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Seraikela Kharsawan News :मशीनी शोर में ढेचिंग-चांव की आवाज हो रही खामोश, ढेंकी अब सिर्फ यादों में

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Seraikela Kharsawan News :मशीनी शोर में ढेचिंग-चांव की आवाज हो रही खामोश, ढेंकी अब सिर्फ यादों में

सुरेन्द्र मार्डी, राजनगर मशीनी युग और आरामतलब जीवनशैली के इस दौर में हमारी अनेक परंपरागत धरोहरें धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही हैं. इन्हीं में से एक है ग्रामीण जीवन की पहचान रही ढेंकी, जो अब लुप्तप्राय हो चुकी है. कभी गांवों में गूंजने वाली ढेंकी की “ढेचिंग-चांव” की मधुर ध्वनि आज मशीनों के कानफोड़ू शोर में दबकर खामोश हो गयी है. नयी पीढ़ी तो ढेंकी के नाम और उसके उपयोग से भी लगभग अनजान होती जा रही है. आज गेहूं पीसने और धान कूटने के लिए आधुनिक राइस मिल और आटा चक्कियां सहज उपलब्ध हैं, लेकिन जब ये सुविधाएं नहीं थीं, तब लकड़ी की भारी-भरकम ढेंकी ही ग्रामीणों का प्रमुख सहारा थी. बिना बिजली, केवल पैर के दबाव से चलने वाली यह पारंपरिक व्यवस्था अब गांवों में शायद ही कहीं दिखायी देती है. इसके साथ ही ढेंकी से जुड़ी वह विशिष्ट पहचान और आवाज भी विलुप्त हो चुकी है. हर घर में होती थी ढेंकी : उस समय में लगभग हर ग्रामीण घर में ढेंकी हुआ करती थी. इसके लिए अलग से ‘ढेंकी घर’ बनाया जाता था या बरामदे में ही इसे स्थापित किया जाता था. उस दौर में विवाह संबंध तय करते समय भी ढेंकी को समृद्धि का प्रतीक माना जाता था. काड़को निवासी सवना सोरेन बताते हैं कि ढेंकी से कूटे चावल अधिक पौष्टिक, स्वादिष्ट और प्राकृतिक खुशबू से भरपूर होते थे. मकर संक्रांति जैसे पर्वों पर ढेंकी के चावल से बनने वाला गुड़ पीठा विशेष महत्व रखता था. आज ढेंकी सिमटकर संग्रहालयों तक सीमित हो गयी है. जरूरत है कि इस परंपरा को केवल यादों में नहीं, बल्कि नयी पीढ़ी तक इसके महत्व के साथ पहुंचाया जाए, ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत पूरी तरह विलुप्त न हो.

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