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सरहुल की शोभायात्रा पर थिरके प्रकति के उपासक

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सरहुल की शोभायात्रा पर थिरके प्रकति के उपासक

रांची. प्रकृति पर्व सरहुल की भव्य शोभायात्रा. अलबर्ट एक्का चौक पर लहराते सफेद और लाल पट्टियों वाले सरना झंडे. मांदर, नगाड़े, ढोल की थाप और बांसुरी की मधुर धुन. सड़कों पर एक के बाद एक प्रकृति पूजकों की शोभायात्रा. चारों ओर गीत-नृत्य. साथ में प्रकृति भी मेहरबान. गुरुवार सुबह से ही आसमां में बादल छाये रहे, जिससे शोभायात्रा में शामिल लोगों को काफी राहत मिली. आदिवासी छात्र संघ के मंच पर मौजूद मनोज उरांव काफी व्यस्त थे. वे न सिर्फ लगातार लोगों को पानी और चना खिलाकर राहत पहुंचाते रहे बल्कि बीच-बीच में गीतों से सबकी थकान भी उतारते रहे. उनके गीतों में सवाल था : का करे गेले पाहन सरना भीतरे का करे गेले मुंडा मुडार तरे..और अगली पंक्तियों में जवाब भी दिया : पूजा करे गेले पाहन सरना भीतरे, सेवा करे गेले मुंडा मुडार तरे. पहली शोभायात्रा सरहुल सरना समिति उलातू की थी, जिसका नेतृत्व बिरसा पाहन कर रहे थे. थोड़ी देर बाद सरना समिति हातमा की शोभायात्रा पहुंची. एक खुली हुई जीप पर जगलाल पाहन हाथ में पूजन सामग्री की सूप लिये खड़े थे. लोगों का अभिवादन कर रहे थे. उनके पीछे नाचते गाते युवाओं का हुजूम था. रंगबिरंगी लाइटों से नृत्य और मनमोहक लग रहा था. गुमला की शोभायात्रा में आदिम परंपरा की दिखी झलक गुमला के शिवराजपुर घाघरा से पहुंची शोभायात्रा में आदिम परंपरा की झलक मिली. युवतियों और महिलाओं ने न सिर्फ पुरानी पड़िया साड़ी को धारण किया था बल्कि उन्होंने उन गहनों को पहना था जो आजकल लुप्त हो चले हैं. सिर पर सखुए की पत्ती और फूलों से किया शृंगार उन्हें हजारों की भीड़ में अलग बना रहा था. इस समूह ने नगाड़े और मांदर पर सरहुल के गीतों पर सबको थिरकने पर विवश कर दिया. इसके बाद सिलसिला चलता रहा. बारह पड़हा मुरूम, नवीन सरना कॉलेज छात्रावास, बारह पड़हा सरना समिति रोल कांके की शोभायात्रा निकलती रही. हेहल बगीचा टोली की शोभायात्रा में डीजे लाइट के साथ लोग थिरकते रहे. सरना समिति हिंदपीढ़ी की शोभायात्रा में एक छोटा सा बच्चा तीर धनुष के साथ था. सभी लोग अपने गंतव्य सिरमटोली स्थित मुख्य सरना स्थल की ओर बढ़ रहे थे. लगभग 80 से ज्यादा समितियों ने शोभायात्रा निकाली.

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