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Home झारखण्ड साहिबगंज झारखंड का संस्कृत स्कूल, जहां मिड-डे-मील के लिए नहीं खरीदी जातीं सब्जियां, टीचर ने ऐसे बदल दी तस्वीर

झारखंड का संस्कृत स्कूल, जहां मिड-डे-मील के लिए नहीं खरीदी जातीं सब्जियां, टीचर ने ऐसे बदल दी तस्वीर

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झारखंड का संस्कृत स्कूल, जहां मिड-डे-मील के लिए नहीं खरीदी जातीं सब्जियां, टीचर ने ऐसे बदल दी तस्वीर
सब्जियों और पौधों के साथ संस्कृत स्कूल के बच्चे और टीचर्स

Kitchen Garden: साहिबगंज-सरकारी स्कूलों में अक्सर मिड-डे-मील (मध्याह्न भोजन) की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे हैं. ऐसे में झारखंड का एक सरकारी स्कूल मिसाल पेश कर रहा है. एक शिक्षक की सोच और सामूहिक प्रयास से इस स्कूल की तस्वीर बदल गयी है. कभी मिड-डे-मील के लिए ताजी सब्जियां बाजार से खरीदनी पड़ती थी, लेकिन स्कूल के किचन गार्डन से न सिर्फ जरूरतें पूरी हो रही हैं, बल्कि अधिक उत्पादन के कारण बच्चे सब्जियां घर भी ले जा रहे हैं. इस स्कूल से प्रेरित होकर अन्य स्कूलों में भी बदलाव दिख रहा है. पढ़िए सुनील ठाकुर की रिपोर्ट.

चर्चा में संस्कृत विद्यालय तालबन्ना का किचन गार्डन


साहिबगंज जिले का संस्कृत विद्यालय तालबन्ना इन दिनों चर्चा में है. वजह है किचन गार्डन. इसने साबित कर दिया कि सीमित संसाधनों में भी इनोवेशन और सामूहिक प्रयास से काफी कुछ संभव है. स्कूल परिसर में उगाई गईं हरी सब्जियों से न केवल बच्चों को पोषण मिल रहा है, बल्कि पर्यावरण और शिक्षा में भी नया रंग भर गया है. एक शिक्षक की सोच से जीरो बजट में स्कूल में बदलाव आ गया.

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स्कूल परिसर था बदहाल, स्वच्छता से की बदलाव की शुरुआत


स्कूल के पूर्व प्राचार्य डॉ सच्चिदानंद बताते हैं कि उन्होंने जब स्कूल का कार्यभार संभाला, तब विद्यालय परिसर बदहाल था. कूड़ा-कचरा, गोबर और दुर्गंध से लोग परेशान रहते थे. उन्होंने इसे अवसर में बदला. उन्होंने निर्णय लिया कि स्कूल परिसर को न केवल स्वच्छ बनाया जाएगा, बल्कि किचन गार्डन तैयार किया जाएगा, जिससे बच्चों के मध्याह्न भोजन के लिए हरी सब्जियां भी मिल सकेंगी.

श्रमदान से स्कूल परिसर में उगाई जाने लगीं सब्जियां


डॉ सच्चिदानंद ने स्कूल से न सिर्फ छात्रों को, बल्कि उनके अभिभावकों को भी जोड़ा. सामूहिक प्रयास से परिसर में केला, सहजन (मोरिंगा), पपीता, लौकी, टमाटर और भिंडी उगानी शुरू की. जीरो बजट पर इसकी शुरुआत की गयी. श्रमदान और स्थानीय संसाधनों के सहारे यह शुरू किया गया. किचन गार्डन से धीरे-धीरे सब्जियों का उत्पादन इतना बढ़ा कि मिड-डे मील की जरूरतें पूरी होने लगीं. अधिक उत्पादन होने पर सब्जियां छात्रों को घर ले जाने के लिए भी दी जाने लगीं.

पौधों को परिजनों के नाम पर किया गया टैग


किचन गार्डन को जीवंत बनाए रखने के लिए हर पौधे को किसी छात्र के परिजन (माता-पिता, दादा-दादी) के नाम से टैग किया गया. इससे बच्चों में अपनापन और जिम्मेदारी की भावना विकसित हुई. हर बच्चा अपने पौधे को अपने परिवार का हिस्सा मानने लगा. इसी के साथ सभी पौधे सुरक्षित होकर बड़े हो गए.

कचरा साफ कर स्कूल में लायी हरियाली-रामजीत यादव


सामाजिक कार्यकर्ता रामजीत यादव बताते हैं कि बाबा (डॉ सच्चिदानंद) के प्रयास से स्कूल की तस्वीर बदली है. पिछले 50 वर्षों के कचरे को साफ कर बाबा ने परिसर को स्वच्छ, हरा-भरा और सुंदर बना दिया. मंजू देवी बताती हैं कि डॉ सच्चिदानंद से प्रभावित होकर दूसरे विद्यालयों में भी बदलाव दिखने लगा है. स्कूल परिसर साफ-सुथरा और हरा-भरा बनाने का अभियान चल पड़ा है.

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