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Home झारखण्ड पश्चिमी सिंहभूम चाईबासा में बड़ा हादसा टला, जर्जर आदिवासी छात्रावास की छत गिरी, बुनियादी समस्याओं से जूझ रहीं छात्राएं

चाईबासा में बड़ा हादसा टला, जर्जर आदिवासी छात्रावास की छत गिरी, बुनियादी समस्याओं से जूझ रहीं छात्राएं

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चाईबासा में बड़ा हादसा टला, जर्जर आदिवासी छात्रावास की छत गिरी, बुनियादी समस्याओं से जूझ रहीं छात्राएं
आदिवासी कन्या छात्रावास का जर्जर भवन

चाईबासा से रवि शंकर मोहंती की रिपोर्ट

Chakradharpur Hostel Ceiling Collapse, पश्चिमी सिंहभूम : पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर में स्थित झारखंड के कल्याण विभाग द्वारा संचालित आदिवासी कन्या छात्रावास की बदहाली और जर्जर स्थिति एक बार फिर उजागर हो गई है. छात्रावास भवन की छत का एक बड़ा हिस्सा अचानक भरभरा कर नीचे गिर गया, जिसके बाद से परिसर में रह रही छात्राओं और उनके अभिभावकों में दहशत का माहौल है. राहत की बात यह रही कि जिस वक्त यह मलबा गिरा, वहां कोई भी छात्रा मौजूद नहीं थी, जिसके कारण एक बहुत बड़ा हादसा टल गया. इस घटना में किसी प्रकार की जान-माल की क्षति नहीं हुई. वर्तमान में इस पुराने और खोखले हो चुके भवन में 73 छात्राएं रहकर अपनी पढ़ाई कर रही हैं. भवन वर्षों पुराना होने के कारण इसकी छतों में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ चुकी हैं. स्थानीय लोगों और छात्राओं का कहना है कि यह घटना प्रशासन के लिए एक खुली चेतावनी है और यदि समय रहते नए भवन का निर्माण नहीं कराया गया, तो भविष्य में किसी बड़े और दर्दनाक हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता.

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5 साल से जलमीनार ठप

छात्रावास में रहने वाली छात्राओं को केवल गिरने वाली छत का ही डर नहीं है, बल्कि वे यहां लंबे समय से घोर बुनियादी समस्याओं से भी जूझ रही हैं. डिजिटल और आधुनिक युग के दावों के बीच इस छात्रावास में जनरेटर तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिसके चलते बिजली कटते ही पूरी रात छात्राओं को घने अंधेरे में गुजारनी पड़ती है. इसके अलावा, छात्रावास परिसर में लाखों की लागत से स्थापित की गई सोलर जलमीनार पिछले पांच वर्षों से पूरी तरह खराब और सफेद हाथी बनी पड़ी है. इसके कारण सभी 73 छात्राएं अपनी रोजाना की जरूरतों, नहाने और पीने के पानी के लिए केवल एक चालू चापाकल के सहारे जीने को मजबूर हैं, जिससे सुबह और शाम के वक्त पानी के लिए भारी आपाधापी मच जाती है.

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टूटे दरवाजे वाले शौचालय बने आफत

छात्रावास के सामुदायिक शौचालय की स्थिति भी बेहद बदहाल और अमानवीय है. शौचालयों के दरवाजे टूट चुके हैं और नियमित साफ-सफाई व रखरखाव के अभाव में उनका उपयोग करना छात्राओं के लिए बेहद कष्टदायक और असुरक्षित हो गया है. पूरा छात्रावास परिसर कच्चा होने के कारण हल्की बारिश में ही चारों तरफ कीचड़ और भारी जलजमाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है, जिससे हर वक्त छात्राओं के फिसलकर गिरने और चोटिल होने का खतरा बना रहता है. अपनी सुरक्षा को लेकर परेशान छात्राओं और अभिभावकों ने विभाग से परिसर का पक्कीकरण करने और पेवर्स ब्लॉक लगाने की पुरजोर मांग की है. आधुनिक सुविधाओं के इस दौर में जहां हर जगह गैस सिलेंडर का उपयोग हो रहा है, वहीं यहां की रसोई आज भी आदिम काल की तरह लकड़ी के चूल्हे के धुएं और जर्जर रसोईघर की असुरक्षित दीवारों के बीच संचालित हो रही है.

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छात्राओं और वार्डन ने बयां किया अपना दर्द

छात्रावास की बदहाली को लेकर यहाँ रहने वाली सुमित्रा बोयपाई, संगीता गोडसोरे, रायमुनी पाडेया, श्रीदेवी सवैया और लक्ष्मी हेयं जैसी छात्राओं ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि छत गिरने की घटना के बाद से वे सब इतनी डरी हुई हैं कि रात को कमरों में सोने में भी डर लगता है. छात्राओं ने बताया कि यहां न तो कोई डाइनिंग हॉल है, न लाइब्रेरी, न कॉमन रूम और न ही साइकिल स्टैंड. वहीं, मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए छात्रावास की वार्डन स्नेहलता डहंगा ने कहा कि भवन काफी पुराना और सचमुच बेहद जर्जर हो चुका है. उन्होंने स्पष्ट किया कि छात्राओं की सुरक्षा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और भवन की मरम्मत सहित अन्य तमाम गंभीर समस्याओं को लेकर विभागीय उच्चाधिकारियों को समय-समय पर लिखित रूप से जानकारी दी जाती रही है. अभिभावकों और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों ने अब कल्याण विभाग से अविलंब इस बदहाली का संज्ञान लेने और तत्काल एक नए सुरक्षित भवन के निर्माण की मांग तेज कर दी है.

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