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Home Technology First AI School: AI स्कूल होने के बावजूद बच्चों को Chatbot पर निर्भर क्यों नहीं होने देता यह स्कूल?

First AI School: AI स्कूल होने के बावजूद बच्चों को Chatbot पर निर्भर क्यों नहीं होने देता यह स्कूल?

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First AI School: AI स्कूल होने के बावजूद बच्चों को Chatbot पर निर्भर क्यों नहीं होने देता यह स्कूल?
हार्मनी एलिमेंट्री स्कूल, जॉर्जिया में अमेरिका का पहला AI स्कूल // फोटो न्यू यॉर्क टाइम्स से साभार

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तेजी से दुनिया बदल रहा है. स्कूलों से लेकर दफ्तरों तक AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है. ऐसे समय में अमेरिका के जॉर्जिया राज्य का एक स्कूल चर्चा में है, जिसे अक्सर देश का पहला AI-केंद्रित स्कूल कहा जाता है. दिलचस्प बात यह है कि यहां अत्याधुनिक लैब, रोबोटिक्स और तकनीक मौजूद होने के बावजूद सबसे ज्यादा महत्व बच्चों की अपनी सोच, रचनात्मकता और शिक्षकों के मार्गदर्शन को दिया जा रहा है. यही वजह है कि यह स्कूल तकनीक और मानवीय शिक्षा के बीच संतुलन का एक अनोखा उदाहरण बन गया है.

AI स्कूल, लेकिन पढ़ाई का तरीका अलग

न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, जॉर्जिया स्थित हार्मनी एलीमेंट्री स्कूल में छोटे बच्चे रंग-बिरंगे ब्लॉक्स से घर बनाते हुए ‘यूजर एक्सपीरियंस’ और ‘AI एप्लिकेशन’ जैसे आधुनिक विषयों की शुरुआती समझ विकसित करते हैं. हालांकि यहां बच्चों पर तकनीकी शब्दों का बोझ नहीं डाला जाता. उन्हें खेल-खेल में समस्याओं को समझना, समाधान ढूंढना और टीम के साथ काम करना सिखाया जाता है.

स्कूल का मानना है कि AI सिर्फ एक उपकरण है. असली शिक्षा तब होती है जब बच्चे खुद सोचते हैं, सवाल पूछते हैं और अपने अनुभवों से सीखते हैं. इसलिए यहां तकनीक का इस्तेमाल सीमित और उद्देश्यपूर्ण तरीके से किया जाता है.

रोबोट नहीं, शिक्षक हैं सबसे बड़ी ताकत

भविष्य की कल्पनाओं में अक्सर ऐसे स्कूल दिखाए जाते हैं जहां रोबोट पढ़ाते हैं और बच्चे चैटबॉट से सीखते हैं. लेकिन इस स्कूल की हकीकत इससे काफी अलग है. यहां शिक्षकों की भूमिका पहले से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है.

स्कूल के कई छात्रों और पूर्व छात्रों का कहना है कि ‘AI स्कूल’ नाम सुनकर जितना हाई-टेक माहौल लगता है, वास्तविकता उससे अलग है. रोबोटिक्स जैसी कुछ विशेष कक्षाओं को छोड़ दें तो अधिकांश पढ़ाई पारंपरिक तरीके से ही कराई जाती है. भाषा और इतिहास जैसे विषयों में बच्चों को हाथ से निबंध लिखने के लिए प्रेरित किया जाता है ताकि वे AI पर निर्भर न हों.

AI से ज्यादा जरूरी है खुद का दिमाग

स्कूल के मैकेनिकल इंजीनियरिंग कक्ष में एक छात्र कार्डबोर्ड से खेल बनाने में व्यस्त था. जब उससे पूछा गया कि क्या उसने किसी AI टूल या चैटबॉट की मदद ली है, तो उसका जवाब था- नहीं, मैं सिर्फ अपना दिमाग इस्तेमाल कर रहा हूं.

यही सोच इस संस्थान की शिक्षा पद्धति की पहचान बन चुकी है. यहां बच्चों को पहले खुद समाधान खोजने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. AI को केवल सहायक साधन के रूप में देखा जाता है, न कि अंतिम उत्तर देने वाली मशीन के रूप में.

एक्सपर्ट्स ने भी जताई चिंता

AI आधारित शिक्षा को लेकर कई विशेषज्ञ चिंता जता चुके हैं. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा सैकड़ों शोध पत्रों के विश्लेषण में यह चेतावनी दी गई कि AI टूल्स काम को आसान और तेज जरूर बनाते हैं, लेकिन लंबे समय में बच्चों की स्वतंत्र सोच प्रभावित हो सकती है.

वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को कॉग्निटिव सरेंडर नाम दिया है. इसका अर्थ है कि लोग धीरे-धीरे अपने निर्णय लेने की क्षमता मशीनों पर छोड़ने लगते हैं. ऐसे में शिक्षा संस्थानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती तकनीक और मानवीय कौशल के बीच सही संतुलन बनाए रखना है.

भविष्य की शिक्षा का नया मॉडल?

हार्मनी स्कूल का मानना है कि आने वाले समय में केवल कोडिंग या तकनीकी ज्ञान ही सफलता की गारंटी नहीं होगा. नैतिक सोच, रचनात्मकता, सहयोग की भावना और समस्याओं को समझने की क्षमता जैसी खूबियां हमेशा महत्वपूर्ण रहेंगी.

इसी कारण स्कूल में AI को शिक्षा का केंद्र नहीं बल्कि एक सहायक माध्यम माना गया है. बच्चों को आपसी चर्चा, समूह गतिविधियों और वास्तविक अनुभवों के जरिए सीखने के अवसर दिए जाते हैं ताकि उनकी मौलिक सोच और जिज्ञासा बनी रहे. यही मॉडल भविष्य की शिक्षा के लिए एक नई दिशा दिखा सकता है.

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राजीव कुमार हिंदी डिजिटल मीडिया के अनुभवी पत्रकार हैं और वर्तमान में प्रभातखबर.कॉम में सीनियर कंटेंट राइटर के तौर पर कार्यरत हैं. 15 वर्षों से अधिक के पत्रकारिता अनुभव के दौरान उन्होंने टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल सेक्टर की हजारों खबरों, एक्सप्लेनर, एनालिसिस और फीचर स्टोरीज पर काम किया है. सरल भाषा, गहरी रिसर्च और यूजर-फर्स्ट अप्रोच उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी पहचान है. राजीव की विशेषज्ञता स्मार्टफोन, गैजेट्स, एआई, मशीन लर्निंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), साइबर सिक्योरिटी, टेलीकॉम, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, ICE और हाइब्रिड कारों, ऑटोनोमस ड्राइविंग तथा डिजिटल ट्रेंड्स जैसे विषयों में रही है. वे लगातार बदलती टेक और ऑटो इंडस्ट्री पर नजर रखते हैं और रिपोर्ट्स, आधिकारिक डेटा, कंपनी अपडेट्स तथा एक्सपर्ट इनसाइट्स के आधार पर सटीक और भरोसेमंद जानकारी पाठकों तक पहुंचाते हैं. डिजिटल मीडिया में राजीव की खास पहचान SEO-ऑप्टिमाइज्ड और डेटा-ड्रिवेन कंटेंट के लिए भी रही है. गूगल डिस्कवर और यूजर एंगेजमेंट को ध्यान में रखते हुए वे ऐसे आर्टिकल्स तैयार करते हैं, जो न केवल जानकारीपूर्ण होते हैं, बल्कि पाठकों की जरूरत और सर्च ट्रेंड्स से भी मेल खाते हैं. टेक और ऑटो सेक्टर पर उनके रिव्यू, एक्सपर्ट इंटरव्यू, तुलना आधारित लेख और एक्सप्लेनर स्टोरीज को पाठकों द्वारा काफी पसंद किया जाता है. राजीव ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2011 में प्रभात खबर दैनिक से की थी. शुरुआती दौर में उन्होंने देश-विदेश, कारोबार, संपादकीय, साहित्य, मनोरंजन और फीचर लेखन जैसे विभिन्न बीट्स पर काम किया. इसके बाद डिजिटल प्लैटफॉर्म पर उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग, वैल्यू-ऐडेड स्टोरीज और ट्रेंड आधारित कंटेंट के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई. जमशेदपुर में जन्मे राजीव ने प्रारंभिक शिक्षा सीबीएसई स्कूल से प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने रांची यूनिवर्सिटी से बॉटनी ऑनर्स और भारतीय विद्या भवन, पुणे से हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिप्लोमा किया. पत्रकारिता के मूल सिद्धांत 5Ws+1H पर उनकी मजबूत पकड़ उन्हें खबरों की गहराई समझने और उन्हें आसान, स्पष्ट और प्रभावी भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में मदद करती है. राजीव की सबसे बड़ी पहचान है, क्रेडिब्लिटी, क्लैरिटी और ऑडियंस-फर्स्ट अप्रोच. वे सिर्फ टेक ऐंड ऑटो को कवर नहीं करते, बल्कि उसे ऐसे पेश करते हैं कि हर व्यक्ति उसे समझ सके, उससे जुड़ सके और उससे फायदा उठा सके. जुड़िए rajeev.kumar@prabhatkhabar.in पर
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