉयड पर कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं.

इन-ऐप पर्चेज पर नजर

कुछ गेम्स और ऐप्स में आईफोन और एंड्रॉयड के लिए मूल्य निर्धारण के अलग-अलग स्तर होते हैं. आईफोन की तुलना में एंड्रॉयड पर इन-ऐप खरीदारी अक्सर सस्ती होती है. इससे यूजर्स को यह एहसास होता है कि आईफोन के मुकाबले एंड्रॉयड पर सुविधाएं अधिक किफायती हैं.

खर्च करने की क्षमता का आकलन

कुछ ऑनलाइन प्लैटफॉर्म डिवाइस के आधार पर कीमतों में अंतर कर सकते हैं. आमतौर पर माना जाता है कि आईफोन यूजर्स की खर्च करने की क्षमता अधिक होती है, और इसलिए कीमतों को इस आधार पर तय किया जा सकता है.

ऐपल का प्रीमियम प्राइसिंग मॉडल

ऐपल अपने प्रॉडक्ट्स के लिए प्रीमियम प्राइसिंग स्ट्रैटेजी अपनाता है. इसका मतलब है कि आईफोन यूजर्स से अधिक कीमत ली जाती है, क्योंकि कंपनी आईफोन को एक प्रीमियम ब्रांड के रूप में प्रस्तुत करती है. इसी तरह, ऐप्स और सब्सक्रिप्शन सेवाएं भी आईफोन पर महंगी हो सकती हैं, क्योंकि वे ऐपल के इकोसिस्टम का हिस्सा होते हैं.

गूगल और एंड्रॉयड की कीमतों में फ्लेक्सिबिलिटी

एंड्रॉयड के लिए गूगल का ऐप स्टोर (Google Play Store) अधिक लचीला और खुला है. गूगल अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों को बढ़ावा देता है और इसमें सब्सक्रिप्शन और इन-ऐप खरीदारी पर कम कमीशन लिया जाता है. इस वजह से, एंड्रॉयड ऐप्स और सेवाएं आमतौर पर सस्ती होती हैं.

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अलग-अलग फीस और कमीशन स्ट्रक्चर

ऐपल की ऐप स्टोर पॉलिसी के अनुसार, एप्लिकेशन डेवलपर्स को ऐपल को 15-30% कमीशन देना होता है. इस वजह से आईफोन पर ऐप्स और सेवाओं के लिए कीमतें अधिक हो सकती हैं, क्योंकि डेवलपर्स को इस कमीशन को कवर करने के लिए कीमतों को बढ़ाना पड़ता है.

अलग-अलग कस्टमर प्रोफाइल

आईफोन यूजर्स आमतौर पर अधिक खर्च करने वाले माने जाते हैं और इसलिए ऑनलाइन प्लैटफॉर्म और ऐप्स आईफोन पर हाई प्राइसिंग का सामना कर सकते हैं. दूसरी तरफ, एंड्रॉयड का यूजरबेस ज्यादा डाइवर्स है, जिसमें अधिक प्रतिस्पर्द्धी कीमतों को प्राथमिकता देने वाले कस्टमर्स शामिल होते हैं.

इंटिग्रेटेड इकोसिस्टम और सर्विसेज

ऐपल एक पूरी तरह से इंटीग्रेटेड इकोसिस्टम ऑफर करता है, जिसमें ऐप्स, सर्विसेज और हार्डवेयर सभी एक साथ काम करते हैं. इसकी वजह से एप्लिकेशन और सर्विसेज आमतौर पर आईफोन पर अधिक महंगी होती हैं, क्योंकि वे एक स्पेशल एक्सपीरिएंस और हाई क्वॉलिटी ऑफर करते हैं.

कीमतों में अंतर की वजह

आईफोन और एंड्रॉयड डिवाइस के बीच कीमतों का अंतर मुख्य रूप से ऐपल के प्रीमियम ब्रांड, गूगल की प्राइस स्ट्रैटेजी और कस्टमर के खर्च करने की क्षमता पर आधारित होता है. यही वजह है कि आईफोन पर कुछ प्रॉडक्ट्स महंगे और एंड्रॉयड पर सस्ते होते हैं.

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राजीव कुमार हिंदी डिजिटल मीडिया के अनुभवी पत्रकार हैं और वर्तमान में प्रभातखबर.कॉम में सीनियर कंटेंट राइटर के तौर पर कार्यरत हैं. 15 वर्षों से अधिक के पत्रकारिता अनुभव के दौरान उन्होंने टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल सेक्टर की हजारों खबरों, एक्सप्लेनर, एनालिसिस और फीचर स्टोरीज पर काम किया है. सरल भाषा, गहरी रिसर्च और यूजर-फर्स्ट अप्रोच उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी पहचान है. राजीव की विशेषज्ञता स्मार्टफोन, गैजेट्स, एआई, मशीन लर्निंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), साइबर सिक्योरिटी, टेलीकॉम, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, ICE और हाइब्रिड कारों, ऑटोनोमस ड्राइविंग तथा डिजिटल ट्रेंड्स जैसे विषयों में रही है. वे लगातार बदलती टेक और ऑटो इंडस्ट्री पर नजर रखते हैं और रिपोर्ट्स, आधिकारिक डेटा, कंपनी अपडेट्स तथा एक्सपर्ट इनसाइट्स के आधार पर सटीक और भरोसेमंद जानकारी पाठकों तक पहुंचाते हैं. डिजिटल मीडिया में राजीव की खास पहचान SEO-ऑप्टिमाइज्ड और डेटा-ड्रिवेन कंटेंट के लिए भी रही है. गूगल डिस्कवर और यूजर एंगेजमेंट को ध्यान में रखते हुए वे ऐसे आर्टिकल्स तैयार करते हैं, जो न केवल जानकारीपूर्ण होते हैं, बल्कि पाठकों की जरूरत और सर्च ट्रेंड्स से भी मेल खाते हैं. टेक और ऑटो सेक्टर पर उनके रिव्यू, एक्सपर्ट इंटरव्यू, तुलना आधारित लेख और एक्सप्लेनर स्टोरीज को पाठकों द्वारा काफी पसंद किया जाता है. राजीव ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2011 में प्रभात खबर दैनिक से की थी. शुरुआती दौर में उन्होंने देश-विदेश, कारोबार, संपादकीय, साहित्य, मनोरंजन और फीचर लेखन जैसे विभिन्न बीट्स पर काम किया. इसके बाद डिजिटल प्लैटफॉर्म पर उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग, वैल्यू-ऐडेड स्टोरीज और ट्रेंड आधारित कंटेंट के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई. जमशेदपुर में जन्मे राजीव ने प्रारंभिक शिक्षा सीबीएसई स्कूल से प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने रांची यूनिवर्सिटी से बॉटनी ऑनर्स और भारतीय विद्या भवन, पुणे से हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिप्लोमा किया. पत्रकारिता के मूल सिद्धांत 5Ws+1H पर उनकी मजबूत पकड़ उन्हें खबरों की गहराई समझने और उन्हें आसान, स्पष्ट और प्रभावी भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में मदद करती है. राजीव की सबसे बड़ी पहचान है, क्रेडिब्लिटी, क्लैरिटी और ऑडियंस-फर्स्ट अप्रोच. वे सिर्फ टेक ऐंड ऑटो को कवर नहीं करते, बल्कि उसे ऐसे पेश करते हैं कि हर व्यक्ति उसे समझ सके, उससे जुड़ सके और उससे फायदा उठा सके. जुड़िए rajeev.kumar@prabhatkhabar.in पर
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