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मिड-डे मील : खर्च नहीं हो पायी आवंटित बजट की रािश

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मिड-डे मील : खर्च नहीं हो पायी आवंटित बजट की रािश

कोलकाता.

राज्य में मिड-डे मील योजना के बारे में हैरान करने वाले आंकड़े आये हैं. विधानसभा में हाल ही में पेश अंतरिम बजट के दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि मिड-डे मील योजना के लिए आवंटित बजट में से बहुत कम राशि खर्च की गयी. बजट दस्तावेज के अनुसार, पिछले दो वित्तीय वर्षों 2024-25 और 2023-24 के लिए स्थिति दयनीय थी. वित्तीय वर्ष 2024-25 में मिड-डे मील के लिए बजटीय आवंटन 2,299.30 करोड़ रुपये था. लेकिन उस वर्ष वास्तविक खर्च सिर्फ 241.96 करोड़ रुपये रहा, जो कुल आवंटन का मात्र 10.52 प्रतिशत है. उससे पहले, वित्तीय वर्ष 2023-24 में मिड-डे मील के लिए 2,377 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया था, लेकिन वास्तविक उपयोग सिर्फ 515.04 करोड़ रुपये रहा, यानी 21.66 प्रतिशत. वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्य में मिड-डे मील के लिए 1,673.12 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है. हालांकि, 2025-26 के संशोधित अनुमानों के अनुसार 31 मार्च 2026 तक सिर्फ 320.01 करोड़ रुपये (सिर्फ 19.12 प्रतिशत) ही खर्च किये जा सकेंगे.

इसका मतलब है कि तीनों वित्तीय वर्षों को मिला कर राज्य में मिड-डे मील के बजटीय आवंटन का औसत प्रतिशत उपयोग सिर्फ 16.96 फीसदी है. माना जा रहा है कि पिछले कम प्रतिशत उपयोग को ध्यान में रखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने 2026-27 के वित्तीय वर्ष के लिए इस योजना के लिए बजटीय आवंटन को घटा कर 1,150.90 करोड़ रुपये कर दिया है, जो 2023-24, 2024-25 और 2025-26 के संबंधित आंकड़ों से काफी कम है.

क्या कहना है राज्य वित्त विभाग के अधिकारी का

राज्य वित्त विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि 2025-27 के लिए मिड-डे मील के लिए 1,150.90 करोड़ रुपये का यह बजटीय आवंटन अंतिम आंकड़ा नहीं हो सकता है और इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद नयी राज्य कैबिनेट की ओर से पूर्ण बजट पेश करने के बाद इसमें संशोधन किया जा सकता है.

केंद्र सरकार ने राज्य से मांगी थी रिपोर्ट

पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील के लिए कम खर्च की यह जानकारी उस समय आयी है, जब पिछले साल जून में केंद्र सरकार ने मिड-डे मील योजनाओं का लाभ उठाने वाले छात्रों की संख्या में भारी गिरावट पर चिंता व्यक्त की थी. केंद्र सरकार के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग ने भी इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार से रिपोर्ट मांगी थी, जिसमें इसे राज्य में स्कूल छोड़ने वालों की बढ़ती संख्या का मुख्य कारण बताया गया था.

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