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Home झारखण्ड रांची राज्यसभा चुनाव: कांग्रेस के धीरज साहू का दावा, झारखंड में इस बार नहीं हुई क्रॉस वोटिंग

राज्यसभा चुनाव: कांग्रेस के धीरज साहू का दावा, झारखंड में इस बार नहीं हुई क्रॉस वोटिंग

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राज्यसभा चुनाव: कांग्रेस के धीरज साहू का दावा, झारखंड में इस बार नहीं हुई क्रॉस वोटिंग
कांग्रेस नेता धीरज साहू. फोटो: प्रभात खबर

रांची से अरविंद कुमार की रिपोर्ट

Rajya Sabha Election: झारखंड में राज्यसभा चुनाव की वोटिंग पूरी हो चुकी है और अब क्लासिक भारतीय राजनीतिक रियलिटी शो का ऐलान बाकी है. कांग्रेस के नेता काउंटिंग से पहले ही जीत का ऐलान कर रहे हैं. पूर्व राज्यसभा सांसद धीरज साहू ने दावा किया है कि इस बार “खेल साफ है” और इंडिया गठबंधन दोनों सीटें निकालने जा रहा है. सुनने में यह उतना ही आत्मविश्वास से भरा लगता है, जितना हर चुनाव के बाद हर पार्टी का “हमारी जीत पक्की है” वाला राग. मतदाता अपना काम करके घर लौट चुके हैं, लेकिन राजनीतिक दावे अभी भी मैदान में डटे हैं, जैसे आखिरी ओवर में भी हर बॉलर खुद को मैच विनर समझता है.

“फीडबैक” और गणित का राजनीतिक संस्करण

धीरज साहू के मुताबिक, उन्हें अंदर से “फीडबैक” मिला है और पार्टी के गणितज्ञ ने आंकड़े बहुत पहले ही तय कर दिए हैं. इनमें मंत्री राधाकृष्ण किशोर जैसे नाम शामिल हैं. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भारतीय राजनीति में “फीडबैक” अक्सर वही होता है जो सुनने वाले को अच्छा लगे. उनके मुताबिक, दोनों सीटें इंडिया गठबंधन के खाते में जा रही हैं और “कोई ताकत रोक नहीं सकती.” यह वही क्लासिक राजनीतिक आत्मविश्वास है जो हर बार परिणाम से पहले 100% दिखता है और बाद में 50-50 पर आकर रुक जाता है.

क्रॉस वोटिंग का डर या पुरानी कहानी की रीप्ले

झारखंड की राजनीति में क्रॉस वोटिंग कोई नई कहानी नहीं है. इसलिए इस बार दावा किया गया है कि “सख्त निगरानी” रखी गई है और पिछली गलतियों को दोहराने नहीं दिया जाएगा. मतलब, लोकतंत्र के अंदर लोकतंत्र पर ही निगरानी. यहां दिलचस्प बात यह है कि क्रॉस वोटिंग का डर हर पार्टी को होता है, लेकिन स्वीकार कोई नहीं करता कि उनके ही विधायक “विवेक स्वतंत्र” इस्तेमाल कर सकते हैं. राजनीतिक भाषा में इसे “मुस्तैदी” कहा जाता है, आम भाषा में इसे “भरोसा नहीं है” कहते हैं.

बीजेपी बनाम इंडिया गठबंधन: बयान युद्ध

दूसरी तरफ बीजेपी नेताओं का दावा है कि गणना अलग तस्वीर दिखाएगी और नाथवानी की जीत संभव है. यानी एक तरफ “क्लीन स्वीप”, दूसरी तरफ “हम भी पीछे नहीं”. यह पूरा दृश्य किसी क्रिकेट मैच से कम नहीं लगता जहां दोनों टीमें पहले ही ट्रॉफी अपने नाम कर चुकी होती हैं, बस अंपायर रिजल्ट घोषित करने में थोड़ा बाधा डाल रहा होता है. धीरज साहू का यह कहना कि बीजेपी नेता “मंडराते कम दिख रहे हैं”, राजनीति में निरीक्षण की नई पद्धति है.अब उपस्थिति देखकर चुनाव परिणाम तय किए जा रहे हैं. शानदार वैज्ञानिकता है.

एजेंट्स, रणनीति और लोकतंत्र का माइक्रोमैनेजमेंट

कांग्रेस और सहयोगी दलों के पोलिंग एजेंट्स की “मुस्तैदी” का विशेष उल्लेख किया गया है. बताया गया कि हर वोट पर नज़र रखी गई और आलाकमान तक रिपोर्टिंग जाएगी. यह सुनकर ऐसा लगता है जैसे राज्यसभा चुनाव कम और कोई हाई सिक्योरिटी ऑपरेशन ज्यादा चल रहा हो. यह भी कहा गया कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सबकुछ “काबिले तारीफ” रहा. भारतीय राजनीति में नेतृत्व की तारीफ और चुनावी जीत का रिश्ता इतना गहरा है कि कभी-कभी दोनों को अलग करना ही मुश्किल हो जाता है.

परिणाम की प्रतीक्षा: लोकतंत्र या लाइव ड्रामा

पूरे बयान का सार यही है कि परिणाम बस आने ही वाले हैं और दोनों सीटों पर जीत लगभग तय मानी जा रही है. यहां मज़ेदार बात यह है कि “लगभग तय” शब्द लोकतंत्र में सबसे सुरक्षित भविष्यवाणी है—न गलत साबित होगी, न सही साबित होने की जरूरत पड़ेगी. प्रणव झा और बैजनाथ राम को विजयी बताया जा रहा है, लेकिन यह वही चरण है जहां राजनीति अपनी सबसे आत्मविश्वासी कल्पनाओं में रहती है.

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राजनीति का पुराना गणित

झारखंड का यह राज्यसभा चुनाव एक बार फिर साबित करता है कि चुनाव केवल वोटों का खेल नहीं, बल्कि कथाओं का युद्ध है. हर पक्ष के पास अपना “फाइनल नंबर” है, अपना “इनसाइड फीडबैक” है और अपना “100% विश्वास” भी. पर असली सच तो वही है जो काउंटिंग के बाद सामने आएगा. बाकी सब अभी सिर्फ राजनीतिक ट्रेलर है, जिसमें हर किरदार खुद को हीरो समझ रहा है और दर्शक बस इंतजार कर रहे हैं कि आखिर फिल्म का असली क्लाइमैक्स कौन लिखेगा.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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