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यज्ञ ही नरायण हैं और नरायण ही यज्ञ हैं : विष्णुचित्त महाराज

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यज्ञ ही नरायण हैं और नरायण ही यज्ञ हैं : विष्णुचित्त महाराज

सेन्हा़ प्रखंड मुख्यालय स्थित दुर्गा मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में आयोजित शत चंडी महायज्ञ के दौरान श्रीमद्भागवत कथा का अमृत वर्षा हुई. प्रवचन देते हुए विष्णुचित्त महाराज ने यज्ञ की महिमा का विस्तृत वर्णन किया. उन्होंने कहा कि ‘यज्ञ ही नारायण हैं और नारायण ही यज्ञ हैं’. यज्ञ के माध्यम से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है. महाराज जी ने भक्त-श्रोताओं को अन्न, जल, अग्नि और वस्तु देवता के महत्व के बारे में विस्तार से समझाया. उन्होंने बताया कि यज्ञ न केवल देव पूजन है, बल्कि इससे वातावरण की शुद्धि भी होती है. उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल मनुष्यों की संगति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यज्ञ के माध्यम से प्रभु का सानिध्य प्राप्त करना ही सर्वश्रेष्ठ संगति है. यज्ञ में दान की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने भिक्षा, दान और चंदा के बीच के अंतर को स्पष्ट किया. उन्होंने कहा कि केवल धन एकत्रित करना ही यज्ञ का उद्देश्य नहीं है, बल्कि 33 कोटि देवताओं के वास वाले इस अनुष्ठान में तन, मन और धन का श्रद्धापूर्वक दान आवश्यक है. बिना दान के यज्ञ निष्फल हो जाता है. प्रवचन के दौरान उन्होंने महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद भगवान श्री कृष्ण का द्वारिका प्रस्थान और राजा परीक्षित के जन्म का मार्मिक प्रसंग सुनाया. महाराज जी की ओजस्वी वाणी सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गये और मंत्रमुग्ध होकर कथा श्रवण करते रहे. इस कार्यक्रम में साकेत मिश्रा, रामानुज दास, सूरज मिश्रा, कुलदीप दुबे, चंद्रमोहन पाठक, विजय सोनी, नर्मदेश्वर पाठक, प्रसन्न साहू, केदार लहेरी और जितेंद्र ठाकुर सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित थे. पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया था.

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