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Home झारखण्ड पाकुड़ जब बांस की बैसाखी के सहारे पहुंचा मेधावी छात्र, तब समझ आया सम्मान का असली अर्थ

जब बांस की बैसाखी के सहारे पहुंचा मेधावी छात्र, तब समझ आया सम्मान का असली अर्थ

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जब बांस की बैसाखी के सहारे पहुंचा मेधावी छात्र, तब समझ आया सम्मान का असली अर्थ
बैसाखी के सहारे सम्मान लेने पहुंचा छात्र किशन सोरेन. फोटो: प्रभात खबर

पाकुड़ से डॉ आलोक की रिपोर्ट

Prabhat Khabar Pratibha Samman: पाकुड़ स्थित रवींद्र भवन टाउन हॉल में बुधवार को आयोजित प्रभात खबर प्रतिभा सम्मान समारोह केवल मेधावी विद्यार्थियों को सम्मानित करने का कार्यक्रम नहीं था. यह उन संघर्षों, सपनों और माता-पिता के त्याग का जीवंत दस्तावेज था, जिनके सहारे हजारों बच्चे अभावों के बीच भी सफलता की नई इबारत लिख रहे हैं. सुबह 10 बजे से शुरू होने वाले कार्यक्रम के लिए कई छात्र-छात्राएं अपने माता-पिता के साथ सुबह आठ बजे ही पहुंच चुके थे. उत्साह ऐसा था मानो कोई त्योहार हो और हर परिवार अपने बच्चे की उपलब्धि को उत्सव की तरह जीना चाहता हो.

अभाव थे, लेकिन चेहरे पर थी उपलब्धि की चमक

कार्यक्रम स्थल पर तैयारियों का जायजा लेने के दौरान कई ऐसे दृश्य सामने आए, जिन्होंने हर संवेदनशील व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर दिया. कुछ बच्चों के पैरों में हवाई चप्पल थी, तो कुछ के जूते समय की मार झेलते हुए फट चुके थे. कई छात्र एक कोने में बैठकर घर से लायी गयी मुढ़ी और चूड़ा खा रहे थे. मुझे देखते ही बच्चे हल्की मुस्कान के साथ संकोच में सिमट गए. उनके कपड़े भले साधारण थे, लेकिन चेहरे पर उपलब्धि का आत्मविश्वास साफ झलक रहा था.

माता-पिता की आंखों में था गर्व

कार्यक्रम में पहुंचे अभिभावकों के चेहरे पर संघर्ष और गरीबी की रेखाएं साफ दिखाई दे रही थीं. संभवतः इनमें से कई लोग रोज मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते होंगे. उन्होंने शायद अपने कई सपनों को अधूरा छोड़ दिया, लेकिन बच्चों के सपनों को साकार करने में कोई कमी नहीं छोड़ी. उनकी आंखों में अपने बच्चों के लिए जो गर्व दिखाई दे रहा था, वह किसी भी पुरस्कार से कहीं अधिक मूल्यवान था.

बैसाखी के सहारे पहुंचा किशन सोरेन

इसी दौरान एक दृश्य ने मन को गहराई तक छू लिया. बांस की बैसाखी के सहारे खड़ा छात्र किशन सोरेन अपनी मां के साथ पाकुड़ के सुदूर गांव से सम्मान समारोह में पहुंचा था. जब मंच पर उसे सम्मानित किया जा रहा था, तब उससे सहज भाव से पूछा गया कि इस स्थिति में आने की क्या आवश्यकता थी. इस पर किशन ने मुस्कुराते हुए कहा, “सर, नहीं आता तो प्रभात खबर प्रतिभा सम्मान लेने से चूक जाता.” उसका यह साधारण सा जवाब असाधारण संदेश दे गया. उसके लिए यह सिर्फ एक सम्मान नहीं था, बल्कि उसके संघर्ष, मेहनत और सपनों की पहचान थी.

हौसलों के सामने संसाधनों की कमी छोटी पड़ गयी

किशन सोरेन के शब्दों ने यह एहसास करा दिया कि प्रतिभा संसाधनों की नहीं, बल्कि हौसलों की मोहताज होती है. जिन बच्चों के पास सुविधाएं सीमित हैं, उनके सपने अक्सर सबसे बड़े होते हैं और उन्हें पूरा करने का जज्बा भी सबसे मजबूत होता है.

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कई आंखें हुईं नम

प्रभात खबर प्रतिभा सम्मान के मंच पर केवल अंकों और उपलब्धियों का सम्मान नहीं हुआ. वहां उन माता-पिता के त्याग को नमन किया गया, जिन्होंने अभावों के बावजूद अपने बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता दी. उन बच्चों के संघर्ष को सलाम किया गया, जो मुश्किल परिस्थितियों में भी उम्मीद की लौ जलाए हुए हैं. उस दिन रवींद्र भवन में कई आंखें नम थीं. शायद इसलिए कि वहां सम्मान सिर्फ प्रतिभा का नहीं, बल्कि इंसानी जज्बे, सपनों और संघर्ष की उस कहानी का हो रहा था, जो हर समाज की सबसे बड़ी पूंजी होती है.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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