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रामचंद्र ने चौथी बार विधायक बन दिखायी ताकत

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रामचंद्र ने चौथी बार विधायक बन दिखायी ताकत

बेतला. विधायक रामचंद्र सिंह ने राजनीति की लंबी पारी खेली है. अपनी जीवन के 30 वर्ष में वह चौथी बार विधायक बने. एकीकृत बिहार में 1995 में पहली बार जनता दल के टिकट पर वह चुनाव लड़े थे और तत्कालीन विधायक यमुना सिंह को पराजित कर विधायक बने. उन्हें राजनीति में आने के लिए क्षेत्र की समस्याओं ने ही प्रेरित किया. विधायक रामचंद्र सिंह के अनुसार मनिका विधानसभा क्षेत्र का इलाका काफी पिछड़ा था. लेकिन, कुशल नेतृत्व के अभाव में इसका दोहन हो रहा था. यही कारण था कि उन्होंने राजनीति में आने का मन बनाया. हालांकि उनके पिता और परिवार के अन्य लोग उन्हें सरकारी नौकरी में देखना चाहते थे. उनके पिता का देहांत 12 फरवरी 1987 को हुआ. पिता के निधन होने के बाद परिवार के लोग अनुकंपा पर सीसीएल में नौकरी कराना चाहते थे, क्योंकि घर में चार भाइयों में सबसे छोटे सबसे पढ़े लिखे वही व्यक्ति थे. लेकिन उनके मन में सेवा भावना थी, इसलिए उन्होंने उसे दरकिनार कर दिया. हालांकि राजनीति में आने के लिए वही घटनाक्रम उनके लिए मार्ग प्रशस्त किया. क्योंकि अपने बड़े भाई को सीसीएल में अनुकंपा के आधार पर नौकरी पर रखने के लिए उन्हें ऑफिस का चक्कर लगाना पड़ा था, उस समय उन्होंने जो कुछ झेला, वह दर्द उनके सीने में दबा रहा. इसके बाद उन्होंने ठान लिया कि भविष्य में उन्हें मौका मिला, तो वह यहां के लोगों के लिए जीवन समर्पित कर देंगे. 1993 में गृह पंचायत के 10 गांव में विकास योजनाओं को कुछ बाहरी लोगों के द्वारा कराया जा रहा था. गांव के लोगों को वंचित कर दिया गया था, जिसे लेकर ग्रामीणों में उबाल था. उन्होंने लोगों के साथ बैठक कर रणनीति बनायी और आंदोलन शुरू किया. तत्कालीन पलामू उपायुक्त से मिलकर गांव की समस्या से अवगत कराया और इसके बाद उनके बातों पर अमल करते हुए तत्कालीन उपायुक्त ने उनके गांव का दौरा कर तत्कालीन बीडीओ संजय सिंह यादव को निर्देश दिया कि अन्य सभी नौ गांवों में भी काम कराया जाये. जो लोग काम कर रहे थे, वे उनके विरोधी हो गये. तत्कालीन विधायक के इशारे पर योजनाओं का प्रक्कलन कम कर दिया गया. लगातार जांच करायी गयी. हर तरह का बाधा डालकर काम रोकने का प्रयास किया गया. लेकिन तत्कालीन प्रशासनिक पदाधिकारी का उन्हें सहयोग मिला और काम चलता रहा. बाहरी ठेकेदार और कुछ लोगों के द्वारा बीडीओ को परेशान किया जाने लगा. बीडीओ के खिलाफ अभियान चलाने का निर्णय लिया गया. प्रखंड कार्यालय के समक्ष धरना प्रदर्शन की बात कही गयी. प्रशासनिक पदाधिकारी के खिलाफ थूको अभियान चलाया गया. जब प्रदर्शन करने 35 की संख्या में लोग पहुंचे, तो रामचंद्र सिंह के नेतृत्व में 5000 से अधिक लोग पहुंचे और उन्होंने अपने आंदोलन का नाम काम रोको अभियान दिया. रामचंद्र सिंह अपने आंदोलन में सफल हो गये विरोधियों को वहां से भागना पड़ा. इस घटना से प्रशासनिक पदाधिकारी के अलावे अन्य लोग काफी प्रभावित हुए. तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव तक इस संदेश को पहुंचाया गया. वर्ष 1995 का चुनाव आया तब मनिका विधानसभा सीट से एक ऐसे प्रत्याशी की जरूरत थी जो तेज तर्रार, पढ़ा लिखा और संघर्ष करने वाला युवा हो. तब लालू प्रसाद यादव ने उन्हें टिकट दिया. उस समय उन्हें राजनीति के बारे में ज्यादा ज्ञान नहीं था,इसलिए स्थिति का भांपते हुए लालू प्रसाद यादव ने तत्कालीन मंत्री इंदर सिंह नामधारी को राजनीतिक कैरियर में मदद करने का निर्देश दिया और श्री नामधारी ने उनका भरपूर सहयोग किया. इसलिए रामचंद्र सिंह आज भी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं.

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