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मंडप के लिए बांस की कमाची के बने रेडीमेड ढांचों की बिक्री

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मंडप के लिए बांस की कमाची के बने रेडीमेड ढांचों की बिक्री

दुर्गापुर.

वसंत पंचमी को मां सरस्वती की पूजा धूमधाम से पूरे शिल्पांचल में होगी. पूजा को लेकर शिल्पांचल के लोगों में काफी उत्साह देखा जा रहा है. शुक्रवार 23 तारीख को वसंत पंचमी का त्योहार मनाया जायेगा. उसके ठीक पहले अंचल के विभिन्न इलाकों में जोर-शोर से सरस्वती पूजा की तैयारी चल रही है. बाजारों में भीड़ देखी जा रही है. वहीं, पंडालों का निर्माण भी किया जा रहा है. बांस की कमाची का मतलब होता है बांस से बनी पतली छड़ी या डंडी, जिसका इस्तेमाल आम तौर पर सहारे, पकड़, इशारा करने या हल्के कामों के लिए किया जाता है.

कारीगर बना रहे पंडाल

पूजा को लेकर बांस की कमाची (यानी बांस से बनी पतली छड़ी या डंडी, जिसका प्रयोग अमूमन सहारे, पकड़, संकेत करने या हल्के कामों में होता है.) से बने पंडालों की काफी मांग देखी जा रही है. यह चलन पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता और कलात्मक रचनात्मकता का एक अनूठा मिश्रण है. शहर के प्रांतिका सहित विभिन्न इलाके में कारीगर इसे बनाने में जुटे हुए हैं. छोटे आकार से लेकर बड़े आकार तक के पंडाल बिक रहे हैं. जो लोगो द्वारा काफी पसंद किए जा रहे हैं.

जटिल व भव्य संरचनाएं भी बनाना संभव

दुकानदारों ने बताया कि बांस के कमाची से बने पंडाल पर्यावरण के अनुकूल है.बांस एक टिकाऊ और बायोडिग्रेडेबल सामग्री है. थर्माकोल और प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग को कम करने के लिए, आयोजक अब बांस की ओर लौट रहे हैं. उन्होंने बताया कि बांस की कमाची का उपयोग करके केवल साधारण पंडाल ही नहीं, बल्कि जटिल और भव्य संरचनाएं भी बनाई जा सकती हैं यह पारंपरिक शिल्प कौशल कोआधुनिकता के साथ जोड़ता है.बांस न केवल मजबूत है, बल्कि यह पारंपरिक धातुओं के फर्नीचर और अन्य निर्माण सामग्री की तुलना में अधिक किफायती और बहुमुखी है. सही से रखने पर इसका पुनः उपयोग किया जा सकता है.

छोटे बजट के आयोजन में अच्छी मांग

बाजार में इन दिनों 500 रुपये से लेकर 5000 रुपये तक के पंडाल बिक रहे हैं. दुकानदारों की मानें, तो इससे किसी भी संरचना को बनाया जा सकता है. हालांकि बड़े बजट के पूजा आयोजक पारंपरिक बांस कपड़े और बॉटम का उपयोग कर पंडाल का निर्माण कर रहे हैं, गली मोहल्ले में होने वाले छोटे बजट के पूजा आयोजन में इसकी मांग है.

बचता है समय

पंडाल खरीदने आये ग्राहकों ने बताया कि एक तो बांस के कमाची से बने पर्यावरण के अनुकूल होते हैं. दूसरा यह समय बचाऊ होता है.जो आज के भागदौड़ की जिंदगी के लिए काफी मायने रखता है.रेडीमेड होने के कारण इसे बनाने के लिए कोई समय नहीं खर्च करना पड़ता है. बाजार से केवल पूजा स्थल पर लाकर सजावट कर दिया जाता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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