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Home झारखण्ड रांची रांची नगर निगम का हर साल बढ़ता गया बजट, योजनाएं कागजों पर और शहर पानी में

रांची नगर निगम का हर साल बढ़ता गया बजट, योजनाएं कागजों पर और शहर पानी में

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रांची नगर निगम का हर साल बढ़ता गया बजट, योजनाएं कागजों पर और शहर पानी में
रांची नगर निगम का बजट बढ़ने के बाद भी शहर के हालात नहीं बदले.

रांची से उत्तम महतो की रिपोर्ट

Ranchi Municipal Budget: झारखंड की राजधानी रांची के शहरी विकास को गति देने के लिए रांची नगर निगम ने पिछले पांच वर्षों में करीब 12 हजार करोड़ रुपये से अधिक के बजट को स्वीकृति दी है. हर वर्ष बजट का आकार बढ़ा, योजनाएं बनीं. घोषणाएं भी हुईं, लेकिन जमीन पर शहर की तस्वीर में उम्मीद के मुताबिक बदलाव नजर नहीं आ रहा है. सफाई व्यवस्था को मॉडल बनाने, सीवरेज सिस्टम दुरुस्त करने और हर घर तक नल से जल पहुंचाने की योजनाएं अब भी अधूरी हैं. रांची नगर निगम का बजट हर वर्ष बढ़ता गया, लेकिन शहर की तस्वीर में कोई ठोस बदलाव नहीं आया. रांची नगर निगम का बजट हर साल बढ़ता गया. योजनाएं कागजों पर लागू हो रही हैं और रांची शहर पानी में तैर रहा है.

क्या कहते हैं आंकड़ें

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020-21 में निगम का बजट 2276 करोड़ रुपये था. वर्ष 2021-22 में यह बढ़कर 2400 करोड़, 2022-23 में 2757 करोड़, 2023-24 में 2780 करोड़ और 2024-25 में 2801 करोड़ रुपये हो गया. लेकिन राजधानी खुद को विकसित शहरों की श्रेणी में स्थापित नहीं कर सकी. लगातार बढ़ते बजट और भारी खर्च के बावजूद राजधानी की बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं. गर्मी में जलसंकट और बारिश में जलजमाव रांची की पहचान बनती जा रही है. हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी जमीनी स्तर पर बदलाव नहीं दिख रहा है.

केंद्र और राज्य के भरोसे नगर सरकार

2800 करोड़ रुपये से अधिक के बजट में नगर निगम का आंतरिक राजस्व महज 110 करोड़ रुपये के आसपास है. यानी कुल बजट का 10 प्रतिशत भी निगम अपने संसाधनों से नहीं जुटा पा रहा है. होल्डिंग टैक्स, जलकर, ट्रेड लाइसेंस और हाट-बाजार के किराये से यह राशि एकत्र की जाती है. बड़े प्रोजेक्टों के लिए निगम पूरी तरह केंद्र और राज्य सरकार पर निर्भर है. यही कारण है कि कई योजनाएं वर्षों तक अधूरी पड़ी रहती हैं.

सफाई पर हर माह पांच करोड़ खर्च, फिर भी गंदगी बरकरार

शहर के लगभग तीन लाख घरों से कूड़ा उठाव के लिए निगम हर माह पांच करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है. इसके बावजूद डोर-टू-डोर कलेक्शन नियमित नहीं हो पा रहा है. कई इलाकों में लोग कूड़ा खुले में फेंकने को मजबूर हैं. खुले में पड़े कचरे पर आवारा पशु मंडराते रहते हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ गया है.

तीन उदाहरणों से समझें हकीकत

  • उदाहरण एक: 650 करोड़ खर्च, फिर भी जलजमाव की समस्या कायम

पिछले पांच वर्षों में सीवरेज और ड्रेनेज सिस्टम पर 650 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किये गये. इसके बावजूद हल्की बारिश में ही शहर तालाब में तब्दील हो जाता है. कई सड़कों पर दो से तीन फीट तक पानी जमा हो जाता है. कचहरी रोड स्थित हलधर प्रेस गली इसका बड़ा उदाहरण है. यहां के लोग पिछले 12 वर्षों से जलजमाव की समस्या झेल रहे हैं. बरसात के दौरान कई परिवार अस्थायी रूप से दूसरे मोहल्लों में शिफ्ट होने को मजबूर हो जाते हैं. कहीं नाला बना, लेकिन उसे मुख्य नाले से नहीं जोड़ा गया. कहीं नालियां बनीं, लेकिन उनकी नियमित सफाई नहीं हो पाती.

  • उदाहरण दो: 58 हजार स्ट्रीट लाइटों में से 19 हजार बेकार

पिछले 12 वर्षों में 30 करोड़ रुपये खर्च कर 58 हजार स्ट्रीट लाइटें लगायी गयीं. इनमें से करीब 19 हजार लाइटें खराब पड़ी हैं. शाम होते ही शहर के बड़े हिस्से में अंधेरा छा जाता है. खेलगांव रोड, कोकर-लालपुर मार्ग, कांटाटोली-सामलौंग रोड, बहूबाजार-कर्बला चौक मार्ग, रिम्स-तिरिल रोड, बरियातू-बड़गांई रोड और बूटी बस्ती जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में स्ट्रीट लाइटें बंद पड़ी हैं.

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  • उदाहरण तीन: 1100 करोड़ की पाइपलाइन, लेकिन एक बूंद पानी नहीं

शहर के दो लाख घरों तक जलापूर्ति के लिए पिछले 10 वर्षों में 1100 करोड़ रुपये खर्च कर पाइपलाइन, रिजर्वायर और जलमीनार बनाये गये. लेकिन एनओसी के अभाव में तिलता से रातू रोड तक राइजिंग पाइपलाइन अब भी अधूरी है. नतीजा यह है कि गली-मोहल्लों में बिछायी गयी पाइपलाइनों में अब तक एक बूंद पानी नहीं पहुंच पाया है. गर्मी के मौसम में 350 से अधिक मोहल्लों के लोग नगर निगम के टैंकरों पर निर्भर रहते हैं.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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