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मानवता की रक्षा का प्रतीक है ”यौम-ए-आशूरा”

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मानवता की रक्षा का प्रतीक है ”यौम-ए-आशूरा”

इस्लामी कैलेंडर के पवित्र महीने मोहर्रम की दसवीं तारीख को दुनिया भर में ”यौम-ए-आशूरा” के रूप में याद किया जाता है. यह दिन केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए दिये गये महान बलिदान का प्रतीक है.

आशूरा का शाब्दिक अर्थ

अरबी भाषा में “आशूरा ” शब्द “अशरा ” से बना है, जिसका अर्थ है “दस “. इसलिए मुहर्रम की दसवीं तारीख को यौम-ए-आशुरा कहा जाता है. इस दिन का महत्व इस्लामी इतिहास में अनेक कारणों से वर्णित है. विभिन्न इस्लामी परंपराओं के अनुसार इसी दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुईं, जिनमें हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और बनी इस्राइल को फिरऔन के अत्याचार से मुक्ति मिलना भी शामिल है.

कर्बला की ऐतिहासिक घटना

यौम-ए-आशुरा का सबसे बड़ा महत्व 61 हिजरी में इराक के कर्बला मैदान में हुई उस महान घटना से जुड़ा है, जहां पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन इब्न अली ने सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अपनी तथा अपने परिवार और साथियों की जान कुर्बान कर दी. उस समय शासन सत्ता अन्याय, निरंकुशता और नैतिक पतन का प्रतीक बन चुकी थी. इमाम हुसैन ने अत्याचार और असत्य के सामने झुकने के बजाय सत्य के मार्ग को चुना. उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि सत्ता से बड़ा मूल्य सत्य, इंसाफ और मानवता है.

कर्बला का दर्शन

कर्बला केवल युद्ध का नाम नहीं है, बल्कि यह एक विचारधारा है.

इसका संदेश है कि अन्याय के सामने कभी सिर न झुकाया जाए.

सत्य और न्याय की रक्षा हर परिस्थिति में की जाए.

धर्म और नैतिक मूल्यों के लिए त्याग करने से पीछे न हटें.

मानव गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा सर्वोच्च कर्तव्य है.इमाम हुसैन का संघर्ष सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं था, बल्कि समाज को अत्याचार और भ्रष्टाचार से बचाने के लिए था. यही कारण है कि कर्बला को मानवता की सबसे महान नैतिक क्रांतियों में गिना जाता है.

कर्बला की महान कुर्बानियां

कर्बला में इमाम हुसैन के साथ उनके परिवार और साथियों ने अभूतपूर्व त्याग का उदाहरण प्रस्तुत किया. इतिहास बताता है कि उन्हें कई दिनों तक पानी से वंचित रखा गया, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. इस घटना में इमाम हुसैन ने अपनी जान कुर्बान की. उनके युवा पुत्र हज़रत अली अकबर ने शहादत प्राप्त की. उनके छह महीने के मासूम पुत्र हज़रत अली असगर भी शहीद हुए. उनके भाई हज़रत अब्बास ने वफादारी और साहस का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया. परिवार और साथियों के अनेक सदस्य सत्य की राह में शहीद हुए. इन कुर्बानियों ने यह साबित किया कि सत्य की रक्षा के लिए संख्या नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और ईमान की आवश्यकता होती है.

यौम-ए-आशूरा का उद्देश्य

आशूरा का उद्देश्य केवल शोक मनाना नहीं है, बल्कि उसके संदेश को अपने जीवन में उतारना है. यह दिन हमें सिखाता है कि सत्य का साथ दें, चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों. अन्याय और अत्याचार का विरोध करें. मानवता, करुणा और भाईचारे को बढ़ावा दें. समाज में नैतिकता और न्याय की स्थापना के लिए कार्य करें. धर्म के मूल उद्देश्यों शांति, न्याय और मानव कल्याण को अपनायें.

वर्तमान समय में आशूरा की प्रासंगिकता

आज जब दुनिया हिंसा, अन्याय, भेदभाव और नैतिक संकटों का सामना कर रही है, तब कर्बला का संदेश और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है. इमाम हुसैन की शहादत हमें याद दिलाती है कि सत्य और न्याय के लिए संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता.

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