Rourkela News: नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआइटी) राउरकेला के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की शोधकर्ताओं ने डेयरी उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट जल के उपचार के लिए एक अनोखी जैविक प्रणाली विकसित की है और उसका पेटेंट हासिल किया है. एक एकीकृत सेटअप में जलीय पौधों, केंचुओं, सूक्ष्मजीवों की गतिविधि और एक हाइड्रोपोनिक निस्पंदन प्रणाली का उपयोग करके, यह बहु-स्तरीय प्रक्रिया जैविक प्रदूषण को कम करती है और जैविक पदार्थों के जमाव को रोकती है.
उच्च सीओडी की समस्या का हो सकेगा समाधान
पनीर, दही और योगर्ट जैसे डेयरी उत्पादों की उत्पादन प्रक्रिया में भारतीय डेयरी उद्योग प्रतिदिन अरबों लीटर अपशिष्ट जल उत्पन्न करता है. इस अपशिष्ट जल में वसा, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में होते हैं और इसमें उच्च ‘केमिकल ऑक्सीजन डिमांड’ (सीओडी) होती है. यह सीओडी पानी में मौजूद जैविक पदार्थों की मात्रा का एक पैमाना है. जब इस पानी को जल निकायों में छोड़ा जाता है, तो उच्च सीओडी स्तर जलीय जीवन को बनाये रखने के लिए आवश्यक घुलित ऑक्सीजन को कम कर देते हैं. झिल्ली निस्पंदन (मेंबरेन फिल्टरेशन) जैसी पारंपरिक उपचार विधियां इस चुनौती का सीधे तौर पर समाधान नहीं करतीं और अक्सर जाम हो जाती हैं. इस चुनौती से निपटने के लिए, एनआइटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर प्रो काकोली करार पॉल ने अपनी शोध छात्रा (बैच 2025) डॉ प्रज्ञान दास के साथ मिलकर इस बहु-स्तरीय प्रणाली को विकसित किया है. इस प्रणाली में प्रत्येक परत एक विशिष्ट शुद्धिकरण कार्य करती है, और साथ ही पूरी प्रक्रिया की समग्र स्थिरता में भी योगदान देती है. शोध टीम ने इस विकसित प्रणाली के लिए ‘डेयरी अपशिष्ट जल के उपचार की विधि और प्रणाली’ शीर्षक से एक पेटेंट हासिल किया है (पेटेंट संख्या: 583949; आवेदन संख्या: 202431032506).