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Home Rajya उत्तर प्रदेश ताजमहल से राममंदिर तक एक ही पत्थर की चमक का सफर, जानिए ऐसे अजूबे पत्थर के बारे में!

ताजमहल से राममंदिर तक एक ही पत्थर की चमक का सफर, जानिए ऐसे अजूबे पत्थर के बारे में!

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ताजमहल से राममंदिर तक एक ही पत्थर की चमक का सफर, जानिए ऐसे अजूबे पत्थर के बारे में!

Ayodhya Ram Mandir Marble: अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि परिसर के सात पूरक मंदिरों में विराजमान देवी-देवताओं की प्रतिमाएं अब श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई हैं. इन प्रतिमाओं को प्रसिद्ध सफेद मकराना संगमरमर से तराशा गया है. प्रतिमाओं का निर्माण श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के निर्देशन में हुआ है, जो कि भव्यता और आध्यात्मिकता का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है.

प्रतिमाओं का निर्माण: समर्पण और परिश्रम का परिणाम

इन प्रतिमाओं का निर्माण कार्य जयपुर के प्रसिद्ध मूर्तिकार सत्यनारायण पांडेय, उनके भाई पुष्पेंद्र पांडेय, और पुत्र प्रशांत पांडेय के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ. इन कलाकारों के साथ मिलकर लगभग 25 कारीगरों की टीम ने लगभग दस महीनों तक अथक परिश्रम किया. शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग को छोड़कर, परिसर की सभी प्रतिमाएं इसी टीम द्वारा बनाई गई हैं. उनका कहना है कि उन्हें रामकाज में योगदान देने का जो सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वह उनके जीवन का सबसे गौरवपूर्ण और अविस्मरणीय क्षण है.

मकराना संगमरमर की दिव्यता से सजी मूर्तियां

सभी प्रतिमाएं शुद्ध मकराना संगमरमर से निर्मित हैं, जो न केवल सौंदर्य में अनुपम हैं बल्कि उनकी चमक और मजबूती भी सदियों तक बरकरार रहने वाली है. यह वही पत्थर है जिसका उपयोग ऐतिहासिक ताजमहल जैसी विश्वविख्यात इमारत में भी हुआ था. इन मूर्तियों में न केवल शिल्प की सुंदरता है, बल्कि प्रत्येक मूर्ति के भाव और मुद्राएं भी उन्हें जीवंतता प्रदान करती हैं.

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वज़न और आकार में विविधता से भरी दिव्यता

प्रतिमाओं के आकार और वजन में विविधता है जो उनकी भव्यता को और भी प्रभावशाली बनाती है. कुछ मूर्तियों का वजन 400 से 500 किलोग्राम तक है, वहीं सप्तर्षियों की प्रतिमाएं भी लगभग 200 से 300 किलोग्राम वजनी हैं. सबसे अधिक वजनी प्रतिमा समूह राम दरबार का है, जिसका कुल वजन लगभग दो टन बताया गया है. यह विशालता मंदिर परिसर की आभा को और अधिक दिव्य बना देती है.

राम दरबार: केंद्र में बसी श्रद्धा की छवि

राम दरबार की प्रतिमाएं विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं. भगवान राम और माता सीता की प्रतिमाएं पांच फीट ऊंची हैं और वे बैठी मुद्रा में हैं. भगवान भरत तथा हनुमान जी की प्रतिमाएं तीन फीट ऊंची हैं और वे भी बैठी मुद्रा में स्थापित हैं. वहीं भगवान लक्ष्मण और शत्रुघ्न की प्रतिमाएं चार फीट छह इंच ऊंची हैं और उन्हें खड़ी मुद्रा में प्रदर्शित किया गया है. इन सभी प्रतिमाओं को जिस सिंहासन पर विराजित किया गया है, वह लगभग ढाई फीट ऊंचा है, जो पूरे दरबार को एक भव्य मंच प्रदान करता है.

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अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी बनीं आकर्षण का केंद्र

रामजन्मभूमि परिसर के परकोटे के मध्य स्थापित अन्य पूरक मंदिरों में विराजमान देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी अत्यंत आकर्षक और प्रभावशाली हैं. भगवान सूर्यदेव, गणेश जी, हनुमान जी और मां अन्नपूर्णा की प्रतिमाएं लगभग साढ़े तीन फीट ऊंची हैं. मां दुर्गा की प्रतिमा विशेष रूप से भव्य है, जिसकी ऊंचाई पांच फीट है. शेषावतार मंदिर में स्थापित वनवासी लक्ष्मण जी की प्रतिमा की ऊंचाई चार फीट छह इंच है, जो रामायण काल की भावनाओं को जीवंत करती है. शिव मंदिर में स्थापित नर्मदेश्वर शिवलिंग को पिछले वर्ष ही परिसर में लाया गया था, और अब इसे प्रतिष्ठित कर दिया गया है.

सप्तर्षियों की मूर्तियां: पौराणिक पात्रों की श्रद्धा के प्रतीक

परिसर में स्थापित सप्तर्षियों की प्रतिमाएं भी दर्शकों को भावविभोर कर देती हैं. इनमें महर्षि वाल्मीकि, गुरु वशिष्ठ, गुरु विश्वामित्र, माता शबरी, माता अहिल्या और निषादराज शामिल हैं. इन प्रतिमाओं में निषादराज को छोड़कर सभी को बैठी मुद्रा में दर्शाया गया है. ये सभी मूर्तियां भक्तों को रामायण की जीवंत झलक प्रदान करती हैं.

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ट्रस्ट ने किया पांडेय परिवार को सम्मानित आमंत्रण

श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने इस पुण्य कार्य में सहभागी पांडेय परिवार को सामूहिक प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम में विशेष आमंत्रण दिया है. यह वही परिवार है जिसने देश के विभिन्न प्रसिद्ध मंदिरों की प्रतिमाओं का निर्माण किया है और अपनी उत्कृष्ट शिल्पकला से धार्मिक स्थलों को जीवंतता प्रदान की है. मूर्तिकार प्रशांत पांडेय ने ‘दैनिक जागरण’ से बातचीत में बताया कि यह अनुभव उनके परिवार के लिए आध्यात्मिक सौभाग्य और सृजनात्मक सम्मान दोनों का संगम है, जिसे वे जीवनभर संजो कर रखेंगे.

शिल्प और श्रद्धा का संगम

रामजन्मभूमि परिसर की ये प्रतिमाएं न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि यह भारतीय शिल्पकला की उत्कृष्टता का भी भव्य उदाहरण प्रस्तुत करती हैं. इन प्रतिमाओं के माध्यम से श्रद्धालु भगवान के दर्शन करते हुए शिल्प की सूक्ष्मताओं को भी अनुभव कर सकेंगे. निश्चित ही यह निर्माण कार्य आने वाली पीढ़ियों को भारतीय कला, संस्कृति और धर्म के गौरवशाली स्वरूप का परिचय कराता रहेगा.

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