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Home झारखण्ड रामगढ़ पतरातू में बालू के अवैध उठाव से दामोदर छलनी, प्रशासन बना है मूकदर्शक

पतरातू में बालू के अवैध उठाव से दामोदर छलनी, प्रशासन बना है मूकदर्शक

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पतरातू में बालू के अवैध उठाव से दामोदर छलनी, प्रशासन बना है मूकदर्शक
पतरातू में दामोदर नदी में जमा बालू का ढेर (बाएं ऊपर), हाईवा से रात में बालू की ढुलाई (दाएं ऊपर), ट्रैक्टर से बालू का उठाव (बाएं नीचे) और बालू लादने के इंतजार में खड़ा ट्रैक्टर (दाएं नीचे). फोटो: प्रभात खबर

पतरातू से अजय तिवारी की रिपोर्ट

Illegal Sand Mining: झारखंड के रामगढ़ जिले के पतरातू क्षेत्र में दामोदर नदी से अवैध बालू उठाव का धंधा खुलेआम चल रहा है. दिन हो या रात, नदी घाटों पर हाईवा और ट्रैक्टरों की लगातार आवाजाही इस बात का संकेत देती है कि अवैध खनन अपने चरम पर है. हैरानी की बात यह है कि जिम्मेदार विभागों की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही है.

शाम ढलते ही तेज हो जाता है अवैध कारोबार

स्थानीय लोगों के अनुसार, शाम होते ही नदी किनारे बने अस्थायी स्टॉक डंप से दर्जनों हाईवा वाहन बालू लादकर रांची की ओर रवाना हो जाते हैं. चर्चा है कि इस पूरे नेटवर्क को एक प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त है. उसके इशारे पर ट्रैक्टरों से पहले बालू जमा किया जाता है और फिर बड़े वाहनों से बाहर भेजा जाता है. ग्रामीणों का कहना है कि टोकीसूद, तेरपा महुआ टोला और डीजल कॉलोनी के आसपास यह गतिविधि सबसे अधिक देखी जा रही है. रात के अंधेरे में मशीनों की आवाज और वाहनों की कतारें साफ बताती हैं कि यह कारोबार संगठित तरीके से संचालित हो रहा है.

प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

जब इस संबंध में पतरातू थाना प्रभारी से जानकारी ली गई, तो उन्होंने ऐसी किसी गतिविधि की जानकारी से इनकार किया. वहीं, स्थानीय लोगों का दावा है कि रोजाना दर्जनों ट्रैक्टर और हाईवा नदी से बालू उठाते हैं. खनन विभाग और पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल उठ रहे हैं. लोगों का कहना है कि यदि कार्रवाई की मंशा हो तो इस अवैध धंधे को एक दिन में रोका जा सकता है. लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि नियम-कानून सिर्फ कागजों तक सीमित दिखाई दे रहे हैं.

मशीनों से हो रहा नदी का दोहन

चिंताजनक बात यह है कि अवैध खनन को तेज करने के लिए नदी में मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है. भारी उपकरणों से नदी की तलहटी को खंगाला जा रहा है, जिससे प्राकृतिक संरचना को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की गतिविधियां नदी के प्रवाह को प्रभावित करती हैं. इससे किनारों पर कटाव बढ़ता है और आसपास की जमीन की उर्वरता भी घटती है. यदि यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में जलस्तर गिरने और जल संकट गहराने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

पर्यावरण और जनजीवन पर असर

अवैध बालू खनन का सीधा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है. नदी किनारे बसे गांवों में लोगों ने बताया कि पहले जहां पानी की उपलब्धता बेहतर थी, अब वहां जलस्तर में गिरावट महसूस की जा रही है. इसके अलावा, भारी वाहनों की आवाजाही से सड़कों की हालत भी खराब हो रही है. धूल और शोर से स्थानीय निवासियों का जीवन प्रभावित हो रहा है. स्कूल जाने वाले बच्चों और बुजुर्गों को खासा परेशानी उठानी पड़ रही है.

एक व्यक्ति के इशारे पर चल रहा पूरा खेल

क्षेत्र में चर्चा है कि अवैध बालू ढुलाई का पूरा नेटवर्क एक ही व्यक्ति द्वारा संचालित किया जा रहा है. कथित रूप से प्रभावशाली संपर्कों के कारण वाहनों को रोकने-टोकने में पुलिस भी असमर्थ नजर आती है. हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार हो रही ढुलाई और खुलेआम संचालन से लोगों के मन में संदेह गहरा गया है. आम नागरिकों का कहना है कि यदि प्रशासन चाहे तो सख्ती से कार्रवाई कर इस खेल को खत्म कर सकता है.

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जांच और सख्त कार्रवाई की मांग

स्थानीय सामाजिक संगठनों और ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और खनन विभाग से अविलंब जांच की मांग की है. उनका कहना है कि अवैध खनन पर रोक नहीं लगी तो दामोदर नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा. अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन समय रहते कार्रवाई करेगा या फिर यूं ही नदी की लूट जारी रहेगी. लोगों को उम्मीद है कि जिम्मेदार विभाग जल्द ही सख्त कदम उठाएंगे और अवैध कारोबार पर लगाम लगाएंगे.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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