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झारखंड में 7 वर्षों में हुई 500 ‘कस्टोडियल डेथ’, हलफनामा में बड़ा खुलासा

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झारखंड में 7 वर्षों में हुई 500 ‘कस्टोडियल डेथ’, हलफनामा में बड़ा खुलासा
झारखंड हाईकोर्ट की तस्वीर

Jharkhand High Court, रांची (राणा प्रताप की रिपोर्ट): झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य के थानों और जेलों में हुई मौतों को लेकर दायर जनहित याचिका पर अपनी सुनवाई पूरी कर ली है. खंडपीठ ने प्रार्थी मो. मुमताज अंसारी और राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए तमाम दस्तावेजों और दलीलों का अध्ययन करने के बाद मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है. यह याचिका राज्य में मानवाधिकारों के संरक्षण और हिरासत में होने वाली मौतों की जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से दायर की गई थी.

गृह सचिव के शपथ पत्र में चौंकाने वाले आंकड़े

मामले की सुनवाई के दौरान गृह सचिव की ओर से अदालत में एक विस्तृत शपथ पत्र दाखिल किया गया था. इस हलफनामे में सरकार ने स्वीकार किया है कि वर्ष 2018 से लेकर 2025 के बीच झारखंड में पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत (जेल) में कुल मिलाकर लगभग 500 मौतें हुई हैं. इतनी बड़ी संख्या में हुई मौतों ने राज्य की सुरक्षा और न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. हालांकि, सरकार की ओर से कोर्ट को यह आश्वासन दिया गया कि हिरासत में मौत के हर मामले की सूचना नियमानुसार मजिस्ट्रेट को दी गई थी.

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प्रार्थी की निष्पक्ष जांच की मांग

प्रार्थी मो. मुमताज अंसारी की ओर से अधिवक्ता शादाब अंसारी ने पक्ष रखते हुए लिखित बहस प्रस्तुत की. उन्होंने दलील दी कि हिरासत में हुई मौतों की प्रकृति संदिग्ध हो सकती है, इसलिए इन मामलों की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच अनिवार्य है. बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेशों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) द्वारा समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया गया. प्रार्थी का मुख्य जोर इस बात पर था कि पुलिस थाना या जेल में होने वाली किसी भी मौत के लिए जिम्मेदारी तय की जाए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर अंकुश लग सके.

न्यायिक प्रक्रिया और मानवाधिकार

अदालत अब इस बात पर फैसला सुनाएगी कि क्या इन 500 मौतों की जांच के लिए कोई नई गाइडलाइन या स्वतंत्र एजेंसी की आवश्यकता है. यह मामला न केवल झारखंड के प्रशासनिक ढांचे के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह विचाराधीन कैदियों और पुलिस हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है. पूरे राज्य की निगाहें अब हाईकोर्ट के सुरक्षित रखे गए फैसले पर टिकी हैं.

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