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डब्ल्यूबीसीएस सेवाओं में लिये गये फैसले पर उठे सवाल

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डब्ल्यूबीसीएस सेवाओं में लिये गये फैसले पर उठे सवाल

कोलकाता.

भाजपा के आइटी सेल के प्रभारी व पश्चिम बंगाल के पार्टी के सह-प्रभारी अमित मालवीय ने गुरुवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक बयान जारी कर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा डब्ल्यूबीसीएस सेवाओं में अतिरिक्त पदों के सृजन और कैडर शेड्यूल में संशोधन के फैसले पर कड़ा सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि इन कदमों को ऐतिहासिक सुधार के रूप में पेश करना वास्तव में अधिकारियों को गुमराह करने की कोशिश है.

मालवीय ने आरोप लगाया कि सरकार छोटे-छोटे प्रशासनिक बदलावों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है, जबकि वर्षों से लंबित मूल समस्याओं को नजरअंदाज किया जा रहा है. उनके अनुसार, वित्तीय वंचना, लंबे समय से चली आ रही पदोन्नति में देरी और प्रशासनिक असुरक्षा जैसे मुद्दों का समाधान किए बिना ऐसे ऐलान केवल दिखावटी साबित होंगे.

उन्होंने कहा कि महंगाई भत्ते (डीए) का भुगतान न होने से डब्ल्यूबीसीएस अधिकारियों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है. एंट्री-लेवल के एक डब्ल्यूबीसीएस अधिकारी को हर साल लगभग 2.82 लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है, जबकि स्पेशल सेक्रेटरी स्तर के अधिकारी को सालाना करीब 8.88 लाख रुपये की हानि हो रही है. जब तक इस बुनियादी अन्याय को दूर नहीं किया जाता, तब तक सेवा सुधार की बात करना खोखला है.

अमित मालवीय ने आइएएस में पदोन्नति को लेकर भी गंभीर सवाल उठाये. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, राजस्थान, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में राज्य सेवा अधिकारियों को 15 से 17 वर्षों में आइएएस में पदोन्नति मिल जाती है, जबकि पश्चिम बंगाल में डब्ल्यूबीसीएस अधिकारियों को 26 से 27 वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है.

उन्होंने आगे कहा कि हाल के वर्षों में यह प्रतीक्षा अवधि और बढ़कर 30 से 32 वर्षों तक पहुंच गयी है. उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि 1992-93 बैच के अधिकारियों को 2025 में आइएएस में पदोन्नति मिली, जिनमें से कुछ अधिकारी पदोन्नति के कुछ ही महीनों बाद सेवानिवृत्त हो गये, जिससे उन्हें वास्तविक कैरियर और वित्तीय लाभ नहीं मिल सका.

भाजपा नेता ने कैडर शेड्यूल में संशोधन के दावों को जमीनी हकीकत से परे बताया

अमित मालवीय के अनुसार, 56 वर्ष की आयु पार करने के कारण बड़ी संख्या में अधिकारी आइएएस पदोन्नति के लिए अयोग्य हो जाते हैं. इसके चलते कई बैचों के लगभग आधे अधिकारी पदोन्नति से वंचित रह जाते हैं और उन्हें सेवानिवृत्ति के समय भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है, जो वर्षों से लंबित डीए की समस्या से और बढ़ जाता है. उन्होंने कैडर शेड्यूल में संशोधन के दावों को भी जमीनी हकीकत से परे बताया. मालवीय ने कहा कि सेवाओं के बीच कोई समान कैडर संरचना नहीं है. डिप्टी सेक्रेटरी बीडीओ के रूप में और जॉइंट सेक्रेटरी समान रैंक वाले जिलाधिकारियों के अधीन एडीएम के रूप में काम कर रहे हैं, जो संरचनात्मक विरोधाभास को दर्शाता है.

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