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Home Rajya उत्तर प्रदेश काँधे नन्हे, बोझ भारी – ये कैसी मज़बूरी हमारी?

काँधे नन्हे, बोझ भारी – ये कैसी मज़बूरी हमारी?

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काँधे नन्हे, बोझ भारी – ये कैसी मज़बूरी हमारी?

Child Labour Day: 12 जून, यानी वह दिन जब हम एक पल को रुककर उन नन्हें हाथों को याद करते हैं, जो खिलौनों की जगह औज़ार उठा रहे हैं. स्कूल की घंटियों की जगह जिनके कानों में मशीनों की आवाज़ गूंजती है. यह दिन बाल श्रम के खिलाफ आवाज़ उठाने और बच्चों को उनका खोया बचपन लौटाने का संकल्प लेने का दिन है.

आंकड़े चौंकाने वाले हैं, लेकिन सच्चाई इससे भी डरावनी

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 16 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी कर रहे हैं। इनमें से लाखों भारत में हैं. NCRB और UNICEF की रिपोर्टों के मुताबिक, भारत में आज भी लगभग 1 करोड़ से अधिक बच्चे विभिन्न प्रकार के कार्यों में लगे हैं चाहे वो खेतों में काम हो, चाय की दुकानों में झूठे बर्तन धोना हो, या फैक्ट्रियों में खतरनाक मशीनों के बीच जिंदगी खपाना.

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कानून तो है, लेकिन क्या पालन हो रहा है?

भारत में बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986 के तहत 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराना अवैध है. फिर भी, कई जगहों पर यह कानून सिर्फ किताबों तक सीमित है. ज़मीनी सच्चाई यह है कि आर्थिक मजबूरी, सामाजिक असमानता और जागरूकता की कमी के कारण लाखों बच्चे अब भी बचपन खो रहे हैं.

गरीब की मजबूरी, लेकिन क्या इसका हल नहीं है?

कई परिवारों के लिए बच्चों का काम करना जीविका का साधन बन गया है. “अगर मेरा बेटा न कमाए, तो चूल्हा कैसे जलेगा?” ये सवाल लाखों गरीब माताओं के मन में गूंजता है. लेकिन सवाल ये भी है क्या हम इस चक्रव्यूह को तोड़ नहीं सकते?

सरकार की कई योजनाएं जैसे “मिड डे मील”, “समग्र शिक्षा अभियान”, “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ”, और NGOs जैसे बचपन बचाओ आंदोलन इस दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन सफलता तभी संभव है जब समाज भी साथ चले.

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एक बच्चा स्कूल जाता है, तो समाज का भविष्य बनता है

बच्चों को अगर शिक्षा, पोषण और प्यार मिले, तो वही हाथ जो आज ईंटें ढो रहे हैं, कल डॉक्टर, वैज्ञानिक, कलाकार या नेता बन सकते हैं. एक शिक्षित पीढ़ी ही भारत को आत्मनिर्भर और सशक्त बना सकती है.

आप क्या कर सकते हैं?

1-: अगर आप किसी बच्चे को काम करते देखें, तो चाइल्डलाइन 1098 पर कॉल करें.

2-: आस-पास के गरीब बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करें.

3-: पुराने खिलौने, किताबें और कपड़े ज़रूरतमंद बच्चों को दें.

4-: हर प्लेटफॉर्म पर बाल श्रम के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाएं.

5-: अंतिम संदेश: बचपन दोबारा नहीं आता… उसे बचाइए!

बाल मजदूरी केवल कानून का मुद्दा नहीं, यह नैतिकता की भी परीक्षा है.
किसी बच्चे से उसकी मुस्कान मत छीनिए, उसका कल मत छीनिए.
उसे स्कूल भेजिए, सपनों के पंख दीजिए.

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