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Home झारखण्ड कोडरमा वैष्णव परंपरा में भोजन को प्रसाद माना जाता है : स्वामी ओमनारायणाचार्य

वैष्णव परंपरा में भोजन को प्रसाद माना जाता है : स्वामी ओमनारायणाचार्य

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वैष्णव परंपरा में भोजन को प्रसाद माना जाता है : स्वामी ओमनारायणाचार्य

झुमरीतिलैया. शहर के देवी मंडप बंगाली मोहल्ला में चल रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन गोवर्धन पूजा और छप्पन भोग का आयोजन किया गया़ कथा वाचक स्वामी ओमनारायणाचार्य ने भक्तों को गुरु परंपरा, वैष्णव धर्म और छप्पन भोग की महत्ता के बारे में बताया़ स्वामी जी ने कहा कि वैष्णव परंपरा में भोजन को केवल भोजन नहीं, बल्कि प्रसाद माना जाता है़ वैष्णव साधु-संत सब्जी काटने को साग सुधारना कहते हैं, क्योंकि यह भगवान की सेवा का हिस्सा है़ उनके लिए भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि प्रसाद रूपी आशीर्वाद है़ हम घर नहीं कहते, मंदिर में रहते हैं, हमारे लिए मंदिर ही घर है़ नमक को राम रस और हरी मिर्च को लंका कहा जाता है़ यह गुरु परंपरा और आश्रम जीवन की विशेषताएं हैं. गोवर्धन पूजा की कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कानी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को सात दिन तक उठाकर ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया़ इसी संदर्भ में छप्पन भोग का आयोजन किया गया़ भगवान को दिन में आठ बार भोग अर्पित किया जाता है़ सात दिनों तक यह प्रक्रिया जारी रहने से 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया गया, जिसे अष्टाम भोग भी कहते हैं. स्वामी जी ने रामानुजाचार्य द्वारा स्थापित श्रीसंप्रदाय की महिमा पर प्रकाश डाला़ उन्होंने बताया कि यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है. इसमें अनेक ऋषि-मुनि और संत-महात्मा हुए हैं. इस परंपरा के अनुयायी साधु-संत जीवन को सादगी और समर्पण के साथ जीते हैं.

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