प्रतिनिधि, पाटन
पाटन. पाटन प्रखंड के किशुनपुर ओपी को अचानक पिकेट में बदलने के निर्णय से स्थानीय व्यवसायियों और आमजन में गहरी नाराज़गी फैल गयी है. रविवार को सुबह छह बजे से दोपहर 12 बजे तक क्षेत्र के व्यवसायियों ने अपनी दुकानें बंद रखकर विरोध जताया. इस बंद को आमजन और बुद्धिजीवियों का भी समर्थन मिला. किशुनपुर क्षेत्र पहले उग्रवाद प्रभावित रहा है. उस समय व्यवसायियों में भय का माहौल था. तत्कालीन विधायक राधाकृष्ण किशोर और पलामू सांसद वीडी राम के प्रयास से वर्ष 2007 में नावाजयपुर और 2009 में किशुनपुर में पुलिस पिकेट स्थापित किया गया. इसके बाद लोगों ने सुरक्षा का अनुभव करना शुरू किया. किशुनपुर मुख्य बाजार से पुलिस पिकेट की दूरी लगभग एक किलोमीटर है. पहले इस मार्ग पर न मकान थे और न ही दुकानें, लेकिन पिकेट बनने के बाद धीरे-धीरे मकान और दुकानें बनने लगीं. क्षेत्र के लोगों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं होगा बाद में किशुनपुर को सांसद आदर्श ग्राम पंचायत के लिए चयनित किया गया. जनवरी 2018 में तत्कालीन एसपी इंद्रजीत महथा ने किशुनपुर ओपी का उदघाटन किया. आठ वर्षों तक ओपी के रूप में कार्य करने के बाद अचानक बुधवार को स्थानीय लोगों को जानकारी मिली कि इसे पिकेट में बदल दिया गया है. बताया गया कि यह निर्णय एसडीपीओ राजेश यादव के मौखिक आदेश पर लिया गया. इससे व्यवसायियों और आमजन में असुरक्षा की भावना पैदा हो गयी. विरोध स्वरूप पूर्व जिप सदस्य नंदकुमार राम के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने पलामू प्रक्षेत्र के डीआईजी किशोर कौशल से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा. डीआइजी ने बताया कि उन्हें इस विषय की जानकारी प्रभात खबर में प्रकाशित समाचार से मिली है. उन्होंने आश्वासन दिया कि क्षेत्र के लोगों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं होगा.असुरक्षित महसूस कर रहे हैं
मौके पर किशुनपुर पंचायत के पूर्व मुखिया धीरेंद्र नारायण उपाध्याय, भाजपा के पूर्व मंडल अध्यक्ष संतोष पांडेय, श्रीकांत तिवारी, राजू पासवान, विकाश रजक समेत कई लोग उपस्थित थे. व्यवसायियों ने कहा कि ओपी हटाये जाने से वे असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और इस माहौल में व्यापार करना कठिन होगा.चरणबद्ध और शांतिपूर्ण आंदोलन किया जायेगा.
पूर्व जिप सदस्य नंदकुमार राम ने स्पष्ट किया कि यदि किशुनपुर को पुनः ओपी नहीं बनाया गया, तो चरणबद्ध और शांतिपूर्ण आंदोलन किया जायेगा. लोगों का कहना है कि ओपी की स्थापना से क्षेत्र में सुरक्षा और विकास दोनों संभव हुए थे. अब इसे पिकेट में बदलने से न केवल व्यवसायियों बल्कि आमजन का भी विश्वास डगमगा रहा है.