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Home पश्चिम-बंगाल कोलकाता काकोली घोष दस्तीदार ने बगावत के लिए 8 जून को ही क्यों चुना? ये हैं 3 बड़े कारण

काकोली घोष दस्तीदार ने बगावत के लिए 8 जून को ही क्यों चुना? ये हैं 3 बड़े कारण

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काकोली घोष दस्तीदार ने बगावत के लिए 8 जून को ही क्यों चुना? ये हैं 3 बड़े कारण
इंडिया ब्लॉक की मीटिंग से पहले सोनिया गांधी से गले मिलीं ममता बनर्जी, काकोली घोष दस्तीदार ने 20 सांसदों के साथ एनडीए को समर्थन का कर दिया ऐलान.

Revolt Against Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की शिकस्त के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में मचे राष्ट्रीय घमासान ने बंगाल को हिलाकर रख दिया है. लोकसभा में टीएमसी की ‘मुख्य सचेतक’ काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 20 सांसदों ने एनडीए (NDA) को समर्थन का ऐलान कर दिया है. इस विस्फोटक पत्र ने ममता बनर्जी के पैरों तले की जमीन खिसका दी है.

ममता की साख खत्म करने का अचूक ‘टाइम बम’

इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक गलियारों और रणनीतिकारों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि बागी गुट और काकोली ने इस महा-विद्रोह के लिए ‘8 जून’ को क्यों चुना. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें, तो इस तारीख के पीछे एक बेहद सोची-समझी टाइमिंग और 3 बड़े रणनीतिक कारण हैं. 8 जून की यह तारीख ममता बनर्जी की राष्ट्रीय और प्रांतीय साख को एक साथ ध्वस्त करने का अचूक ‘टाइम बम’ है.

कारण 1: राष्ट्रीय मंच पर ममता को किया बेअसर

8 जून की तारीख चुनने के पीछे सबसे पहला और सबसे घातक कारण विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA Bloc) की दिल्ली में होने वाली महा-बैठक थी. ममता बनर्जी सोमवार (8 जून) को दिल्ली में ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक में शामिल होकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत दावेदारी की तैयारी में थीं. काकोली घोष और बागी गुट को पता था कि अगर 8 जून से पहले या ठीक उसी दिन यह धमाका हुआ, तो ममता बनर्जी दिल्ली की बैठक में पूरी तरह कमजोर हो जायेंगी. ठीक वैसा ही हुआ भी. पार्टी के 20 सांसदों के हाथ से निकल जाने के बाद ममता बनर्जी विपक्षी गठबंधन के सामने राष्ट्रीय नेता के रूप में कोई भी शर्त रखने की स्थिति में नहीं रहीं.

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कारण 2: अभिषेक बनर्जी के पंख कतरने का साइड-इफेक्ट

दूसरा बड़ा कारण तृणमूल कांग्रेस के भीतर पिछले कुछ दिनों से चल रहा बुआ-भतीजे का आंतरिक सांगठनिक शीतयुद्ध है. 5 जून को कालीघाट में हुई नेशनल वर्किंग कमेटी (NWC) की बैठक में ममता बनर्जी ने अपने भतीजे और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली से नाराज चल रहे नेताओं को शांत करने के लिए डोला सेन और डेरेक ओब्रायन को संयुक्त राष्ट्रीय सचिव नियुक्त कर अभिषेक के पंख कतर दिये.

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शीर्ष नेतृत्व कमजोर हुआ, तो बागियों ने चली निर्णायक चाल

बारासात से सांसद काकोली घोष दस्तीदार पहले ही पार्टी के सभी सांगठनिक पदों से इस्तीफा दे चुकी थीं. कल्याण बनर्जी जैसे नेताओं के व्यवहार से बेहद असंतुष्ट थीं. पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के एकाधिकार को कम करने के ममता बनर्जी के इस आखिरी दांव के तुरंत बाद बागियों ने समझ लिया कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अंदर से डरा हुआ और कमजोर है. इसी कमजोरी का फायदा उठाकर उन्होंने 8 जून को अपनी निर्णायक चाल चल दी.

कारण 3: दलबदल कानून और 19 के आंकड़े की डेडलाइन

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण पूरी तरह से कानूनी और तकनीकी सुरक्षा से जुड़ा था. संसद के मानसून सत्र में अभी समय बाकी है, लेकिन बागी सांसदों को एकजुट करने और उनसे हस्ताक्षर कराने की प्रक्रिया पिछले कई दिनों से गुप्त तरीके से चल रही थी. सूत्रों के अनुसार, 7 जून की रात तक बागी गुट आवश्यक दो-तिहाई यानी 19 के आंकड़े को पार कर 20वें सांसद (काकोली घोष समेत) का समर्थन हासिल करने में कामयाब हो गया था.

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Revolt Against Mamata Banerjee: रणनीति के लीक होने का था भारी डर

राजनीति में इस तरह के गुप्त ऑपरेशनों को ज्यादा दिनों तक छुपाकर नहीं रखा जा सकता था. अगर बागी गुट 8 जून की डेडलाइन को आगे बढ़ाता, तो कालीघाट (ममता बनर्जी का आवास) को इसकी भनक लग जाती और सांसदों को डरा-धमकाकर या मनाकर बगावत को समय से पहले ही कुचल दिया जाता. इसलिए जैसे ही 20 सांसदों का संख्या बल पूरा हुआ, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर इसे सार्वजनिक कर दिया गया, ताकि नेतृत्व को संभलने का कोई मौका न मिले.

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